The Mysterious Bell – Chapter 1471
रणवीर। सफ़ेद कुर्ता, सफ़ेद पैंट, जूते चमकते हुए। पर आज उसके जूतों पर धूल थी। उसने जल्दी में चली गाड़ी से उतरकर आने की ज़हमत की थी — यही बात मुझे सबसे ज़्यादा बताती थी कि अब वो डरा हुआ है।
वो आँगन के बीच में रुका। चारों तरफ़ देखा। चूल्हे पर उल्टा पड़ा भगौना। राख। खुला आटे का डिब्बा। टूटी खिड़की। और उस्ताद के सीने पर दबा हुआ ताला।
उसने गहरी साँस ली और धीरे से बोला, “यह मकान मेरे नाम है।”
कोई नहीं हिला। टिंकू ने मेरी कमीज़ और कसकर पकड़ ली।
“काग़ज़ में यह मकान मेरे नाम है,” रणवीर ने फिर कहा, “और इसकी ज़मीन भी। जो इस दरवाज़े के अंदर है, वो सब मेरा है। आज रात के बाद कोई यहाँ रहने नहीं आएगा।”
मैंने अपनी जेब के ऊपर हाथ रखा। घंटी अब भी गरम थी।
“रणवीर साहब,” मैंने कहा, “आप अपना काग़ज़ लेकर आए हैं?”
उसने मेरी तरफ़ देखा। “काग़ज़ की ज़रूरत नहीं, अंकुश। यह मेरी ज़मीन है। मैंने इसे खरीदा है।”
“खरीदा है,” मैंने कहा। “पर जिससे खरीदा, वो कौन है?”
“वो किसी का काम नहीं।”
“किसी का काम नहीं है,” मैंने कहा, “या आपको पता नहीं कौन है?”
रणवीर के चेहरे पर कोई हरकत नहीं आई। पर मैंने देखा — उसकी बाईं उँगली हल्की सी हिली। वो उँगली जहाँ काले धागे का निशान था और जहाँ आज काले धागे की जगह एक काली चीज़ फिर दिख रही थी।
“अंकुश,” उसने धीरे से कहा, “तू बहुत बोलने लगा है।”
“आपने ही तो कहा था,” मैंने कहा, “कि सच बोलने से पहले सोचना चाहिए। मैंने सोचकर पूछा है।”
उस्ताद आगे आए। एक कदम मेरे आगे, फिर एक और। उनका हाथ सीने पर दबा हुआ। ताले की उभरी हुई लकीरें उनकी उँगलियों के नीचे दिख रही थीं।
“रणवीर साहब,” उस्ताद ने कहा। उनकी आवाज़ धीमी थी, पर साफ़। “मकान आपके नाम हो सकता है। पर यह ताला मेरे भाई की याद है।”
रणवीर ने उस्ताद को देखा। उसके होठों पर एक मुस्कान आई, पर बहुत पतली, बहुत ज़बरदस्ती की।
“याद?” उसने कहा। “उस्ताद, याद का दाम क्या है? आज के ज़माने में?”
“याद का दाम नहीं होता,” उस्ताद ने कहा। “याद का हिसाब होता है।”
“हिसाब,” रणवीर हँसा। “हिसाब मेरे साथ बैठकर बनता है, उस्ताद। तेरे पास क्या है?”
“यह,” उस्ताद ने कहा और ताला और ऊपर उठाया।
तभी मीरा का कैमरा चालू हुआ।
मैंने पीछे मुड़कर देखा। मीरा ने कैमरा उठाया था। उसकी लाल बत्ती जली हुई थी। उसने बिना कुछ कहे रणवीर की तरफ़ कैमरा सीधा किया।
“मिस्टर भारद्वाज,” मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ शांत थी, बस एक हल्की लय थी जो बताती थी कि वो कुछ ऐसा कहने वाली है जिसे पूरा शहर देखेगा। “यह कैमरा अभी चालू हुआ है और सीधा प्रसारण जा रहा है। मेरा चैनल छोटा है, पर कल के बाद उसके ग्राहक कम नहीं हैं।”
रणवीर की आँखें कैमरे पर टिकीं।
“तो फिर से कहिए,” मीरा ने कहा, “कि यह मकान आपका है। माइक चालू है।”
मैदान में जो सन्नाटा था, वो इस आँगन में उतरा। बाहर खड़े तीनों आदमियों ने एक-दूसरे को देखा।
रणवीर ने धीरे से कहा, “तुम्हें पता है, ऐसा कितने लोगों ने कहा है?”
“कुछ ने कहा होगा,” मीरा ने जवाब दिया। “पर उनके पास ऐसी घंटी नहीं थी जो बीस साल की चुप्पी तोड़ दे। मेरे पास है। और मेरा कैमरा भी।”
“कैमरा,” रणवीर ने कहा। “कैमरा तोड़ने की नौबत आई, तो?”
“कैमरा तोड़ दीजिए,” मीरा ने कहा। “सिर्फ़ यह नहीं है। और भी हैं।”
मैंने पापा की तरफ़ देखा। पापा आगे आए। उनका हाथ उनके सीने पर था, पापा की आदत के मुताबिक — कमीज़ की जेब पर। जैसे उन्होंने वहाँ कुछ रखा हो।
“रणवीर,” पापा ने कहा। उनकी आवाज़ कम थी पर बात करने में कोई झिझक नहीं थी। “तुमने कहा कि ताला तुम्हारी ज़मीन पर है। ताला तुम्हारी ज़मीन पर नहीं है। ताला ज़मीन से ऊपर है, उस्ताद के सीने पर। और तुम जो चीज़ उठाने आए हो — वो उस्ताद के भाई की याद है।”
रणवीर ने उनकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में मैंने देखा — एक हल्का सा सिकुड़ना, फिर सँभलना।
“हिसाब बाईस साल पुराना है, शंकर,” रणवीर ने कहा। “तुमने खुद अंगूठा लगाया था। याद है?”
