The Mysterious Bell – Chapter 1477
“अंकुश,” पापा ने कहा। उनकी आवाज़ में खतरा था। “पीछे हट।”
“नहीं,” मैंने कहा।
मैं आगे बढ़ा। मेरी जेब में घंटी पहले से ज़्यादा ठंडी हो गई, जैसे वो मुझे रोक रही हो। पर मैं रुका नहीं।
मैं रणवीर के सामने आकर खड़ा हो गया।
“छोड़,” मैंने कहा।
“मैं नहीं पकड़ रहा,” उसने कहा। उसकी आवाज़ काँप रही थी। “ये मुझे पकड़ रहा है।”
और तभी हवा में वो फुसफुसाहट फिर उभरी।
पहले जैसी नहीं। इस बार लंबी। इस बार शब्दों में।
मैदान में सबकी साँसें रुक गईं। मैंने देखा कि कमला की लाठी हाथ से छूटकर गोद में गिर गई। डॉक्टर इसरानी की छड़ी ज़मीन पर टिकी रह गई, और वो खुद हिले नहीं। मीरा ने अपना हाथ अपने मुँह पर रख लिया। शालिनी ने अपनी पीली फाइल सीने से चिपका ली, जैसे वो कोई ढाल हो।
उस्ताद ने धीरे से कहा, “अंकुश… ये आवाज़ मैं जानता हूँ। ये आवाज़… ये ताला नहीं है। ये वो है जो ताले के अंदर बैठा था।”
“क्या?” मैंने कहा।
“तोड़ने वाला,” उस्ताद ने कहा। उनका चेहरा पीला पड़ गया था। “पचास साल पहले मैंने इसे एक बार सुना था। एक बार। और उसके बाद मैंने भाई से बात करना बंद कर दिया।”
अब वो फुसफुसाहट मेरे कान के पास आई। या शायद मेरे कान के अंदर। मुझे पता नहीं। पर मैंने उसे साफ़ सुना।
“यह ताला अब एक का नहीं, दो का है।”
मैदान में किसी ने एक लंबी साँस ली, बहुत पीछे से, बहुत धीमी। जैसे किसी ने बहुत देर तक साँस रोकी हो और अब छोड़ दी हो।
रणवीर ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो मैंने इस आदमी में कभी नहीं देखी थी।
डर।
सच्चा डर।
“अंकुश,” उसने धीरे से कहा। इतना धीमा कि सिर्फ़ मैं सुन सकता था। “ये मेरा नहीं है।”
“क्या मतलब?”
“ये आवाज़…” उसने कहा। “मैं इसे जानता हूँ। ये मेरे पास है। ये मेरे साथ…”
वो रुक गया। उसने अपनी कलाई को देखा, जो अब भी नीली रोशनी में फँसी हुई थी। फिर उसने मेरी तरफ़ देखा।
“ये मुझसे बात करती है,” उसने कहा। “रात में। दफ़्तार में। जब मैं अकेला होता हूँ।”
मेरी रीढ़ में ठंडी लहर दौड़ी।
“कब से?” मैंने पूछा।
“बाईस साल से,” उसने कहा।
और फिर उसकी कलाई पर से नीली रोशनी खत्म हो गई। जैसे किसी ने दीया बुझा दिया। रणवीर अपनी कलाई पकड़कर झुक गया। वो मेज़ का सहारा लेकर खड़ा रहा, साँस लेता रहा, और उसकी साँस की आवाज़ पूरे मैदान में सुनाई दे रही थी।
मैंने पीछे देखा।
पापा खड़े थे, माँ काजल के सहारे खड़ी थीं, मेरी तरफ़ देख रही थीं।
मैंने उनकी तरफ़ देखा और मेरे मुँह से एक ही बात निकली।
“ये आवाज़,” मैंने कहा, “इस मैदान में पहली बार नहीं आई है।”
उस्ताद ने सिर हिलाया।
“नहीं,” उन्होंने कहा। “ये पचास साल पहले भी आई थी। उस रात। जब पाठशाला जली।”
कमला ने अपनी लाठी ज़मीन से उठाई। उनका हाथ काँप रहा था, पर उन्होंने उसे उठाया। फिर वो धीरे से बोलीं, इतनी धीरे कि मैंने सुना पर यक़ीन नहीं हुआ कि ये उन्होंने कहा।
“जब पाठशाला जली,” उन्होंने कहा, “तो तीन आदमी थे।”
सब उनकी तरफ़ देखने लगे।
“तीसरे का नाम किसी को नहीं पता,” कमला ने कहा। “पर मैं जानती हूँ कि वो कहाँ है।”
मैदान की हवा में फिर वो सुई जैसी चुभन हुई, इस बार छोटी, जैसे कोई चेतावनी दे रहा हो।
और मेरी जेब में घंटी ने फिर एक बार काँपकर, बहुत धीमे, बहुत दूर से आती आवाज़ में कहा।
“अब वो आएगा।”
मैंने अपनी जेब पर हाथ रखा।
“कब?” मैंने फुसफुसाया।
घंटी ने कुछ नहीं कहा। पर मुझे लगा, जैसे बहुत दूर किसी अंधेरे कमरे में, कोई बूढ़ा आदमी अपनी कुर्सी से उठा हो। और मेरी रीढ़ ने मुझे बता दिया कि यह रात अभी खत्म नहीं हुई।
रणवीर ने अपना सीधा हाथ उठाया। उसकी हथेली पर एक पतली नीली लकीर बन गई थी, जैसे किसी ने स्याही से एक रेखा खींच दी हो।
“देखा?” उसने कहा। उसकी आवाज़ अब भी काँप रही थी, पर उसमें पुरानी चीज़ लौट रही थी। “ये सब तुम्हारी वजह से हुआ है।”
“नहीं,” मैंने कहा।
“तुमने ये ताले खोले,” उसने कहा।
“ताले खुद खुले,” मैंने कहा। “और तेरे हाथ में ये आज पहली बार नहीं आई है। तू इसे जानता है। तू इसे बाईस साल से जानता है।”
रणवीर ने अपना हाथ नीचे किया। उसने अपनी हथेली को रगड़ा, फिर अपने कुर्ते से पोंछा, जैसे वो लकीर मिट जाएगी।
लकीर नहीं मिटी।
“कल दो बजे,” उसने कहा। “मेरे दफ़्तार में।”
“क्यों?”
