The Mysterious Bell – Chapter 1468
मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा।
"अंकुश," उसने कहा, "मेरे पास कैमरा है और पूरी गली है।"
टिंकू ने पीछे से चिल्लाया, "और हम पाँच जासूस हैं, भाई।!"
मैंने मुड़कर उन सबको देखा — उस्ताद, पापा, माँ, काजल, शबनम आपा, रज़िया, दुबे अंकल, हरिप्रसाद, हबीब चाचा, गोपी, कमला बाई, मीरा, बच्चे।
और मैंने घंटी जेब से निकाली।
वो अब गरम नहीं थी। वो ठंडी थी। और मैंने उसे धीरे से हिलाया तो उसने एक बार बजकर कहा — "जल्दी।"
मैंने घंटी जेब में रखी और मैदान के बाहर की तरफ़ पहला कदम बढ़ाया।
"तो चलो," मैंने कहा। "अंधेरा कितना भी हो, आज हम अकेले नहीं हैं।"
॥
शालिनी ने मेरी कलाई पकड़ ली।
"रुको," उसने कहा।
मैं रुका। वो मेरे सामने आई, हाथ में वही पीली फाइल, जो अभी सक्सेना की गाड़ी से निकली थी, और उसने फाइल मेरी तरफ़ बढ़ाने के बजाय अपने सीने से लगा ली।
"यह काग़ज़ अब किसी एक आदमी के हाथ में नहीं जाएगा," उसने कहा। "मैं इसे लेकर थाने जा रही हूँ, अभी। दुबे अंकल साथ हैं, दो गवाह हैं, और मेरे पास मौका-मुआयने का आदेश है और प्राथमिकी की नक़ल भी। सुबह होते-होते ये फाइल बिना नंबर की नहीं रहेगी।"
दुबे अंकल ने अपनी छड़ी उस फाइल के ऊपर रखी, जैसे कोई मुहर लगा रहे हों।
"बेटा," उन्होंने कहा, "मेरी उम्र में सिर्फ़ एक चीज़ का हक़ रह जाता है — मुहर पूछने का। और आज मैंने देख लिया कि यहाँ मुहर किसकी है। तुम जाओ। मैं इन काग़ज़ों को उस आदमी के सामने नहीं, कानून के सामने रखूँगा।"
गोविंद भाई थरथरा रहे थे। उनके चश्मे का काँच चटका था और टेप खुलकर चश्मा नाक पर तिरछा लटक रहा था। वो मेरे पास आए।
"अंकुश बेटा," उन्होंने कहा, "मैं अपना बयान लिखवा चुका हूँ, पर उसमें एक लाइन मैंने खुद जोड़ी है — कि जिस रात मैंने तुम्हारे पापा का अंगूठा लिया, उस रात मेरी बेटी ने मुझसे तीन बार पूछा था कि पापा, आपके हाथ क्यों काँप रहे हैं। मैंने उसे कुछ नहीं बताया। आज मैं उसका जवाब लिखवा रहा हूँ।"
माँ मेरे पास आईं। उनके हाथ में मेरा पुराना सूती थैला था, जिसमें पानी की बोतल और दो रोटियाँ थीं। उन्होंने वो थैला काजल के हाथ में दिया और मेरे कंधे पर हाथ रखा।
"मैं तेरे साथ नहीं आ रही," उन्होंने कहा, "और इसका मतलब यह नहीं कि मैं डर गई हूँ। मैं यहाँ रहूँगी, इन काग़ज़ों के पास, क्योंकि अगर इन काग़ज़ों को आज रात कुछ हो गया, तो कल किसी गली का कोई भी बच्चा अपने पापा का नाम सीधा नहीं कर पाएगा। और हाँ — काजल मेरे साथ रहेगी। डॉक्टर इसरानी ने कहा है, मेरा बुखार ऊपर न आए।"
काजल ने मेरी तरफ़ देखा और आँखें तरेरीं।
"मैं डर गई होती तो घर में बैठी होती," उसने कहा। "यहाँ खड़ी हूँ। माँ की दवा यहाँ है, डॉक्टर साहब यहाँ हैं, और तू जहाँ जा रहा है, वहाँ मेरी ज़रूरत नहीं — वहाँ तेरी ज़ुबान की ज़रूरत है।"
उसने मेरी कमीज़ की जेब में कुछ डाला। घंटी बाँधने वाला धागा।
"इसे अंदर की जेब में बाँध ले," उसने कहा। "और गिरा मत।"
मीरा ने कैमरा कंधे पर लटकाया और मेरे पास आकर खड़ी हो गई।
"मैं चल रही हूँ," उसने कहा। "मगर एक बात पहले साफ़ कर लूँ? इस बार मैं रिकॉर्डिंग उस समय नहीं करूँगी जब कोई भावुक हो रहा हो। आज मैं सिर्फ़ सबूत रिकॉर्ड करूँगी। बाकी सब उस ताले के बाद।"
"फिर रिकॉर्डिंग कैसे होगी," टिंकू ने कहा, "जब कुछ हो ही नहीं रहा होगा?"
"टिंकू," मैंने कहा।
"हाँ भाई?"
