The Mysterious Bell – Chapter 1479
मेरी आँखें जल रही थीं। मैंने उन्हें पोंछा भी नहीं।
“पापा, याद है मुझे?” मैंने कहा। “जब मैं पाँच साल का था। तुम मुझे दुकान पर ले गए थे। मैंने साइकिल की चेन उल्टी लगा दी थी। फिर मैं डर गया कि तुम डाँटोगे।”
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
“तुम हँसे थे,” मैंने कहा। “ज़ोर से हँसे थे। तुमने कहा था — बेटा, चेन उल्टी भी चले तो गाड़ी पीछे जाती है। और मुझे लगा मैंने कुछ बड़ा सीख लिया है।”
पापा की आँखों से पानी बह गया।
“उस दिन तुम हँसे थे पापा,” मैंने कहा। “तो आज क्यों भूल गए?”
“अंकुश…”
“तुमने सोचा कि मैं तुम्हें कायर कहूँगा। पर तुम्हें पता है सच क्या है? कायर वो नहीं जो डरता है, पापा। कायर वो है जो डर के आगे बेटे को देखना छोड़ दे।”
मेरी आवाज़ भर्रा गई।
“और तुमने मुझे बाईस साल देखना नहीं छोड़ा। तुम रोज़ सुबह मेरी साइकिल की हवा देखते रहे। तुम रोज़ रात दुकान का शटर खुद चेक करते रहे। तुमने एक बार भी मुझसे कहा होता कि बेटा, आज तू आराम कर, मैं दुकान संभाल लेता हूँ… पर तुमने कभी नहीं कहा। क्योंकि तुम्हें लगता था कि अगर तुमने दुकान संभाली, तो लोग कहेंगे कि तुमने मेरा हक़ लिया है।”
पापा ने धीरे से कहा, “मैंने सोचा था कि मैंने पहले ही बहुत कुछ लिया है।”
“तुमने कुछ नहीं लिया,” मैंने कहा। “तुम हमेशा से देते आए हो। बस एक बार लेना भूल गए। मदद लेना।”
पीछे से आवाज़ आई। शबनम आपा की।
“अरे, सब वहीं खड़े हो क्या? किसी ने पानी दिया इस आदमी को? अरे उठाओ इनको!”
और फिर भीड़ हिली।
पहले धीरे। फिर तेज़।
कोई आगे आया। कोई पीछे हटा। एक बूढ़ी औरत ने अपना दुपट्टा नोचकर पापा के हाथ पर बाँध दिया, जहाँ घाव था। किसी ने पानी का गिलास बढ़ाया। शबनम आपा आईं और मेरे कंधे पर हाथ रखकर बोलीं, “उठ बेटा। तेरे पापा को बैठने दे।”
मैं उठा।
मैंने पापा को उठाया। वो मेरे कंधे पर झुक गए, बहुत हल्का, जैसे एक बूढ़ा आदमी नहीं, एक पूरी उम्र का डर झुक गया हो।
उस्ताद पास आए। उन्होंने पापा के दूसरे हाथ पर हाथ रखा। उनकी आँखें भी गीली थीं।
“शंकर,” उन्होंने कहा, “तूने आज वो किया जो मैं पचास साल से नहीं कर पाया।”
पापा ने उनकी तरफ़ देखा।
“तूने अपने बेटे से डर के बारे में बात की,” उस्ताद ने कहा। “मैंने अपने भाई से नहीं की। इसीलिए वो आज भी मुझसे बोलता है, और मैं आज भी नहीं बोल पाता।”
कमला अम्मा अपनी लाठी के सहारे वहीं खड़ी थीं। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनका सिर बहुत हल्का हिला, जैसे कोई बूढ़ी औरत किसी चीज़ को मन ही मन सही कह रही हो।
गोविंद भाई दूर, एक दीये के पास बैठे हुए थे। उनका चश्मा अब भी टेप से बँधा था, पर टेप खुल गई थी और चश्मा नाक पर तिरछा लटक रहा था। वो रो रहे थे, चुपचाप, एक काग़ज़ हाथ में पकड़े।
मीरा का कैमरा ज़मीन पर पड़ा था। लाल बत्ती बुझ चुकी थी।
सक्सेना दूर, उसी मेज़ के नीचे ज़मीन पर बैठे हुए थे। उनका सफ़ेद कुर्ता धूल में लग गया था। उन्होंने मुझे देखा, और उनकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मुझे पहले कभी किसी काग़ज़ में नहीं दिखा था।
शर्म।
असली शर्म।
पापा को मैंने मेज़ के पास बने एक पत्थर के पास बैठाया। वो कुछ कहना चाहते थे, पर मैंने उनके हाथ पर हाथ रख दिया।
“पापा, एक बात और पूछनी है।”
“पूछ।”
“वो अंगूठा,” मैंने कहा। “उस काग़ज़ पर। जो तुमने लगाया।”
वो चुप रहे।
“उस पर मेरा नाम भी था?”
पापा की आँखें बंद हो गईं। बहुत देर तक बंद रहीं। फिर खुलीं।
“हाँ,” उन्होंने कहा। “तू उस काग़ज़ पर मेरे साथ लिखा था। तेरा नाम, फिर मेरा नाम। पहली लाइन तेरी थी। और मैंने सिर्फ़ अपना अंगूठा लगाया।”
मेरे सीने में कुछ और टूटा।
“तो मेरी लाइन आज भी खाली है?”
