The Mysterious Bell – Chapter 1460
"तूने मुझे बहुत कुछ दिया, रणवीर," उन्होंने कहा। "अस्पताल के पैसे दिए। वो मैं मानती हूँ। उसका हिसाब मैं चुकाऊँगी। पर मेरी हँसी —"
वो रुकीं।
"मेरी हँसी उस ताले में नहीं है।"
"फिर वो कहाँ है?"
"जहाँ तेरी नहीं है।"
मैदान में कुछ लोगों ने साँस ली।
और रणवीर — रणवीर ने अपना हाथ फिर ताले की तरफ़ बढ़ाया।
धीरे। बहुत धीरे। जैसे कोई पानी में हाथ डाल रहा हो।
उसकी उँगलियाँ ताले की सतह से एक इंच पहले रुकीं।
"जल रहा है," उसने कहा। धीमी आवाज़।
"फिर भी रख," पापा ने कहा।
"जल रहा है, शंकर।"
"मुझे पता है। मेरे हाथ में भी जल रहा था। उस रात। जब मैंने इसे बंद किया था।"
रणवीर ने एक और गहरी साँस ली। और फिर —
उसने हाथ रख दिया।
मैदान में किसी ने चीख मारी — किसी औरत ने। काजल ने मेरी कलाई पकड़ ली। पापा ने अपनी आँखें बंद कर लीं।
रणवीर की उँगलियाँ ताले पर जम गईं।
और ताला — ताला चमका।
इस बार नीली रोशनी नहीं थी। इस बार पीली थी — धीमी, किसी पुराने दीये जैसी। और उस रोशनी में मैंने देखा — रणवीर की आँखों से एक बूँद नीचे गिरी। न आँसू था, न पसीना। बस एक बूँद, जो उसने पोंछी नहीं।
उसने अपना हाथ हटाया।
ताले पर जलन का निशान नहीं था।
उसने अपना हाथ देखा।
"नहीं जला," उसने कहा। आवाज़ फटी हुई।
"नहीं जला," पापा ने कहा।
रणवीर कुछ देर चुप खड़ा रहा।
फिर उसने बहुत धीमी आवाज़ में कहा —
"अब?"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
"तीसरा हाथ," उन्होंने कहा। "अंकुश। दे।"
मैंने अपना हाथ बढ़ाया।
मेरी हथेली काँप रही थी। मुझे याद आया — जब मैंने पहली बार ये ताला छुआ था, तो वो ठंडा था। फिर गरम हुआ। फिर बर्फ़ जैसा ठंडा। और अब —
मैंने अपनी हथेली ताले पर रखी।
कुछ नहीं हुआ।
न जलन। न ठंड। न गरमी।
सिर्फ़ एक चीज़ हुई —
ताला मेरी हथेली के नीचे से धीरे से खिसका।
मैदान में सबने देखा।
"वो —" टिंकू ने कहा, "वो खिसका —"
"खिसका," उस्ताद ने कहा।
और तभी मैंने वो आवाज़ सुनी।
घंटी से नहीं।
मंसूर के ताले से।
एक बहुत पुरानी आवाज़ — बूढ़ी, दबी, जैसे कोई दूर के कमरे से बुला रहा हो —
"अंकुश।"
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
पापा रो रहे थे।
न आवाज़ से। न सिसकी से। बस उनकी आँखें भरी हुई थीं, और उनके होंठ काँप रहे थे।
"पापा —"
"खोल," उन्होंने कहा।
"पर —"
"खोल, बेटा। तीन हाथ लग चुके।"
मैंने ताले की तरफ़ देखा।
पापा का हाथ ताले पर था। रणवीर का हाथ भी। और मेरा —
मैंने अपना हाथ वापस रखा।
और मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं।
ताला गरम होने लगा। धीरे। बहुत धीरे। जैसे कोई पुराना दीया जल रहा हो।
मेरी उँगलियों के नीचे मैंने कुछ महसूस किया — हल्की सी सरसराहट, जैसे कोई पुराना धागा खुल रहा हो।
और फिर वो आवाज़ फिर आई —
"अंकुश।"
इस बार साफ़। पास से।
मैंने आँखें खोलीं।
और मैंने देखा —
ताला खुला था।
धीरे से। बिना आवाज़। बिना झटके। जैसे कोई पुराना दरवाज़ा सालों बाद आहिस्ता से खुले।
और उसके अंदर से कुछ निकला।
एक काग़ज़।
छोटा। मुड़ा हुआ। पीला।
मैंने उसे उठाया।
मेरे हाथ में वो काग़ज़ ऐसे आया जैसे कोई चिड़िया घोंसले से निकले — डर से नहीं, भरोसे से।
मैंने उसे खोला।
दो नाम थे उस पर।
एक — माँ का। बाईस साल पहले का। और उसके नीचे —
मेरा नाम।
रोशनी में दोनों नाम साफ़ दिख रहे थे।
और काग़ज़ के एक कोने पर, बहुत छोटे अक्षरों में, मैंने पढ़ा —
"जोड़ने वाले का नाम पहले लिखा जाता है।"
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
"पापा —"
पर पापा खुद उस काग़ज़ को देख रहे थे। उनकी आँखें उसी कोने पर टिकी थीं।
"ये —" उन्होंने धीरे से कहा। "ये मेरी लिखाई नहीं है।"
"मेरी भी नहीं," रणवीर ने कहा। उसकी आवाज़ अब पहले जैसी नहीं थी। "ये — ये उस आदमी की लिखाई है —"
"कौन सा आदमी?"
