The Mysterious Bell – Chapter 1476
“मैंने बाईस साल डरा हुआ आदमी होकर काटे हैं,” पापा ने कहा। “आज मुझे डर नहीं है। और जब आदमी को डर नहीं होता, तो उसके सामने पत्थर भी पत्थर नहीं रहता। वो सिर्फ़ एक ईंट का टुकड़ा रह जाता है।”
“आपको लगता है मैं नहीं…”
“मैं जो कहूँगा वो सुन,” पापा ने कहा।
उनकी आवाज़ धीमी थी। पापा हमेशा धीमी आवाज़ में बोलते हैं। पर आज वो धीमी आवाज़ मैदान के आख़िरी कोने तक पहुँची। मुझे नहीं पता कैसे। शायद चुप्पी इतनी गहरी थी कि धीमी आवाज़ भी उसमें गूँज गई।
“तूने मुझसे बाईस साल पहले एक अंगूठा लिया था,” पापा ने कहा। “डर के मारे दिया था, यह सच है। और मैंने इसे कभी नहीं भुलाया। हर रात सोने से पहले सोचता हूँ कि मैं उस दिन कैसे बैठ गया था। पर आज मुझे समझ आ गया कि डर सिर्फ़ एक बार आता है। बाद में जो रहता है, वो डर नहीं, आदत होती है।”
“तो?”
“तो आज वो आदत भी खत्म हो रही है,” पापा ने कहा।
और फिर माँ की आवाज़ आई।
हम सब पलटे। माँ आ रही थीं, काजल के सहारे से, बालों में सफ़ेद दुपट्टा, हाथ में काजल का हाथ। अस्पताल से लौटी नहीं थीं — वो शाम ही हमारे साथ आई थीं। पर जब से काग़ज़ खुला था, वो चबूतरी के किनारे बैठी थीं, और मैं उन्हें भूल गया था। मैं उन्हें भूल गया था, यह सोचकर मेरे भीतर कुछ ऐसा कसा कि मुँह सूख गया।
वो धीरे-धीरे आईं। सहारा लेकर। चार कदम से ज़्यादा नहीं। पर वो किसी का सहारा लेकर खड़ी थीं, बैठी नहीं थीं।
“हर पैसा चुकेगा,” माँ ने कहा।
रणवीर ने उनकी तरफ़ देखा।
“चौदह हज़ार दो सौ,” माँ ने कहा। “ब्याज लगा। मैं खुद हिसाब लगाऊँगी। महीने में जितना बनता है, उतना दूँगी। ज़मीन बेचकर नहीं, दुकान बेचकर नहीं, अपने हाथ से। तुझे रोटी बनाकर नहीं दूँगी, यह अलग बात है। पर पैसा चुकेगा।”
भीड़ में कोई हँसा। एक छोटी सी हँसी। तनाव की हँसी।
माँ ने आगे कहा, “पर ईमान नहीं चुकेगा। क्योंकि ईमान मेरा नहीं है। वो मेरे बेटे की दुकान पर टँगा है, जो आज भी टेढ़ा है, और टेढ़ा ही रहेगा।”
रणवीर का पत्थर अब भी हवा में था।
“और ताले?” रणवीर ने कहा। “ताले किसने तोड़े?”
“ताले खुद टूटे,” उस्ताद ने कहा। वो अब खड़े थे। “मैंने देखा। मैंने बनाए थे। मुझे पता है ताला किस तरह खुलता है और किस तरह टूटता है। जो ताला दो हाथों से बंद हो, वो दो हाथों से ही खुलता है। तीसरा हाथ लाने की कोशिश में ही टूट जाता है।”
उस्ताद की आवाज़ में आज कोई हिचक नहीं थी। वो पचास साल की चुप्पी पीकर आज बोल रहे थे, और जो आदमी एक बार बोलना शुरू कर दे, उसे फिर रोकना मुश्किल होता है।
“तूने तीसरा हाथ लाने की कोशिश की,” उस्ताद ने कहा। “रमेश को लाया। गाड़ी में और लोगों को लाया। पर ताले दो हाथ के थे। दो हाथ आए, ताले खुले। तेरा तीसरा हाथ बेकार गया।”
रणवीर की आँखें सिकुड़ीं।
“और अब?” उसने कहा। “अब ताले टूट गए। तो अब क्या? ताला ही नहीं बचा।”
“ताला टूटा,” उस्ताद ने कहा, “पर वो जो अंदर बंद था, वो तेरी जेब में नहीं आया। यही तेरी हार है।”
रणवीर ने एक लंबी साँस ली।
और फिर, ठीक उसी तरह जैसे कोई तैयारी करता है, उसने पत्थर और ऊपर उठाया।
“तो अब अंकुश,” उसने कहा। “तू आगे आ। तेरा यह तमाशा तेरे बिना अधूरा है।”
मैं आगे बढ़ा।
पर जैसे ही मैं मेज़ के पास पहुँचा, मेरी जेब से कुछ हुआ।
घंटी गरम नहीं हुई। घंटी ठंडी नहीं हुई। घंटी ने आवाज़ नहीं की।
घंटी बर्फ़ जैसी ठंडी हो गई।
इतनी ठंडी कि मेरी जाँघ पर जैसे कोई बर्फ़ का टुकड़ा रख दे। मैंने पलक झपकाई और मेरी साँस रुक गई। मैंने जेब से हाथ निकाला — नहीं, नहीं निकाला। मैंने घंटी जेब में ही छोड़ी और आगे बढ़ता रहा, क्योंकि अगर मैं अब रुक जाता, तो रणवीर को लगता कि मैं डर गया।
“क्या बात है?” रणवीर ने कहा। “रंग उतर गया?”
