The Mysterious Bell – Chapter 1474
मैंने उस्ताद को देखा। उस्ताद ने अपनी गर्दन ऊपर की। उनकी आँखें बंद थीं। उनके चेहरे पर पानी था। पर वो रो नहीं रहे थे। वो सूँघ रहे थे।
"यह महक," उन्होंने कहा, "मेरे भाई की है। मेरे घर की। मेरी माँ के संदूक की।"
उन्होंने आँखें खोलीं।
"और यह महक," उन्होंने कहा, "रणवीर की तरफ़ से नहीं आ रही।"
रणवीर ने अपना ताला उठाया। उसने सूँघा। उसका चेहरा बदला।
"यह महक," उसने कहा, "मेरी माँ के कमरे की भी है।"
उसकी आवाज़ काँपी।
वो फिर बोला। "मेरी माँ भी यही इत्र लगाती थी। चंदन और कपूर।"
उस्ताद ने रणवीर को देखा। बहुत देर तक। फिर उन्होंने ताला ज़मीन से उठाया और उसे अपने सीने से लगाया।
"तो," उस्ताद ने कहा, "यह महक दोनों की है।"
भीड़ में सन्नाटा। गहरा। भारी।
फिर रणवीर ने बहुत धीरे से कहा, "मेरी माँ मरने से पहले मुझे कुछ बताना चाहती थी।"
उसने रुककर सबको देखा।
"उन्होंने कहा था — बेटा, तेरे बाप ने जो किया, उसका हिसाब तुझे नहीं देना। पर तेरे बाप ने जो छिपाया, उसका हिसाब किसी को तो देना पड़ेगा।"
रणवीर की आँखें गीली थीं। उसने पोंछा नहीं।
"वो बात मैंने दबा दी," उसने कहा। "क्योंकि मुझे अपने बाप की दुकान चाहिए थी। मुझे अपना नाम चाहिए था। मुझे यह मोहल्ला चाहिए था। और मुझे लगा — जब सब मेरा हो जाएगा, तो मैं वो बात भी कह दूँगा। पर वो बात कहने का वक़्त कभी नहीं आया।"
उसने ताला उठाया। उसे उस्ताद की तरफ़ किया। फिर अपनी जेब की तरफ़। फिर वापस उस्ताद की तरफ़।
"उस्ताद," उसने कहा। "मैं चाहता हूँ कि यह ताला तुम्हारे पास रहे।"
उस्ताद ने उसका ताला लिया। दोनों हाथों से। और उसे अपने ताले के साथ सीने से लगा लिया।
"तुम्हारी माँ की याद," उस्ताद ने कहा, "मेरे भाई की याद से अलग नहीं है। दोनों एक ही रात गईं। दोनों एक ही ताले में बंद रहीं।"
वो चुप हो गए।
और तभी मैंने देखा।
उस्ताद के ताले से एक रोशनी निकली। पीली, हल्की, जैसे दीये की लौ छोटी करके किसी ने ताले के भीतर रख दी हो। फिर वो रोशनी रणवीर के ताले में गई। फिर वापस आई। ऐसे कुछ देर तक दोनों तालों के बीच रोशनी चलती रही — आती, जाती, आती, जाती। जैसे दो आदमी एक-दूसरे की आँखों में कुछ ढूँढ रहे हों और उन्हें मिल रहा हो।
फिर रोशनी बुझ गई।
और उस्ताद ने अपना ताला ज़मीन पर रखा। उन्होंने रणवीर को देखा।
"अब," उन्होंने कहा। "अब यह ताले बंद नहीं होंगे।"
रणवीर ने अपना ताला ज़मीन पर रखा। उसने कुछ कहा। पर आवाज़ इतनी धीमी कि मुझे नहीं सुनाई। पर उस्ताद ने सुना। उन्होंने सिर हिलाया।
फिर रणवीर ने मेरी तरफ़ देखा।
"अंकुश," उसने कहा। "तूने अपना हिसाब देख लिया। अब एक और हिसाब है।"
"कौन सा?" मैंने पूछा।
"जो मेरे पास है," उसने कहा। "जो मेरे ताले में नहीं, मेरे दफ़्तार में है।"
मैंने उसे देखा। उसकी आँखों में वो ठंड नहीं थी। पर वो गीली भी नहीं थीं। उनमें कुछ था जो मुझे समझ नहीं आया। कुछ ऐसा जो वो अभी तक छिपा रहा था। और आज, आधा खुल चुका था।
"कल तक," मैंने कहा। "मैं आपके दफ़्तार आऊँगा। अपने हिसाब के साथ।"
रणवीर हँसा। पर बहुत हल्की हँसी। "तू आएगा," उसने कहा। "मुझे पता है तू आएगा।"
वो पलटा और अपने आदमियों के साथ चल पड़ा।
मैंने उस्ताद को देखा। उस्ताद ज़मीन पर बैठे थे — वहीं, चबूतरी के किनारे। उनके हाथों में दोनों ताले थे।
पापा उनके पास गए। "उस्ताद," उन्होंने कहा।
उस्ताद ने अपनी आँखें उनकी तरफ़ की।
"शंकर," उन्होंने कहा। "पचास साल। पचास साल का हिसाब। आज खत्म हुआ।"
और वो रोए।
मैंने कभी उस्ताद को रोते नहीं देखा था।
वो बैठे रहे। उनकी दाढ़ी गीली हो गई। उनके कंधे हिलते रहे। पर उन्होंने कोई आवाज़ नहीं की। और पापा उनके पास बैठ गए और उनके कंधे पर हाथ रखा।
भीड़ धीरे-धीरे छँटने लगी।
मीरा मेरे पास आई। उसका कैमरा बंद हो चुका था। उसने मेरा हाथ पकड़ा।
"अंकुश," उसने कहा। "मैंने सब रिकॉर्ड कर लिया। पूरा।"
"अच्छा किया," मैंने कहा।
उसकी आँखों में सवाल था।
"पर यह अभी खत्म नहीं हुआ," मैंने कहा। "यह बस शुरू हुआ है।"
"क्यों?" उसने पूछा।
"क्योंकि उसके पास अभी भी वो चीज़ है," मैंने कहा। "जो मेरे पास नहीं। और जो वो आज नहीं दे पाया।"
मीरा ने सिर हिलाया। उसने कुछ कहना चाहा। पर उससे पहले…
टिंकू दौड़ता हुआ आया।
उसका चेहरा उतरा हुआ था।
"भाई," उसने कहा, "वो बबलू का स्कूटर…"
"क्या?"