रणवीर ने अपना हाथ ताले से हटाया।
"जिसने मुझे ये ताला बंद करने के लिए कहा था," उसने कहा। "बाईस साल पहले।"
और उसने अपना हाथ जेब में डाल दिया। इस बार अपनी जेब में कुछ नहीं था। पर उसका हाथ वहीं अटका रह गया, जैसे वो किसी ऐसी चीज़ को छू रहा हो जो अब वहाँ नहीं है।
मैंने अपनी काग़ज़ की तरफ़ देखा।
दो नाम। माँ का, और मेरा।
और उस काग़ज़ के नीचे एक और नाम था।
बहुत छोटा। धुँधला। मिटता हुआ।
पर मैंने पढ़ लिया।
"शंकरलाल।"
और पापा — पापा ने वो नाम देखा और मेरी तरफ़ देखा और उनकी आँखों में वो डर था जो उन्होंने आज तक किसी के सामने नहीं दिखाया था।
"वो नहीं," उन्होंने धीरे से कहा। "वो नहीं।"
"कौन, पापा?"
"छोटा भाई," उन्होंने कहा। "शंकरलाल।"
उन्होंने काग़ज़ अपने हाथों में लिया और एक पल के लिए उसे सीने से लगा लिया। फिर उन्होंने उसे मेरी तरफ़ बढ़ा दिया और कहा —
"ये — ये नाम मैंने कभी नहीं लिखा। पर ये मेरा है।"
और तभी पीछे से — बहुत पीछे से — मैंने एक आवाज़ सुनी।
दुबे अंकल की छड़ी की आवाज़ नहीं। उस्ताद की मशीन की आवाज़ नहीं।
किसी के काग़ज़ पलटने की आवाज़।
और उसके बाद — एक धीमी सी हँसी।
मैं पलटा।
मंच के पीछे, पीली फाइल की मेज़ के उस पार, एक आदमी खड़ा था।
सफ़ेद कुर्ता। चमकते जूते। पीली कॉपी हाथ में।
हरीप्रसाद।
नहीं — हरीप्रसाद तो मेरे पीछे खड़े थे, अपनी आधी उँगली सीने पर रखे।
वो — वो कोई और था।
उसके हाथ में एक कॉपी थी जो मैंने पहली बार देखी थी — पीले काग़ज़ की जिल्द वाली, किनारों से घिसी हुई।
और उसने मेरी तरफ़ देखा।
"अंकुश," उसने कहा, बहुत धीमी आवाज़ में। "तूने मुझे ढूँढ लिया।"
मैंने अपनी काग़ज़ की तरफ़ देखा। मैंने पापा की तरफ़। मैंने रणवीर की तरफ़।
और तब मैंने समझा —
मंसूर के ताले के अंदर एक और नाम था। और वो नाम किसी की नहीं, बल्कि उसकी थी — जो इस वक़्त सामने खड़ा था।
क्योंकि उसके सफ़ेद कुर्ते की जेब पर — वही पीली कॉपी थी — और कॉपी पर रखा था — एक लाल रेशमी धागा।
वही धागा।
जो रणवीर की उँगली पर था। जो लकड़ी के जूतों वाले बूढ़े की हथेली की चीज़ पर था।
और तभी घंटी — बर्फ़ जैसी ठंडी, शून्य के अंक वाली मेरी घंटी — फिर बजी।
एक बार।
धीरे से।
और उसने दो शब्द कहे।
"तीसरा हाथ।"
मैदान में सबने सुना।
और रणवीर ने — रणवीर ने उस आदमी की तरफ़ देखा और उसके होंठों से निकला —
"सर।"
॥
"सर।"
वो शब्द रणवीर के मुँह से निकला और मैदान की हवा जम गई। दीयों की लौ एक साथ झुकी, जैसे किसी ने सबके सामने साँस रोक ली हो। मेरे पीछे कोई खाँसा, कोई हिला, पर कोई बोला नहीं।
मैंने उस आदमी को देखा। सफ़ेद कुर्ता। कुर्ते पर एक भी धूल का कण नहीं — जबकि आधे मैदान के कपड़े उस रात की मिट्टी से भूरे पड़े थे। जूते चमकते हुए, इतने चमकते कि मैदान की धूल उनसे अलग लग रही थी, जैसे उसने कभी उस ज़मीन पर कदम ही नहीं रखा जिस पर हम सब खड़े थे।
हाथ में पीली जिल्द वाली घिसी कॉपी। और उस कॉपी पर लाल रेशमी धागा।
धागा हिल रहा था। हवा नहीं थी। बिल्कुल नहीं। दीयों की लौ सीधी जल रही थी, टहनियाँ स्थिर थीं। फिर भी धागा हिल रहा था — धीरे से, जैसे कोई उसे उँगली से छेड़ रहा हो।
"सर?" मेरी आवाज़ अपने ही कानों में अजीब लगी। "ये सर कौन है, रणवीर?"
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