“याद है,” पापा ने कहा। “और उसी वजह से आज यहाँ खड़ा हूँ।”
“तो फिर मेरी ज़मीन से हटो।”
“हटेंगे,” पापा ने कहा। “पर पहले एक बात सुन लो।”
रणवीर ने उनकी तरफ़ देखा।
“यह ताला,” पापा ने कहा और उस्ताद के सीने की तरफ़ इशारा किया, “अकेले नहीं खुलेगा।”
मैंने देखा — रणवीर के चेहरे पर कुछ हल्का सा बदला। यह वो नहीं था जो वो सुनना चाहता था।
“मंसूर के ताले अकेले नहीं खुलते,” पापा ने कहा। “दो ताले हैं। दोनों जुड़वाँ। एक उस्ताद के पास, दूसरा…”
पापा रुके।
“दूसरा किसके पास है?” रणवीर ने पूछा। उसकी आवाज़ में वो ज़रा सी जल्दबाज़ी आई थी, जो किसी के पास जवाब होने पर आती है और वो जानता है कि वो जवाब उसके हक़ में नहीं है।
“आप जानते हैं,” मैंने कहा।
रणवीर ने मेरी तरफ़ देखा।
“आपने खुद सभा में कहा था,” मैंने कहा। “आपने कहा कि याद का ताला खून और माँ से खुलता है। आपने वो ताला हवा में उठाया था। तो फिर जवाब दीजिए — वो ताला कहाँ है, रणवीर साहब?”
आँगन में सन्नाटा और गहरा हो गया। बाहर खड़े तीनों आदमियों में से एक ने हाथ पीछे से निकाल लिया, जैसे कुछ करने की तैयारी में हो।
रणवीर ने अपना हाथ उठाया। उसने अपनी जेब की तरफ़ हाथ बढ़ाया और धीरे-धीरे उसमें से कुछ निकाला।
काला। चौकोर। वैसा ही।
वो ताला उसकी हथेली पर रखा था। और उस ताले से, जो उस्ताद के सीने पर था, एक झटका सा निकला।
ऐसा ज़रूर नहीं हुआ कि वो ऊपर उठा। ऐसा हुआ कि उस्ताद के हाथ उनके सीने पर कस गए और ताला दबकर उनकी हथेली में एक अजीब तरह से खिसका। मैंने अपनी आँखों को मींचकर देखा — नहीं, वो खिसका नहीं था।
वो खिंचा था।
उस्ताद ने धीरे से कहा, “देखा?”
रणवीर ने अपने हाथ की तरफ़ देखा। उसका ताला भी उसकी हथेली पर काँप रहा था। ज़ोर से। जैसे किसी चुम्बक ने खींच लिया हो।
“क्या बकवास है,” रणवीर ने कहा। पर उसकी आवाज़ में वो भरोसा नहीं था।
“यह ताला आपका नहीं,” उस्ताद ने कहा। “यह मंसूर का बनाया है। मंसूर के हर ताले की एक जोड़ी होती है। एक ही लकड़ी, एक ही हाथ से, एक ही वक़्त पर। जब तक दोनों अलग हैं, दोनों बंद हैं। जब दोनों पास आते हैं…”
“पर मेरा तोला तुम्हारा नहीं है,” रणवीर ने कहा।
“अब तक था,” उस्ताद ने कहा। “अब यह आपका भी नहीं है।”
“क्या मतलब?”
उस्ताद धीरे से आगे बढ़े। रणवीर ने एक कदम पीछे लिया। फिर उस्ताद दूसरा कदम बढ़े। रणवीर की पीठ दरवाज़े की चौखट से टकराई।
“मतलब यह,” उस्ताद ने कहा, “कि आज जब ये दोनों ताले पास आ गए हैं, ये मेरे हैं और तुम्हारे नहीं। ये उस आदमी के हैं जिसने इन्हें बनाया। और मेरा भाई मंसूर का सबसे अच्छा मंसूर था।”
“मंसूर मर गया,” रणवीर ने जल्दी से कहा जैसे कोई तुरुप बचा रहा हो।
“मंसूर मर गया,” उस्ताद ने कहा, “पर उसके ताले अभी आपस में खींच रहे हैं। मरा हाथ अपने ताले भूल जाता है, मरा हाथ दूसरे ताले से नहीं मिल पाता, रणवीर साहब। यही तो मंसूर का हुनर था। मरने के बाद भी उसका हाथ काम करता है।”
रणवीर ने अपने हाथ को मोड़ा। ताला उसकी हथेली से छूट गया।
वो ज़मीन पर गिरा और धूल में लुढ़का और ठीक उस्ताद के पैरों के पास रुक गया।
किसी ने साँस नहीं ली।
उस्ताद ने उसे उठाने की कोशिश नहीं की। उन्होंने बस अपने सीने पर हाथ रखा, जहाँ वो ताला अब भी दबा था।
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