“क्योंकि अब मुझे भी जानना है,” उसने कहा। “ये आवाज़ क्या है। और इसका मुझसे क्या हिसाब है।”
वो पलटा। वो चला। उसके कदम अब भी धीमे थे, पर वो भाग नहीं रहा था। वो जा रहा था।
और ठीक गाड़ी के पास जाकर वो रुका।
उसने पलटकर मुझे देखा।
“अंकुश,” उसने कहा, “तू मुझसे नफ़रत करता है। मैं जानता हूँ। और मैं तुझसे नफ़रत करता हूँ। पर आज एक बात जान ले। तेरी घंटी अब आधी है। ये सच है। पर जो आधी उसके पास है, वो उसने चुराई नहीं।”
“तो?”
“वो उसने मुझे दी थी,” रणवीर ने कहा।
मैं चुप रहा।
“बाईस साल पहले,” उसने कहा। “एक आदमी ने मुझे दी। और कहा कि इसकी जीभ मेरे पास रहेगी, जब तक हिसाब पूरा नहीं होता।”
“कौन सा आदमी?” मैंने पूछा।
रणवीर मुस्कुराया।
पर वो पुरानी मुस्कान नहीं थी। वो थकी हुई मुस्कान थी, जैसे कोई बहुत पुरानी बीमारी का नाम बता रहा हो।
“कल दो बजे,” उसने कहा। “आएगा तो पता चलेगा।”
और वो गाड़ी में बैठ गया।
गाड़ी चली गई। उसकी पीली रोशनी धूल में दूर तक गई और फिर गली के मोड़ पर मुड़कर खत्म हो गई।
मैदान में सन्नाटा था।
फिर टिंकू ने मेरा हाथ पकड़ा।
“भाई,” उसने कहा। “ये आवाज़… ये आवाज़ ने कहा कि ताला अब एक का नहीं, दो का है।”
“हाँ,” मैंने कहा।
“तो इसका मतलब…” उसने धीरे से कहा। “इसका मतलब ये ताला दो लोगों का है।”
“हाँ।”
“तो…” उसने मेरी तरफ़ देखा। “तो रणवीर का हाथ क्यों उलझा?”
मैंने मेज़ पर पड़े ताले उठाए। दोनों। एक हाथ में एक, दूसरे में दूसरा। वो अब ठंडे नहीं थे। वो गरम थे। हल्के गरम, जैसे कोई आदमी बुखार में हो।
“क्योंकि,” मैंने कहा, “ताला दो का है। और रणवीर ने आज पहली बार उसमें से एक होने की कोशिश की।”
सानिया ने पीछे से कहा, “तो वो कौन है दूसरा?”
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।
उस्ताद ने मेरी आँखों में देखा, फिर अपनी आँखें नीची कर लीं।
“अंकुश,” उन्होंने कहा। “अब तू मुझसे वो मत पूछ जो मैं पचास साल से छिपा रहा हूँ। मैं थक गया हूँ।”
“फिर किससे पूछूँ?”
“उससे,” उस्ताद ने कहा, और कमला की तरफ़ देखा।
कमला उठ चुकी थीं। वो अपनी लाठी के सहारे खड़ी थीं और उनकी आँखें अंधेरे में किसी एक जगह टिकी थीं, जहाँ रणवीर की गाड़ी गई थी।
“कमला अम्मा,” मैंने कहा।
“हाँ बेटा,” उन्होंने कहा।
“वो तीसरा आदमी कौन है?”
कमला ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में कुछ था जो बहुत पुराना था। बहुत पुराना और बहुत थका हुआ।
“बेटा,” उन्होंने कहा, “वो तीसरा आदमी…”
वो रुकीं।
“वो तीसरा आदमी मरा नहीं है,” उन्होंने कहा। “वो यहीं है। इसी शहर में। और वो आज रात किसी के घर में बैठा है।”
उन्होंने अपनी लाठी से ज़मीन पर टक किया।
“और सबसे डरने वाली बात,” उन्होंने कहा, “वो तुम्हारा ही कोई है।”
मैदान में एक बार फिर साँस थम गई।
और मेरी जेब में घंटी, बहुत धीमे, एक बार बजी।
“हाँ,” घंटी ने कहा। “हाँ।”
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