The Mysterious Bell – Chapter 1472
टिंकू ने अपना मुँह खोला और कहा, “भाई, ये ताले तो… ये ताले तो एक-दूसरे को देखकर शरमा रहे हैं।”
मैंने अपनी आँखें बंद कीं। मैदान के सन्नाटे की जगह आँगन में हँसी की एक लहर दौड़ गई।
पापा हँसे। मीरा के कैमरे के पीछे से भी एक छोटी सी हँसी आई।
“टिंकू,” मैंने कहा, “तू बस कुछ मत कह।”
“मैं तो सच कह रहा हूँ, भाई,” टिंकू ने कहा। “जब भी उस्ताद आगे बढ़ते हैं, ये ताला रणवीर की तरफ़ खिंचता है और जब रणवीर पीछे हटता है, ये उस्ताद की तरफ़। ये अगर ताले नहीं, तो क्या हैं?”
“ताले हैं,” उस्ताद ने धीरे से कहा, पर उनके होठों पर एक हल्की सी मुस्कान थी। “पर तुम सही हो। आज रात के बाद, जब ये अलग होते हैं, ये हमें ढूँढते हैं।”
रणवीर ने अपनी आवाज़ सँभाली। “तो ताले मिल गए। अब?”
उस्ताद ने उसकी तरफ़ देखा।
“अब सच का वक़्त है,” उन्होंने कहा।
“कौन सा सच?” रणवीर ने कहा। “जो सभा में बोला गया?”
“जो सभा में नहीं बोला गया,” मैंने कहा। मैंने अपनी जेब से घंटी निकाली। वो अब गरम नहीं थी, ठंडी नहीं — न जाने क्या थी। एक हल्की गुनगुनाहट जैसी। मैंने उसे दोनों हाथों में रखा।
“घंटी,” मैंने कहा, “अब क्या?”
घंटी हिली। एक बार बजी, धीरे।
फिर मेरे हाथ में एक आवाज़ आई। बहुत धीमी। बहुत छोटी। दो शब्द।
“दो। आँगन।”
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा। फिर मैदान की तरफ़। फिर रणवीर की तरफ़।
“उस्ताद,” मैंने कहा।
“मैंने सुना,” उन्होंने कहा।
रणवीर ने अपनी गर्दन झुकाई। “क्या कहा तेरी घंटी ने?”
“कहा कि दोनों ताले मैदान में ले चलो,” मैंने कहा। “वहीं फैसला होगा।”
“यहाँ क्यों नहीं?”
“क्योंकि,” उस्ताद ने कहा, “आप जहाँ ताले खोलेंगे, वहाँ गवाह चाहिए। और हम आपके घर में गवाह नहीं बनेंगे।”
रणवीर ने उनकी तरफ़ देखा। फिर मेरी तरफ़। फिर मीरा के कैमरे की तरफ़। उसके चेहरे पर अब वो पहली सी हँसी नहीं थी। अब उसके होठों पर सिर्फ़ एक लकीर थी।
“मैदान,” उसने कहा, जैसे शब्द को तोल रहा हो। “और वहाँ क्या होगा?”
“वहाँ यह होगा,” उस्ताद ने कहा, “कि मेरा ताला और आपका ताला दोनों खुलेंगे। किसके हाथ में क्या है, यह सब देखेंगे।”
“और अगर नहीं खुले?”
“तो जो आप कह रहे हैं, वो सच होगा। और जो मैं कह रहा हूँ, वो झूठ।”
रणवीर ने एक लंबी साँस ली।
“ठीक है,” उसने कहा। “मैदान।”
और फिर उसने एक कदम बढ़ाया।
“पर एक शर्त,” उसने कहा। “ताले मेरे हाथ में रहेंगे। दोनों।”
उस्ताद ने उसकी तरफ़ देखा। मुस्कान उनके चेहरे से उतर गई थी।
“क्यों?”
“क्योंकि मैं जानता हूँ कि तेरी घंटी क्या कर सकती है,” रणवीर ने कहा। “अगर यह ताला तेरे हाथ में रहा, तो तू इसे कहीं भी छिपा देगा।”
“तो ताले मेरे हाथ में,” उस्ताद ने कहा। “मैं भी जानता हूँ कि तू क्या कर सकता है।”
“नहीं,” रणवीर ने कहा, “दोनों ताले एक ही हाथ में नहीं।”
“तो क्या?”
“कोई तीसरा हाथ,” रणवीर ने कहा। “किसी का भी। जो न तेरा हो, न मेरा।”
मैंने उन दोनों के बीच देखा। उस्ताद की आँखें रणवीर पर टिकी थीं। रणवीर की आँखें उस्ताद पर।
“रमेश,” रणवीर ने पुकारा।
दरवाज़े पर खड़े तीनों में से एक आगे आया। मैंने उसे देखा — बड़ा, चौड़ा, सफ़ेद कुर्ता। चेहरा पहचाना नहीं। हाथ में कोई हथियार नहीं। सिर्फ़ खाली हाथ।
“यह रमेश है,” रणवीर ने कहा। “मेरा ड्राइवर। बारह साल से मेरे साथ है। न इसका कोई झगड़ा उस्ताद से है, न किसी से।”
उस्ताद ने रमेश को देखा।
“ठीक है,” उन्होंने कहा। “पर एक बात।”
“क्या?”