“कुछ नहीं,” मैंने कहा। “बस, आज तू मुझसे ज़्यादा पसीना बहा रहा है।”
किसी ने हँसा। चिंटू ने। और वो हँसी मेरे लिए हवा जैसी थी।
मैं मेज़ के पास पहुँचा। दोनों ताले मेज़ पर पड़े थे। एक मंसूर का, एक उस्ताद का। दोनों टूटे हुए। दोनों के किनारे कटे हुए, जैसे किसी ने अंदर से दरवाज़ा खोलने की कोशिश में ज़ोर लगाया हो।
मैंने हाथ आगे किया।
और जैसे ही मेरी उँगली ताले से एक हाथ की दूरी पर पहुँची, मेरी जेब में घंटी ने मेरी हड्डी तक ठंडक भेज दी।
मैंने हाथ वापस खींच लिया।
“तू ताले को छू नहीं सकता,” रणवीर ने कहा, और उसकी आवाज़ में मज़ा लौट रहा था। “देखा? तेरी घंटी भी जानती है कि अब तू आधा है।”
मैदान में फुसफुसाहट फैली।
“उसने ठीक कहा?” किसी ने पीछे से कहा।
“घंटी क्यों नहीं…”
“चुप,” शबनम आपा ने कहा। उनकी आवाज़ चिमटी जैसी थी।
रणवीर ने पत्थर और ऊपर किया। अब उसका हाथ सीधा मेरे सिर के ऊपर था।
“अब देख,” उसने कहा। “जब से तू आया है, यह गली बदल गई है। तेरे आने से पहले यहाँ शाम को चूल्हे जलते थे, बच्चे खेलते थे, अस्पताल में मरीज़ सोते थे। अब? अब यहाँ दीये जलते हैं, सच बोले जाते हैं और आदमी रोते हैं। तूने गली को हँसना बंद करवा दिया।”
“नहीं,” मैंने कहा। “चूल्हे आज ज़्यादा जले हैं। यह तेरी गिनती की गड़बड़ी है।”
“तू मज़ाक कर रहा है,” उसने कहा। “और जब आदमी जानता है कि वो हार रहा है, तब वो मज़ाक करता है।”
“नहीं,” मैंने कहा। “जब आदमी जानता है कि वो अब भी ज़िंदा है, तब मज़ाक करता है।”
रणवीर ने पत्थर और ऊपर किया।
और तभी मैदान की हवा में एक आवाज़ उठी।
बहुत धीमी। बहुत पतली। इतनी पतली जैसे किसी ने सुई को हवा में रखकर बजाया हो। सुई जैसी चुभन। कान से सीधा रीढ़ में, रीढ़ से सिर के पीछे।
मैंने देखा कि मेरे आसपास खड़े लोगों की गर्दनें एक साथ झुक गईं। भोला भाई ने कान पकड़े। नसीमा बाई ने आँखें बंद कर लीं। टिंकू ने मेरी कमीज़ पकड़ ली।
वो आवाज़ किसी की नहीं थी। वो आवाज़ किसी चीज़ की थी।
और वो मेरे कान में नहीं आई। वो मेरे हड्डी में आई।
फिर, उसी पल, मेज़ पर पड़े दोनों ताले हिले।
नहीं हिले — जैसे साँस ली।
दोनों के किनारों से नीली रोशनी निकली। बहुत हल्की। इतनी हल्की कि अगर दीये न जल रहे होते, तो किसी को दिखती भी नहीं। पर दीये जल रहे थे, और वो रोशनी उनकी पीली लौ के बीच नीली लकीर बनकर उभरी।
वो रोशनी बाहर नहीं फैली। वो ऊपर उठी।
सीधी ऊपर।
और रणवीर का हाथ ठीक उसी जगह था।
नीली रोशनी उसके पत्थर वाले हाथ को जकड़ लिया।
नहीं — जकड़ा नहीं। उसे छुआ।
पर रणवीर काँपा।
मैंने उसे पहली बार काँपते देखा। काँपते नहीं — ऐसे, जैसे कोई आदमी बहुत ठंडे पानी में हाथ डाल दे और पूरा शरीर एक झटके में सिकुड़ जाए।
उसका पत्थर हवा में ही रह गया। उसके हाथ की उँगलियाँ खुल गईं। पत्थर गिरा।
धड़ाम।
और ज़मीन पर पड़ा पत्थर दो हिस्सों में बँट गया।
रणवीर ने पीछे हटने की कोशिश की, पर उसका हाथ नीली रोशनी में फँसा हुआ था। वो खींचता रहा। उसकी कलाई पर नसें उभर आईं। उसके माथे पर पसीना आ गया।
और उसकी मुस्कान — वो मुस्कान जो पचास साल से इस शहर की सबसे बड़ी ताक़त थी — पूरी तरह गिर गई।
वो गिरी और लौटी नहीं।
“ये क्या है?” वो फुसफुसाया।
मुझे नहीं पता था कि वो किससे पूछ रहा था। मुझसे? अपने आप से? अपनी गाड़ी में बैठे उस आदमी से?
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। घंटी अब भी बर्फ़ जैसी ठंडी थी, पर जब मैंने उसे छुआ, तो वो एक बार हल्की काँपी। इतनी हल्की कि जैसे कोई सोते हुए आदमी करवट बदल दे।
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