The Mysterious Bell – Chapter 1467
शबनम आपा के हाथ में वो हरी चूड़ी थी। वो उसे ऊँगली पर घुमा रही थीं, जैसे पंद्रह साल से घुमा रही हों और आज भी नतीजा न निकला हो। और उनके बगल में रज़िया खड़ी थी, सिर पर पुरानी चादर, हाथ में कुछ।
मैं उनकी तरफ़ गया। भीड़ ने रास्ता दिया। मीरा मेरे पीछे आई, पर उसने कैमरा ऊपर नहीं किया। वो उसे सीने से लगाए चली।
"शबनम आपा," मैंने कहा।
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें लाल थीं, पर आवाज़ अपनी जगह थी।
"मैं जानती हूँ तू क्या पूछेगा," उन्होंने कहा। "तू पूछेगा कि चूल्हे वाला घर कौन सा है। और मैं तुझे बता दूँगी तो तू जाएगा। और तू गया तो वो आदमी अपनी बात करेगा।" उन्होंने रणवीर की तरफ़ देखा। "मैं उस घर में नहीं जाऊँगी। मैंने एक बार मना किया था और मेरा मना करना सही था।"
"कब मना किया था?" मैंने पूछा।
वो रुकीं।
और तभी रज़िया ने पहली बार मुँह खोला।
"आठ साल पहले," उसने कहा।
मैं पलटा।
रज़िया की आवाज़ चीख जैसी नहीं थी। वो इतनी धीमी थी कि मुझे लगा कहीं से आ रही है।
"आठ साल पहले मैंने आपा को बुलाया था," उसने कहा। "चिट्ठी लिखी थी। और उसने मना कर दिया था। मैंने उससे कहा था कि इस घर में आ जा, यहाँ कोई नहीं है, यह घर खाली है, यहाँ कोई तुझे नहीं ढूँढेगा। और उसने कहा नहीं।"
शबनम आपा का हाथ रुक गया। हरी चूड़ी उनकी उँगली से फिसलकर हथेली में आ गई।
"तू चुप रह," उन्होंने कहा। "यह मेरी गली है, यह मेरा हिसाब है।"
"नहीं," रज़िया ने कहा, और उसकी आवाज़ पहली बार ऊँची हुई। "यह तेरा हिसाब नहीं है। यह मेरा है।" उसने अपनी जेब से कुछ निकाला — हरी चूड़ी का दूसरा टुकड़ा, वही घिसा हुआ, किनारे पर सुनहरी लकीर।
और उसने उसे आपा की हथेली पर रख दिया।
दोनों टुकड़े जुड़े तो पूरी चूड़ी बनी। और अजीब बात — वो अधूरी नहीं लगी। जैसे पंद्रह साल का टूटा हुआ हिस्सा वहीं बैठ गया हो और अब कुछ नहीं चाहिए।
मैंने देखा कि शबनम आपा की आँख से एक आँसू उस चूड़ी पर गिरा और वो चूड़ी पर फिसल गया।
"तो वो घर," मैंने धीरे से कहा, "वो घर तुम्हें पता है, रज़िया?"
उसने मेरी तरफ़ देखा। लंबे समय तक। मैंने कुछ नहीं पूछा। मैंने सिर्फ़ खड़े रहकर इंतज़ार किया, जैसे उस्ताद ने मुझे सिखाया था — जल्दी मत कर, बोलने वाले को बोलने दे।
और उसने कहा, "मैं वहाँ नहीं जाऊँगी।"
भीड़ में निराशा की आवाज़ उठी। किसी ने कहा, "तो फिर क्या होगा।"
मैंने हाथ उठाया।
"ठीक है," मैंने कहा। "तुम मत जाओ।" और मैंने उसकी तरफ़ एक कदम भी नहीं बढ़ाया। "मैं सिर्फ़ एक बात पूछूँगा, और अगर तुम चुप रहो, तो मैं उसे जवाब मानूँगा। उस घर में अंदर जाकर बाईं तरफ़ क्या है — कमरा, या सीढ़ी?"
रज़िया की आँखें झपकीं।
एक बार।
उसने कुछ नहीं कहा।
मैंने सिर हिलाया। "सीढ़ी। ठीक है।"
शबनम आपा ने अचानक कहा, "तूने कैसे जाना?"
