The Mysterious Bell – Chapter 1481
मेरा गला भर आया। मैंने उनका हाथ और कसकर पकड़ लिया।
“उसी शाम एक आदमी आया,” पापा ने कहा। “सफ़ेद कुर्ता पहने हुए। हाथ में काग़ज़ों का बंडल। बोला, यादव जी, साहब आपकी मदद करना चाहते हैं। बस एक अंगूठा चाहिए। मैंने काग़ज़ देखे। उन पर तेरा नाम पहले लिखा था।”
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
“मेरा नाम?”
“हाँ,” पापा ने कहा। “तेरा नाम। अंकुश यादव। और उसके नीचे मेरा नाम। दोनों की जगह बनी थी। उन्होंने कहा कि एक ही अंगूठा लगेगा। मैंने कहा कि बेटे का नाम हटा दो। मैंने गिड़गिड़ाकर कहा। उन्होंने हँसकर कहा — ठीक है, तुम्हारा अंगूठा लगा दो।”
पापा की आवाज़ टूटने लगी।
“मैंने अंगूठा लगा दिया,” उन्होंने कहा। “उस रात मैं अस्पताल गया। तेरी माँ को देखा। उनका हाथ पतला था। साँस भारी थी। मैंने सोचा कि अगर ये अंगूठा उन्हें बचा सकता है, तो लग जाने दो। पर बेटा…”
वो रुके।
“लगाने के बाद,” उन्होंने धीमे से कहा, “मैं अपने हाथ को देख नहीं पाया। मुझे लगा कि मेरा अंगूठा काला हो गया है। मैंने उसे छुपाना शुरू किया। रात को सोते वक़्त हाथ तकिये के नीचे दबा देता था। कभी मुट्ठी बंद करके बैठता था। कभी जेब में हाथ डालकर चलता था। तेरी माँ पूछती थीं — हाथ में क्या है? मैं कह देता था, कुछ नहीं।”
मैं कुछ नहीं बोला।
“बाईस साल,” पापा ने कहा। “बाईस साल मैंने वो अंगूठा छुपाया। हर रात। हर सुबह। जब तू दुकान पर बड़ा हो रहा था, मैं तेरे सामने हाथ नहीं खोलता था। जब काजल स्कूल से आती थी, मैं उसके सामने हाथ पीठ के पीछे रख लेता था। मुझे लगता था कि अगर तुमने देख लिया, तो तुम पूछोगे — पापा, ये क्या है? और मैं जवाब नहीं दे पाऊँगा।”
उन्होंने अपना हाथ मेरी तरफ़ बढ़ाया। उँगलियाँ फैलाईं। अंगूठा सामने आया। उस पर कोई निशान नहीं था। बस पुरानी झुर्रियाँ थीं। पर पापा उसे ऐसे देख रहे थे जैसे उस पर कोई दाग़ हो।
“ये अंगूठा,” उन्होंने कहा, “मेरे लिए काग़ज़ का टुकड़ा नहीं है। ये वो डर है जो मैंने अपने हाथ में पकड़ रखा है।”
मैंने उनका हाथ धीरे से अपनी तरफ़ खींचा।
“पापा,” मैंने कहा।
वो मेरी तरफ़ देखने लगे।
“तुमने आज मुझसे जो पूछा,” उन्होंने कहा, “वो सच बोलकर मैंने अपना डर तोड़ा है। पर बेटा, मुझे एक बात और कहनी है।”
“कहो।”
“मैं तुझे अकेला नहीं छोड़ना चाहता था,” उन्होंने कहा। “पर मैं खुद इतना टूट गया था कि तुझसे हाथ बँटाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया।”
मैंने उनकी आँखों में देखा।
“पापा,” मैंने कहा, “अब मैं कुछ कहूँ?”
“कह।”
“मैं भी डरता था,” मैंने कहा।
पापा चुप हो गए।
“मैं अंदर से डरता था कि मैं ये घर नहीं बचा पाऊँगा,” मैंने कहा। “मैंने कभी किसी को नहीं बताया। मैंने सोचा कि अगर मैं सब कुछ अकेले करूँगा, तो अगर कुछ टूटा, तो सिर्फ़ मेरा ही दोष होगा। मैं किसी को दोष नहीं देना चाहता था। इसलिए मैंने सबको दूर रखा।”
पापा मेरी तरफ़ देख रहे थे।
“मैं तुमसे नाराज़ था,” मैंने कहा। “पर सच ये है कि मैं खुद से नाराज़ था। मुझे लगता था कि मैं तुम्हारी चुप्पी का बोझ उठा रहा हूँ। पर आज समझ आया कि तुम भी वही बोझ उठा रहे थे।”
पापा का हाथ मेरे हाथ में काँपा।
“तूने आज मुझे कायर नहीं कहा,” उन्होंने कहा।
“क्यों कहूँगा?” मैंने कहा। “तुमने बाईस साल एक डर को सीने में रखकर सबका घर चलाया। कायर वो होता है जो डर को दूसरों पर थोप देता है। तुमने उसे अपने अंदर रखा। पर अब उसे बाहर निकालने का वक़्त है।”
पापा ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में पानी था।
“मैं तुम्हारा बेटा हूँ,” मैंने कहा। “मैं तुम्हारे साथ हूँ।”
उन्होंने मेरा सिर अपने सीने से लगा लिया। मैंने उनके कंधे पर अपना माथा रख दिया। आँगन में सिर्फ़ दीये की लौ की आवाज़ बची थी। बहुत धीमी। फिर भी सुनाई दे रही थी, जैसे कोई बहुत दूर से साँस ले रहा हो।
कुछ देर बाद मैंने उन्हें उठाया।
“चलो,” मैंने कहा। “मैदान में लोग अब भी खड़े हैं। और मंसूर चाचा का ताला वहीं मेज़ पर है।”
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
“तू ठीक है?”