“रमेश भी मैदान में आएगा। मेरे साथ। अगर वहाँ कुछ गड़बड़ हुई, तो यह पहला गवाह होगा।”
रणवीर ने एक पल सोचा, फिर सिर हिलाया।
“ठीक है,” उसने कहा।
और तभी उसने दोनों ताले उठाए।
एक उसका, एक उस्ताद वाले। उसने उन्हें अपनी हथेली में रखा और ज़ोर से बंद कर दिया। दोनों ताले उसकी हथेली में एक-दूसरे के खिलाफ़ टकराए। मैंने देखा — दोनों के निशान पास आ गए थे, और निशानों के बीच की जगह में हवा का एक झोंका भर गया।
“चलो मैदान,” रणवीर ने कहा। उसकी आवाज़ में फिर वो पुरानी लय आ गई थी, जो किसी चीज़ को जीत लेने वाले की होती है — तेज़, साफ़, फिसलन भरी। “वहीं तय होगा कि याद किसकी है।”
वो घूमा। उसने तीन कदम उठाए। दरवाज़े की तरफ़।
और मैंने देखा — टिंकू की कमीज़ पकड़कर खींची गई थी। किसने? टिंकू ने खुद।
“टिंकू?” मैंने कहा।
“भाई,” टिंकू ने धीरे से कहा, “मैं भी चलूँगा।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
“मैं भी,” सानिया की आवाज़ दरवाज़े से आई। दरवाज़े पर खड़ी थी — आधी ही दिख रही थी, बाकी दीवार के पीछे। उसके पीछे गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू।
“तुम लोग इतनी देर तक बाहर क्या कर रहे थे?” मैंने पूछा।
“भाई,” सानिया ने कहा, “आपने कहा था खबर लाना।”
“हाँ, पर —”
“पर आपने यह नहीं कहा था,” सानिया ने कहा, “कि हमें बाहर रहना है।”
मैंने पीछे देखा। मीरा ने अपना कैमरा मेरी तरफ़ घुमाया और फिर दरवाज़े की तरफ़। मैंने देखा — बाहर झुककर एक चेहरा दिख रहा था। माँ।
नहीं — माँ अस्पताल में थीं। यह कौन था? मैंने पास जाकर देखा। शबनम आपा। सिर्फ़ एक झलक — दीवार के पीछे से रज़िया के साथ।
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा। उनके चेहरे पर सब समझ थी। पापा ने धीरे से सिर हिलाया। वो जानते थे।
रणवीर आख़िरी बार रुका। उसने पीछे देखा। उसके चेहरे पर एक पल को कुछ ऐसा आया जो मुझे पहले नहीं दिखा था — कुछ जो उसकी पुरानी मुस्कान से नहीं बनता था। वो बात नहीं कह रहा था, बस देख रहा था — दरवाज़े की तरफ़, फिर उस्ताद की तरफ़, फिर मेरी तरफ़।
“चलो,” उसने कहा, और दरवाज़े से बाहर आ गया।
उसके पीछे उसके तीन आदमी। उनके पीछे मैं, उस्ताद, पापा, मीरा, टिंकू। दरवाज़े पर सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू। सानिया ने हाथ बढ़ाया। मैंने उसे पकड़ा।
और उस आँगन में, हम आख़िरी बार इस तरह खड़े थे — एक गली जिसे साइकिल गली कहते हैं, अगर यह गली नहीं होती तो हम सब यहाँ नहीं होते। पर यह गली थी, और हम सब थे, और उस्ताद के सीने पर एक ताला अब भी दबा था — नहीं, अब वो रणवीर के हाथ में था — पर उसका निशान अभी भी उस्ताद की कमीज़ पर बना था।
मैं बाहर आया। राख में मेरा पैर फिसला। मैंने पीछे देखा। वो पैरों के निशान थे — ताज़े। लकड़ी के जूतों वाले। और उनके साथ बच्चे जैसे नंगे पैरों के जोड़ की छाप।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने भी देखा था। उसने अपना कैमरा उन निशानों पर टिकाया — फिर से, शायद एक बार और नहीं — और फिर आगे देखा।
गाड़ी का दरवाज़ा हमारे लिए खुला था। रमेश ने पहला ताले वाला हाथ खोला। उस्ताद ने दूसरा अपने सीने से निकालकर दोनों तरफ़ से देखा और धीरे से कहा, “भाई, आज तू साथ है।”
मैंने जेब में हाथ डाला। घंटी ठंडी थी। पर मैंने उसे छोड़ने से पहले एक बार छुआ — ऐसे जैसे किसी से भीतर ही भीतर कह दिया हो कि अब तू कहेगी क्या।
घंटी ने कुछ नहीं कहा।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने अपनी आँखों से मुझे बताया — चलो।
मैं गाड़ी की तरफ़ बढ़ा। पापा मेरे साथ थे। टिंकू सीधे मेरे पीछे। सानिया रफ़ीक़ का हाथ पकड़कर चल रही थी। गुड्डू कुछ बुदबुदा रहा था, पर कुछ ऐसा जो नहीं दोहराया जाए।
और पीछे, दरवाज़े की दहलीज़ पर, मैंने एक बार फिर वो कुंडा देखा — जिसका पुराना ताला अब खुल चुका था, और जिसमें चाबी अभी भी लगी थी।
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