"क्योंकि उसने इनकार नहीं किया," मैंने कहा। "और इनकार करने वाला आदमी झटके से हाँ नहीं कहता, पर झटके से मना भी नहीं करता। वो सिर्फ़ आँख झपकाता है। आपा जी, यही जानना था।"
उस्ताद मेरे पीछे आए। उन्होंने रज़िया की तरफ़ देखा और उनकी आवाज़ नरम थी, जितनी मैंने पहले कभी नहीं सुनी।
"बेटी," उन्होंने कहा। "उस घर में मेरी माँ का चूल्हा है। मैं उसे छूने नहीं जा रहा। मैं सिर्फ़ उस चीज़ को निकालना चाहता हूँ जिसे मेरे भाई ने वहाँ छिपाया। और मैं तुमसे वादा करता हूँ — तुम्हें अंदर नहीं जाना पड़ेगा। तुम बाहर दरवाज़े पर खड़ी रहना। बस हमें वो दरवाज़ा दिखा दो।"
रज़िया ने उनकी तरफ़ देखा। फिर आपा की तरफ़।
और शबनम आपा ने — मुझे याद है, वो पल मुझे सबसे भारी लगा — अपनी हथेली उठाई और उस पूरी हरी चूड़ी को रज़िया की कलाई पर पहना दिया।
"मैं आठ साल से तुझे बुला रही थी," उन्होंने कहा। "आज तू बुला रही है। तो मैं आ रही हूँ।"
और मैदान में, जहाँ एक मिनट पहले लोग रणवीर की आवाज़ से सहम रहे थे, अब कुछ ऐसा हुआ जो मैंने उस मैदान में कभी नहीं देखा था।
हरिप्रसाद ने अपनी बांह उठाई।
"मैं जाऊँगा," उन्होंने कहा।
"मैं भी," हबीब चाचा ने कहा, जो कोने में खड़े थे और जिनकी लाठी काँप रही थी।
"और मैं," गोपी ने कहा।
"हम सब," टिंकू ने चिल्ला दिया, और उसके पीछे सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू एक साथ चिल्लाए।
मैं हँस पड़ा। मैं थका था, मेरे घुटने दुख रहे थे, मेरी जेब में घंटी ठंडी पड़ी थी, और मैं हँस रहा था।
"अरे भाई," मैंने कहा, "कम से कम सोच तो लेते।"
"अब सोचने का वक़्त नहीं है," कमला बाई ने कहा, और वो भी उठीं।
तभी रणवीर हँसा।
एक बार। छोटी सी हँसी, और फौरन बंद।
उसने अपना मोबाइल जेब से निकाला, स्क्रीन देखी, और उसका चेहरा बदल गया। फिर उसने उसे जेब में रखा और अपने उस काले बैग वाले आदमी की तरफ़ देखा। उस आदमी ने सिर हिलाया।
और रणवीर ने मेरी तरफ़ मुड़कर कहा — "अंकुश यादव, तुम्हारी गली का जो सबसे बड़ा पार्ट है, वो यह है कि तुम्हें लगता है कि सबसे पहले ही तुम्हारी नज़र किसी चीज़ पर पड़ेगी।"
फिर वो मुड़ा और भीड़ को चीरकर चलने लगा। उसके साथ सक्सेना की जीप, उसके आदमी, और वो काला बैग वाला आदमी।
पर सफ़ेद कुर्ते और चमकते जूतों वाला अजनबी नहीं गया।
वो वहीं खड़ा रहा। उसने अपनी पीली कॉपी खोली, उसमें से एक मुड़ा पन्ना निकाला, और उसे उस्ताद की तरफ़ बढ़ा दिया।
"उस्ताद साहब," उसने कहा, "आपके भाई ने यह पन्ना पचास साल पहले मेरे हाथ में दिया था। कहा था — अगर मैं लौटूँ, तो यह आपको देना। और यह भी कहना — मैंने कभी किसी का काग़ज़ नहीं बदला।" उसने रुककर उस्ताद के हाथ से वो पन्ना आगे किया। "पचास साल से मुझे यह कहने का मौका नहीं मिला, क्योंकि मुझे यह कहने से डराया गया था। और वो मुझे आज भी डरा सकता है।"
उस्ताद ने वो पन्ना लिया। उन्होंने उसे देखा और उनका चेहरा पत्थर हो गया।
"यह उसका हाथ है," उन्होंने कहा। "यह मेरे भाई का हाथ है।" और फिर उन्होंने पन्ने को अपनी छाती से लगा लिया, और उनके कंधे हिलने लगे, वो उम्र भर के करीब थे।
मैंने उनकी पीठ पर हाथ रख दिया। मेरे पास कहने के लिए कुछ नहीं था, इसलिए मैंने कुछ नहीं कहा।
और तभी अजनबी ने वो बात कही जो सबसे ज़्यादा चुभी।
"उस्ताद साहब," उसने कहा, "अगर आज रात आप उस घर में जाते हैं, तो आपको वहाँ दूसरा ताला नहीं मिलेगा।"
उस्ताद ने सिर उठाया।
"क्या?"
"वो बात सुबह के काग़ज़ में लिखी थी," उसने कहा। "और मुझे इतना पता है कि रणवीर साहब ने मोबाइल पर किसी को अभी एक ही बात कही — घर खाली कर दो। सबसे पहले। बाकी काग़ज़ जो करेगा, करेगा।"
मेरी ज़ुबान सूख गई।
"मतलब," मैंने कहा, "वो पहले ही वहाँ पहुँच रहा है।"
अजनबी ने पीली कॉपी बंद की और मेरी तरफ़ देखा। और इस बार उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो मैंने पहले किसी में नहीं देखी थी। न मज़ाक, न शरारत, न गुस्सा। सिर्फ़ एक तरह की ठंडी जल्दी।
"नहीं," उसने कहा। "वो पहले ही पहुँच चुका है।"
उस्ताद ने तुरंत मेरी कलाई पकड़ ली। उनकी पकड़ में वो ताक़त थी जो मैंने उनमें कभी नहीं देखी।
"अंकुश," उन्होंने कहा। "सुन। आज रात उस घर में जाना है। अब नहीं तो कभी नहीं। और वहाँ पहुँचकर हमें तीन चीज़ें चाहिए — मेरी माँ की सिलाई की पेटी की चाबी, यह खुला ताला, और वो पन्ना जो उसने पचास साल से छिपा रखा है।" उन्होंने एक साँस ली। "और एक बात याद रखना। चूल्हा ठंडा है, पर उस घर का दरवाज़ा आज भी जानता है कि उसे किसने बंद किया था।"
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