The Mysterious Bell – Chapter 1459
और तभी —
"उस्ताद।"
टिंकू की आवाज़। बहुत धीमी। पर उस धीमी आवाज़ में वो मज़ा था जो बच्चों को तब आता है जब बड़ों की लड़ाई में उन्हें कुछ समझ आ जाए।
"उस्ताद — ताला भी समझ गया कि इसमें हमारा भी हिस्सा है।"
पहले किसी ने हँसा नहीं।
फिर पीछे, बच्चों की भीड़ में, चिंटू की छोटी सी हँसी निकली। फिर गुड्डू ने हँसी दबाई। फिर रफ़ीक़ ने। फिर सानिया ने और फिर कुछ बड़े भी — जिनके चेहरे पत्थर बने खड़े थे — उनके होंठों पर भी एक हल्की सी लकीर आई।
कमला बाई — वो लाठी वाली बूढ़ी जिसने मुझसे कहा था कि गली के लोग अपनी पोटली सालों तक नहीं खोलते — उसने अपने सफ़ेद बालों के नीचे से मुझे देखा और धीरे से बोली, "लोहा भी अब बोलने लगा।"
और रणवीर।
रणवीर ने अपनी हथेली देखी।
मैंने भी देखी। उसकी हथेली पर ताले की शक्ल के हल्के निशान थे — जैसे किसी ने गरम लोहे से उस पर छाप लगा दी हो। वो अपनी मुट्ठी बंद करता, फिर खोलता।
"क्या —" उसने धीरे से कहा। "ये क्या —"
सक्सेना ज़मीन से उठे। उनके घुटने अभी भी काँप रहे थे, पर वो अपना रजिस्टर सीने से चिपका कर खड़े थे।
"साहब," उन्होंने कहा, और पहली बार उनकी आवाज़ में वो मीठास नहीं थी, "हाथ जल गया है।"
"चुप।"
"जल गया है साहब — दिखाइए —"
"चुप!"
रणवीर ने अपनी हथेली कमीज़ के अंदर छिपा ली। उसने एक क़दम पीछे हटाया।
वो पहला क़दम था जो उसने पीछे हटकर उठाया था। मुझे याद नहीं कि आज उसने इससे पहले कभी पीछे हटकर क़दम उठाया हो।
पापा ने ताला सीने से लगाया।
"अब सुन," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ अब धीमी नहीं थी। "ये ताला मैंने बंद किया था। बाईस साल पहले। उस रात, जब तेरे आदमी ने मुझे अंगूठा लगवाया था। मेरी मर्ज़ी नहीं थी। डर था। पर अंगूठा मेरा था।"
"शंकर —"
"और ये ताला — ये मैंने बंद किया था, पर इसका असली हक़दार मैं नहीं हूँ।"
रणवीर रुका।
"क्या?"
"मैंने बंद किया, पर ये मेरा ताला नहीं है," पापा ने कहा। "ये उसका है जिसने इसे बनाया था। मंसूर का। और मंसूर का ताला — मंसूर के नियम से चलता है।"
"कौन से नियम?"
पापा ने ताले को एक हाथ से दूसरे हाथ में लिया। उनकी उँगलियाँ ताले की सतह पर घूमीं और वो उस निशान पर रुकीं — दो लकीरें, बीच में बिंदु।
"जो ताला दो हाथों से बंद हुआ," उन्होंने कहा, "वो एक हाथ से नहीं खुलेगा।"
मैदान में फिर से सन्नाटा।
और फिर मंसूर का ताला — पापा के हाथों में — फिर जला।
इस बार नीली रोशनी पहले से तेज़ थी। और वो रोशनी सिर्फ़ ताले पर नहीं रही। वो रोशनी बाहर फैली। मेज़ से, मंच से, और मैदान के बीच तक — हवा में एक पतली नीली लकीर की तरह — फैली।
और उस लकीर में मैंने दो परछाइयाँ देखीं।
दो।
एक — रणवीर की। वो मंच के दाईं तरफ़ खड़ा था, उसका लंबा कद, उसके सफ़ेद कपड़े — पर उसकी परछाईं उसके पीछे नहीं, बल्कि उसके सामने, ताले की तरफ़ खींची जा रही थी। जैसे कोई पुरानी रस्सी खींच रहा हो।
और दूसरी — मेरी।
ये मुझे तब पता चला जब सानिया ने पीछे से चिल्लाकर कहा —
"दीदी! देखो! दो परछाइयाँ!"
