The Mysterious Bell – Chapter 1466
"और फिर एक आदमी आया। सफ़ेद कुर्ता, नए चमकते जूते। उसने बाज़ार में एक बात फैलाई कि मेरे भाई ने एक बूढ़ी औरत के काग़ज़ बदल दिए। मैंने उस बात को उसी दिन नहीं नकारा। मैंने इलियास से पूछा भी नहीं। मैंने बस दुकान का ताला लगा दिया और चुप बैठ गया।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "पचास साल में मैंने अपने भाई को एक बार भी नहीं ढूँढा। मैंने खुद को यह समझा लिया कि वो भाग गया। सच यह है कि मैं भाग गया।"
मैदान में सन्नाटा गहरा हो गया। पीपल की डालियाँ हिलीं और एक दीया फिर बुझा।
तभी मेरे पीछे से पापा की आवाज़ आई।
वो उठ रहे थे। काजल उनका एक हाथ पकड़े थी, माँ दूसरे हाथ पर हाथ रखकर उन्हें सहारा दे रही थी। पापा का घुटना काँप रहा था, पर वो खड़े हो गए।
और फिर वो उस्ताद के पास आए।
मुझे याद नहीं कि मैंने पापा को कभी किसी का हाथ इस तरह पकड़ते देखा हो। उन्होंने उस्ताद की उम्र भरी छड़ी वाली उँगलियाँ दोनों हाथों में ले लीं।
"उस्ताद साहब," पापा ने कहा। "मैंने बाईस साल इसी चीज़ के लिए अपनी ज़ुबान बंद रखी कि मैं अकेला था। अकेला डरा हुआ आदमी क्या नहीं करता। पर आज यहाँ खड़े देखिए — एक भी आदमी अकेला नहीं है। इसलिए अब अकेले मत चलिए। सब साथ चलेंगे।"
उस्ताद ने कुछ कहा नहीं। उनका सिर ज़रा हिला, जैसे कोई बूढ़ा पेड़ हवा में पहली बार झुका हो।
हमें लगा था कि मैदान शांत हो गया है।
नहीं हुआ।
मेज़ से एक हाथ उठा और मंसूर का खुला काला ताला हवा में उठ गया।
रणवीर।
वो ताला उसने अपनी हथेली में लिया, उसे दीयों की रोशनी में घुमाया, और मुस्कुराया। वो मुस्कान मैंने सैकड़ों बार देखी थी, पर आज उसमें कुछ नहीं था। न कोई मज़ाक, न कोई सफ़ाई। सिर्फ़ एक ठंडी सी हिम्मत।
"अच्छा," उसने कहा। आवाज़ ऊँची थी, उपदेश वाली। "तो अब लोग जान गए कि इस लेटर का हिसाब क्या है। मुझे कुछ छिपाना नहीं है। मैं तो इस सारे काम को खत्म करना चाहता हूँ।" उसने ताला ऊपर उठाया। "यह ताला आप सबने खुलते देखा। और यह जो पीछे से बक्सा टूटा, यह भी आपने सुना। मैं आपको साफ़ बता देता हूँ। जो कुछ इन लोगों ने कहा, वो सच हो सकता है। पर अब भी सच यही है — इस गली की ज़मीन मेरे पास है, और मैंने आप सबके लिए जो किया है, वो कोई भूल नहीं सकता।"
भीड़ में कोई नहीं बोला। पर मुझे दिखा कि कमला बाई की लाठी ज़मीन पर हिली, और नसीमा बाई ने अपनी लाल किनारी वाली साड़ी की गाँठ ज़ोर से कस ली।
रणवीर ने ताला नीचे किया और उसकी आवाज़ गिर गई, बहुत धीमी, बहुत पास वाली।
"बस एक शर्त है," उसने कहा। "उस चूल्हे वाले घर का नाम लेकर कोई मेज़ से आगे मत बढ़ना। कसम खाओ, आज रात वहाँ कोई नहीं जाएगा। क्योंकि अगर एक भी आदमी उस घर की तरफ़ गया, तो जो याद इस ताले में बंद है — और जो याद उस दूसरे ताले में बंद है — दोनों को मैं वहीं जाकर तोड़ दूँगा। और तोड़ने में मुझे किसी की मदद नहीं चाहिए।"
कुछ लोग पीछे हटे। मैंने एक आदमी को अपने बेटे का हाथ खींचकर उल्टा चलते देखा। एक औरत ने मुँह पर दुपट्टा रख लिया।
और तभी पापा मेज़ से आगे निकले।
वो रुके नहीं। उन्होंने रणवीर के सामने जाकर खड़े होकर अपनी कमीज़ के घुटने जितनी ऊपर देखी, जैसे ज़मीन पर ही जवाब टटोल रहे हों। फिर उन्होंने सिर उठाया।
"रणवीर भाई," पापा ने कहा। उनकी आवाज़ में वो डर अब भी था, पर उसके ऊपर कुछ और बैठा हुआ था। "मौका लगा तो आप याद मत तोड़िए, क्योंकि मैं अपनी याद खुद तोड़ चुका हूँ। बाईस साल से मैं उसे काग़ज़ों के नीचे दबाकर बैठा हूँ।"
उसने ताला ज़रा ऊँचा किया।
पापा ने उसकी आवाज़ नहीं बदली।