"वो नहीं है," टिंकू ने कहा। "न स्कूटर है, न बबलू।"
मैंने चारों तरफ़ देखा। बबलू नहीं था। उसकी हरी टॉर्च नहीं थी। मैंने पूरे मैदान में देखा। भीड़ से भी आगे, पीछे के प्लॉट की तरफ़।
तभी मैंने सुना। पीपल के पीछे से, नाली के उस पार से, एक आवाज़ आई।
बबलू की आवाज़।
"अंकुश!" वो चिल्ला रहा था। "अंकुश, यहाँ आ जल्दी!"
मैं दौड़ा।
पीपल के पीछे, सूखी नाली के उस पार, बबलू घुटनों के बल था।
उसकी हरी टॉर्च दूर पड़ी थी। और उसके सामने ज़मीन पर, पीली रोशनी में, एक काग़ज़ पड़ा था। एक ही पन्ना। छोटा। पीला।
बबलू ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें डर से फैली हुई थीं।
"मैंने इसे यहाँ नहीं रखा," उसने कहा। "मैं तुम्हारे साथ था। मैं तुम्हारे पीछे था।"
"फिर यह कैसे आया?" मैंने पूछा।
"मुझे नहीं पता," बबलू ने कहा। "मैंने बस देखा… कोई गुज़रा। सफ़ेद। बहुत तेज़। और फिर यह गिरा।"
मैंने काग़ज़ उठाया।
उस पर पेंसिल से, हल्की लिखाई में, सिर्फ़ एक लाइन थी।
"कल, मेरे दफ़्तार में, दोपहर दो बजे। अकेला आ। तेरे पास जो भी है, लेकर आ। तेरे पिता के पास भी कुछ है। वो भी लेकर आ।"
मैंने काग़ज़ पलटा। पीछे कुछ नहीं था।
मैंने बबलू को देखा। उसे ऊपर उठाया। "उठो," मैंने कहा। "यह किसने दिया, तुझे पता है?"
उसने सिर हिलाया — ना में।
"पर मैं यह जानता हूँ," उसने कहा। "इस लिखाई के अंदाज़ से पता चलता है। यह उसी का है। सफ़ेद कुर्ते वाले का।"
मैंने काग़ज़ जेब में रखा।
"अंकुश," बबलू ने कहा। "मैं तुम्हारे साथ चलूँगा।"
"कल?"
"ना," उसने कहा। "आज। जहाँ भी जाना है। मैं तुम्हारे साथ चलूँगा।"
मैंने उसे देखा। वो आज कुछ और लग रहा था। वो मोटा आदमी अंदर से छोटा हो गया था।
"चल," मैंने कहा।
पीपल के नीचे लौटकर मैंने सबको इकट्ठा किया।
पापा, कमला, मीरा, टिंकू, उस्ताद, गोविंद भाई, शबनम आपा, रज़िया, बबलू, सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू, हरिप्रसाद, डॉक्टर इसरानी, शालिनी।
सबके चेहरे पर एक ही सवाल था।
"अब?" मीरा ने पूछा।
मैंने उन्हें वो काग़ज़ दिखाया।
उन्होंने पढ़ा। कोई नहीं बोला। फिर उस्ताद ने अपनी दाढ़ी में हाथ फेरा और एक गहरी साँस ली।
"अंकुश," उन्होंने कहा। "यह जाल है।"
"हाँ," मैंने कहा। "पर एक बात सोचिए। जाल बनाने वाला पहले देखता है कि मछली कहाँ चल रही है। और इस आदमी ने हमारी गली के सबसे बड़े सच को आज सबके सामने खुलने दिया। जान-बूझकर।"
"तो?"
"तो इसका मतलब है," मैंने कहा, "कि उसका असली जाल कहीं और है। और यह काग़ज़ सिर्फ़ ध्यान भटकाने का है।"
रात की हवा में सबकी आवाज़ें धीमी हो गईं।
उस्ताद ने दोनों ताले अपने हाथों में उठाए और आसमान की तरफ़ देखा। फिर उन्होंने कहा।
"जो मैंने पचास साल में नहीं देखा," उन्होंने कहा, "आज देखा। ताले खुले। सच बोला। रणवीर रोया। अब मुझे उससे डर नहीं लगता।"
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