"तेरे पाँच जासूसों में से एक भी अगर आज रात मेरे पीछे-पीछे आया, तो मैं उसे सीधा उस्ताद की मशीन के नीचे बाँध दूँगा।"
सानिया तुरंत बोली, "जासूस बिना खतरे के कहाँ जाते हैं, भाई?"
"जासूस बिना खतरे के कहानी की किताबों में जाते हैं," मैंने कहा। "जागीर में नहीं।"
गुड्डू हँसा, रफ़ीक़ ने टूटा चश्मा आँख पर चढ़ाया, चिंटू ने अपनी चप्पल मेज़ के नीचे से निकालकर पैर में डाली। और मैं जानता था कि ये चारों जहाँ कहा है वहाँ नहीं जाएँगे। ये ठीक उस गली के मोड़ पर पहुँच जाएँगे जहाँ मैं उन्हें नहीं देख पाऊँगा, और वहाँ से वो अगली खबर लेकर आएँगे। मैंने उनकी तरफ़ देखकर उँगली उठाई और मैंने यह नहीं कहा कि मत आना। मैंने कहा —
"अगर आना ही है, तो नाली की तरफ़ से आना। सीधी सड़क से कोई आया तो मैं खुद उसे पकड़कर तेरी माँ के हवाले कर दूँगा।"
फिर मैं पापा के पास पहुँचा। पापा अपनी पुरानी नीली शर्ट की आस्तीन ऊपर चढ़ा रहे थे। उनके हाथ में वो औज़ार बक्सा था जिसमें से उन्होंने कल रात चूल्हे के पीछे वाला पुराना डिब्बा निकाला था।
"पापा," मैंने कहा, "आप रुक सकते हैं। मैं जानता हूँ, वो घर आपके लिए क्या है।"
पापा ने मेरी तरफ़ वैसे ही देखा जैसे वो कभी-कभी मुझे देखते हैं — बिना जल्दी के, जैसे उनके पास शब्द तोलने का वक़्त हमेशा है।
"मैंने बाईस साल उस घर से मुँह छिपाया है," उन्होंने कहा। "आज अगर मैं तेरे साथ न गया, तो अगले बाईस साल तेरे सामने कौन मुँह दिखाऊँगा। अकेले मत जा।"
उस्ताद दुकान से लखनऊ के उस पुराने लालटेन को लेकर आए थे, जो उनका औज़ार नहीं था, हिस्सा था। उनके हाथ में माँ की सिलाई पेटी की चाबी थी, और दूसरे हाथ में वो पन्ना, जो अजनबी ने दिया था।
"पाँच तो चलेंगे," उस्ताद ने कहा। "अंकुश, शंकर भाई, मैं, मीरा बेटी और टिंकू। पाँच से ज़्यादा अंदर गए तो खिड़कियाँ खड़केंगी, और खिड़की की आवाज़ सबसे पहले कुत्ते सुनते हैं, फिर अफवाह।"
"मैं भी चलूँगा," हरिप्रसाद ने कहा। उनकी आधी उँगली हवा में उठी, जैसे ही कभी उन्होंने सभा में दावा किया था। "मैं उस गली को जानता हूँ। उस घर के पीछे की नाली उस मकान तक जाती है जहाँ एक बार रणवीर के हिसाब की टिन रखी गई थी।"
"आप दरवाज़े के बाहर रहेंगे," मैंने कहा।
"मैं दरवाज़े के बाहर रहूँगा," उन्होंने मान लिया। "मगर दरवाज़ा खुला रहेगा। मुझे सींकने नहीं देना।"
बबलू अपनी जीप की तरफ़ देख रहा था, फिर मेरी तरफ़। उसका मुँह वैसे ही तिरछा था जैसे सभा में था, पर आज रात उसकी चेन गले में नहीं थी।
"मैं अंदर नहीं जाऊँगा," उसने साफ़ कह दिया। "मैंने आज एक बात मान ली है — मैं हर जगह नहीं जा सकता। पर मैं गाड़ी नहीं ले जाऊँगा। तेरे साथ वो हरी टॉर्च लेकर खड़ा रहूँगा। तू अंदर जाएगा, मैं बाहर रहूँगा, और अगर मैं भागूँ, तो उस्ताद मेरी ज़ुबान काटकर अपनी मशीन में सिल दें।"
उस्ताद ने बिना मुस्कुराए कहा, "मेरी मशीन ज़ुबान नहीं सिलती, बबलू। वो दरवाज़े सीती है। भागना है तो भाग, पर दरवाज़े की तरफ़ मत भागना।"
मीरा ने कैमरा ऑन किया, लाल बत्ती जली, और मेरे हिसाब से यही वो लम्हा था जब गली की सारी आवाज़ें एक साथ चुप हो गईं।
हम मैदान से निकले। बत्तियाँ अब तक नहीं लौटी थीं। पूरी बस्ती अंधेरे में तैर रही थी, और पीपल के नीचे जो दीये बच्चों ने जलाए थे, वो अब छोटे-छोटे तारे जैसे लग रहे थे। पीछे से किसी ने मेरा नाम लिया। मैंने मुड़कर नहीं देखा। कभी-कभी मुड़कर देखने से हिम्मत लौटती है, कभी-कभी मुड़ जाती है। आज मुझे हिम्मत की ज़रूरत थी।
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