"यह घर किसी के नाम पर हो, यह नहीं बोलूँगा। आप जैसे कोई काग़ज़ बदलते हैं, वैसे लोग नाम भी बदल देते हैं। पर यह ताला दो भाइयों का है। और इसे खोलने का हक़ सिर्फ़ सच को है। काग़ज़ को नहीं। अपने नाम को नहीं।" उन्होंने उँगली उठाई। "आपने मेरा अंगूठा लिया था, रणवीर भाई। उस रात मैं रोया था और उसी रात मैंने अपने बेटे को देखा था — कि वो सो रहा है और उसे खबर नहीं कि उसका बाप क्या करके आया है। और मैं उस रात से चुप हूँ। पर आज मैंने अपनी ज़ुबान उठाई है, और यह अब बंद नहीं होगी।"
मैदान में एक आवाज़ उठी। फिर पाँच। फिर दस। किसी ने कहा "सच बोलो"। किसी ने कहा "याद मत तोड़ो"। और फिर हरिप्रसाद अपनी अधूरी उँगली ऊपर करके चिल्लाए कि उनके प्लॉट की तरह किसी और की याद भी मत लूटो।
रणवीर ने भीड़ को देखा।
उसने मुझे देखा।
और मुझे पता है कि उस पल उसके दिमाग़ में क्या चल रहा था। वो जानता था कि अगर वो अब भी ताला उठाए खड़ा रहेगा, तो भीड़ उसके हाथ पर झपटेगी। और वो किसी भी चीज़ से ज़्यादा भीड़ के हाथ से डरता है।
इसलिए उसने ताला नीचे किया और उसे मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।
"रख लो," उसने कहा। "खुला ताला कोई ताले जैसा होता है? एक खुला ताला आप लोगों के हाथ में है। इसकी जोड़ी दूसरी जगह है। और वो जगह आज इस मैदान में जितने स्वाभिमानी लोग खड़े हैं, उनमें से किसी के पास नहीं है।"
मैंने ताला उसके हाथ से लिया। वो ठंडा था।
और मैंने पापा का हाथ पकड़ लिया।
"पापा," मैंने कहा। इतना ही कहा, पर मैंने उनकी उँगलियाँ कसकर दबाईं, और वो समझ गए।
फिर मैं मैदान की तरफ़ मुड़ा। दीयों की रोशनी कम हो रही थी। कुछ लोगों के चेहरे थके थे, कुछ के गुस्से से लाल। मेरे बच्चे — टिंकू, सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू — एक साथ खड़े थे, और मैंने देखा कि टिंकू अपनी मुट्ठी भींचे खड़ा है।
"सुनो," मैंने कहा। मेरी आवाज़ पहले ज़ोर से निकली। "मैं आज किसी से यह नहीं कहूँगा कि मेरे साथ चलो। मैंने बाईस दिन में एक बात सीखी है। जब मैंने सबको अपने साथ खींचने की कोशिश की, तब सब थके। जब मैंने गुस्से में जोड़ने की कोशिश की, तब घंटी ठंडी पड़ गई।"
मैंने एक साँस ली।
"आज यह हाल है कि ताला खुला है। दूसरा ताला उस घर में है, जहाँ उस्ताद की माँ का चूल्हा जलता था। मुझे उस घर का दरवाज़ा नहीं पता। मुझे उस गली का कोना नहीं पता। जिस औरत के पास उसका रास्ता है, वो यहाँ खड़ी है। और मैं उसे खींचने नहीं आया हूँ। मैं सिर्फ़ इतना कह रहा हूँ — आज मैं अकेला नहीं जाऊँगा। जो भी चलेगा, साथ चलेगा। जो नहीं चलेगा, वो यहाँ खड़ा रहेगा और यहीं से दुआ करेगा।"
तभी मेरी जेब में कुछ गरम हुआ।
घंटी।
मैंने उसे निकाला। पीतल लाल था, जैसे सरसों के तवे पर रखा हो। लोगों ने साँस रोक ली।
और घंटी ने एक ही शब्द कहा।
"दो।"
मैंने घंटी को कान के पास लिया। उस्ताद आगे आए और उन्होंने मेरा हाथ नीचे किया।
"दो," उन्होंने कहा। "मतलब दो ताले, एक ही छत के नीचे। एक अकेला ताला आज रात तक खुला रहेगा, पर सुबह तक यह अपने आप बंद हो जाएगा। इन तालों की आदत है। जो ताला खुला छोड़ दो, वो लौटकर बंद हो जाता है।"
मेरे हाथ से खून उतर गया।
"सुबह तक?" मैंने कहा।
"सुबह तक," उन्होंने कहा। "और मैं आपको झूठ नहीं बोलूँगा। दूसरा ताला लाने के लिए आज रात उस घर में जाना पड़ेगा।"
भीड़ में से कोई बोला, "आज रात?" — और वो आवाज़ डर की थी, गुस्से की नहीं।
मैंने उस तरफ़ देखा तो पता चला कि वो कमला बाई थीं। उन्होंने अपनी लाठी उठाई और फिर धीरे से नीचे रख दी। "बेटा, रात में उस गली में कोई नहीं जाता।"
"क्यों?" मैंने पूछा।
वो कुछ बोलीं नहीं।
और तभी मेरी नज़र मैदान के उस कोने पर गई, जहाँ दो बहनें खड़ी थीं।
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