“हाँ।”
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
“तो कल,” मैंने कहा, “हम दोनों जाएँगे। और उस खाली लाइन पर हम दोनों लिखेंगे।”
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
“क्या लिखेंगे?”
“वो जो सच है,” मैंने कहा। “कि तुमने डर के मारे अंगूठा लगाया। और मैंने बाईस साल उस डर को पहचाना नहीं।”
तभी मेरी जेब से आवाज़ आई।
घंटी।
बहुत धीमी। बहुत थकी हुई। जैसे किसी बूढ़े आदमी ने आधी नींद में करवट बदली हो।
“अब,” उसने कहा।
मैंने जेब में हाथ डाला। घंटी ठंडी थी — बहुत ठंडी, पर बर्फ़ जैसी नहीं। बस ऐसी, जैसे उसने बहुत सारी बातें कहकर खुद को ख़ाली कर लिया हो।
“अब क्या?” मैंने धीरे से पूछा।
“अब बोलेंगे नहीं,” उसने कहा। “अब सुनेंगे।”
मैंने घंटी को जेब में वापस रख दिया।
मैदान में अब भी लोग खड़े थे। सैकड़ों। कुछ बैठ गए थे धूल में। कुछ एक-दूसरे का हाथ पकड़े हुए थे। दीये अब तेज़ जल रहे थे, क्योंकि हवा थम गई थी।
टिंकू मेरे पास आया। उसकी आँखें लाल थीं।
“भाई,” उसने कहा।
“हाँ।”
“तुमने रणवीर से बात क्यों नहीं की? वो बुला रहा था।”
“क्योंकि,” मैंने कहा, “आज पहली बार मुझे समझ आया कि असली लड़ाई किससे है।”
“किससे?”
“उस डर से,” मैंने कहा। “जिसने पापा को बाईस साल चुप करा दिया। जिसने उस्ताद को पचास साल अपने भाई से दूर रखा। जिसने माँ को अपने ही घर में अजनबी बना दिया।”
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा।
“और उस डर को कैसे हराएँगे?”
“उसी तरह,” मैंने कहा। “जैसे आज हुआ।”
माँ मेरे पास आईं। काजल उनका हाथ पकड़े हुई थी।
“अंकुश,” माँ ने कहा। उनकी आवाज़ सूखी थी।
“हाँ, माँ।”
“जो तूने आज किया…” उन्होंने रुककर साँस ली। “वो तेरे पापा के लिए नहीं था।”
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
“वो तेरे लिए था,” उन्होंने कहा। “तूने खुद को ये बताया कि तू अपने पापा को कायर नहीं कहेगा। क्योंकि तू खुद बाईस साल से डर रहा था कि कहीं वो सच में कायर न निकलें।”
मैं चुप रहा। क्योंकि वो सच कह रही थीं।
“और अब?” मैंने पूछा।
“अब तू जान गया,” उन्होंने कहा। “वो कायर नहीं हैं। वो बस थके हुए हैं।”
उन्होंने मेरा माथा चूमा। बहुत जल्दी। जैसे सबके सामने करने में शर्म आ रही हो, पर करना ज़रूरी हो।
उस रात मैदान खाली होने में बहुत देर लगी।
लोग जाते-जाते रुकते थे। कोई मेरे पास आकर कुछ कहता था, कोई कुछ नहीं कहता था, बस हाथ पकड़कर चला जाता था। एक बूढ़े आदमी ने मेरे सिर पर हाथ रखा और बोले, “बेटा, आज तेरे पापा ने वो कह दिया जो मैं अपने बेटे से नहीं कह पाया।”
मैंने उनका हाथ पकड़ लिया।
जब सब चले गए, तो मैदान में सिर्फ़ हम लोग बचे — मैं, पापा, माँ, काजल, टिंकू, उस्ताद, मीरा, शबनम आपा, रज़िया, और कुछ बच्चे जो सो गए थे चारपाइयों पर।
मेज़ पर दोनों टाले अब भी पड़े थे।
मैंने उन्हें उठाया। एक हाथ में एक।
वो गरम थे। हल्के गरम।
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
“क्या हुआ?” उन्होंने पूछा।
“ये ताले,” मैंने कहा। “अब भी गरम हैं।”
“तो?”
“तो इसका मतलब,” मैंने कहा, “अभी हिसाब पूरा नहीं हुआ।”
उस्ताद ने आगे आकर उन तालों को देखा। उन्होंने एक उँगली से छुआ।
“अंकुश,” उन्होंने कहा, “ये ताले अब सिर्फ़ ताले नहीं हैं।”
“तो क्या हैं?”
“ये दो आदमियों का सच हैं,” उन्होंने कहा। “जो आज खुल गया, पर बंद नहीं हुआ।”
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
“मतलब?”
“मतलब,” उस्ताद ने कहा, “कि जो सच आज खुला, उसे अभी पूरा खुलना है। और उसका आख़िरी हिस्सा…”
वो रुक गए।
“कहाँ है?” मैंने पूछा।
उस्ताद ने अपनी आँखें नीची कर लीं।
“तेरे पापा के पास,” उन्होंने कहा।
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