“नहीं,” मैंने सच कहा। “पर जाना ज़रूरी है।”
हम आँगन से निकले। गली में दीये अब भी जल रहे थे। कुछ बुझ चुके थे। उनकी बाती से अब भी हल्का धुआँ उठ रहा था। मैंने पापा का हाथ नहीं छोड़ा।
मैदान में पहुँचे तो भीड़ अब भी खड़ी थी। कोई बैठा था, कोई खड़ा। बच्चे चबूतरी के किनारे बैठे थे। शबनम आपा गुमटी की तरफ़ देख रही थीं। रज़िया उनके पास खड़ी थी। उस्ताद अपनी पीतल की कैंची हाथ में लिए खड़े थे। मीरा ने कैमरा अभी तक उठाया नहीं था। वो ज़मीन पर रखा था, लाल बत्ती बंद।
लोगों ने हमें आते देखा। किसी ने कुछ नहीं पूछा। बस रास्ता छोड़ दिया।
मैं पापा को लेकर उस लंबी मेज़ तक गया। मेज़ पर सैकड़ों काग़ज़ पड़े थे। सबसे ऊपर शंकरलाल यादव का नाम था। और उसके नीचे, एक कोने में, मंसूर चाचा का टूटा काला ताला रखा था। उसके बगल में दूसरा टाला, जो रणवीर ने दिया था।
मैं रुक गया।
मेरी जेब में घंटी थी। वो चुप थी। पर मुझे लगा जैसे वो साँस ले रही है।
“पापा,” मैंने कहा। “आज जो तुमने कहा, वो किसी ने सुना?”
पापा ने भीड़ की तरफ़ देखा।
“नहीं,” उन्होंने कहा। “पर जो मैंने आज कहा, वो अब मेरे अंदर नहीं है।”
मैंने उनका हाथ पकड़े रखा।
और तभी मुझे कुछ महसूस हुआ।
मेज़ पर पड़ा मंसूर का टाला गरम हो रहा था। मैंने उसे छुआ नहीं था। पर मैं उसकी गरमाहट हवा में सुन सकता था। जैसे किसी पुरानी लोहे की चीज़ ने साँस ली हो।
“पापा,” मैंने धीमे से कहा।
उन्होंने भी देखा।
ताले के जोड़ से पीली रोशनी की एक पतली लकीर निकली। बाल जितनी पतली। जैसे दो टूटे हिस्सों के बीच से किसी ने रोशनी की सुई डाल दी हो।
उस्ताद की उँगलियाँ खुल गईं। उनकी पीतल की कैंची बीच में ही रुक गई। वो कैंची को भूल गए। मैंने उन्हें ऐसा पहले कभी नहीं देखा था। उनका मुँह आधा खुला था। आँखें ताले पर जमी थीं।
मीरा का हाथ कैमरे की तरफ़ उठा और बीच में ही रुक गया। उसने कैमरा नहीं उठाया। बस देखती रही।
भीड़ में फुसफुसाहट नहीं हुई। कोई चिल्लाया नहीं। कोई पीछे नहीं हटा। सब जैसे उस पीली लकीर को देख रहे थे।
पापा ने दोनों हाथों से मेरा सिर पकड़ लिया।
मैं चौंका।
उन्होंने मेरा सिर अपनी तरफ़ खींचा। उनके हाथ ठंडे थे, पर उनकी पकड़ मज़बूत थी। उन्होंने मेरी आँखों में देखा।
“बेटा,” उन्होंने कहा।
उनकी आवाज़ भरी हुई थी।
“मैंने बाईस साल तुझे गले नहीं लगाया,” उन्होंने कहा। “जब तू छोटा था, मैंने सोचा कि गले लगाने के लिए मेरे हाथ साफ़ होने चाहिए। फिर तू बड़ा हो गया। मैंने सोचा, अब देर हो गई।”
उनकी आँखों से पानी बहने लगा।
और इस बार उन्होंने मुँह नहीं छुपाया। न हाथ। न रूमाल। वो भरी भीड़ के सामने रो रहे थे। गली के लोग देख रहे थे। बच्चे देख रहे थे। उस्ताद देख रहे थे। शबनम आपा देख रही थीं। माँ दरवाज़े के पास खड़ी थी, काजल का हाथ पकड़े।
पापा ने मेरा सिर अपने सीने से लगा लिया।
“माफ़ कर दे,” उन्होंने कहा।
मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं।
“पापा,” मैंने कहा। “माफ़ी काग़ज़ पर नहीं लिखी जाती। वो सीने से लगाकर दी जाती है।”
उन्होंने मुझे और कसकर पकड़ लिया।
भीड़ में किसी औरत ने सिसकना शुरू किया। फिर किसी बूढ़े ने अपना चश्मा उतारा। बच्चों ने एक-दूसरे का हाथ पकड़ लिया।
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