मैंने अपने पैरों की तरफ़ देखा। ज़मीन पर मेरी परछाईं थी। पर वो सूर्य की नहीं थी — दोपहर ढल चुकी थी, दीयों की लौ से परछाइयाँ बन रही थीं। और मेरी परछाईं भी उसी ताले की तरफ़ खिंच रही थी।
मैंने अपना हाथ ऊपर किया।
परछाईं ने भी हाथ ऊपर किया।
मैंने हाथ नीचे किया।
परछाईं ने नीचे किया।
पर वो अपनी जगह से हिल रही थी। ताले की तरफ़ खिंच रही थी। जैसे कोई अदृश्य धागा मेरी कमर में बँधा हो और कोई उसे खींच रहा हो।
मैदान में फुसफुसाहट फैल गई।
"दो परछाइयाँ —"
"ये क्या है —"
"अंकुश की और रणवीर की —"
"मतलब —"
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा। वो अपनी कुर्सी के पास खड़े थे, हाथों में कैंची नहीं, सिर्फ़ खुली हथेलियाँ। उनके चश्मे के पीछे उनकी आँखें बड़ी थीं।
"उस्ताद —" मैंने कहा। "ये —"
"मुझे नहीं पता," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ में वो शांति नहीं थी जो हमेशा होती थी। "मैंने ये कभी नहीं देखा।"
"पर उस्ताद, ताला —"
"मैंने ताला बनते देखा है। बंद होते देखा है। पर ऐसे दो परछाइयाँ —"
वो चुप हो गए।
और तभी रणवीर ने अपनी आवाज़ निकाली।
"तो ये सब —" उसने अपना हाथ कमीज़ के अंदर से निकाला। उसकी हथेली का निशान अब और गहरा हो गया था। वो हाथ को हवा में हिलाकर ठंडा करने की कोशिश कर रहा था। "ये सब — मेरे ख़िलाफ़ —"
"तुम्हारे ख़िलाफ़ नहीं," पापा ने कहा। "ये ताला किसी के ख़िलाफ़ नहीं है। ये ताला उसके लिए है जो इसे बंद कर सकता है, और खोल भी सकता है।"
"तुम?"
"नहीं।"
पापा ने ताला मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"ये याद अब तुम्हारी है," उन्होंने कहा। "और इसका एक हिस्सा — रणवीर का भी।"
"क्या?" मैंने कहा।
"दो परछाइयाँ," उस्ताद ने धीरे से कहा, और अचानक उनकी आवाज़ में कुछ वापस आया — जैसे कोई पुराना हिसाब जुड़ रहा हो। "मंसूर के नियम में एक बात थी — जो ताला एक बार बंद होकर अधूरा रह जाए, वो फिर दो लोगों में बँट जाता है। एक — जिसने बंद किया। दूसरा — जिसके लिए बंद किया गया।"
"पर मेरे लिए नहीं बंद किया गया था," रणवीर ने कहा।
"नहीं," पापा ने कहा। "तेरे हिसाब के लिए बंद किया गया था। और तेरा हिसाब — तेरा हिसाब —"
"क्या?"
"तेरा हिसाब तेरे पास नहीं है।"
एक पल के लिए रणवीर ऐसे देखने लगा जैसे उसे कुछ बहुत पुरानी बात याद आ रही हो। फिर उसने अपना सिर झटका। फिर हँसा। बिना मज़ाक वाली हँसी।
"बकवास।"
"हाँ," पापा ने कहा। "बकवास। पर ताला भी बकवास कर रहा है। तुझे जला रहा है, मुझे नहीं। और उसका दूसरा हिस्सा — उसका दूसरा हिस्सा अंकुश की तरफ़ खिंच रहा है।"
रणवीर ने मेरी तरफ़ देखा।
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
और उसके चेहरे पर जो था — वो मैंने पहले कभी नहीं देखा था। खालीपन। जैसे कोई पुरानी इमारत गिर जाए और उसके अंदर कुछ न बचे — न पैसा, न मुस्कान, न हिसाब, बस खाली ज़मीन।
"तो ये —" उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो गरारी नहीं थी। "तो ये — तुम दोनों —"
"नहीं," पापा ने कहा। "ये हम दोनों नहीं हैं। ये ये ताला है। और ये ताला — इसे खोलने के लिए तीन चीज़ें चाहिए, एक नहीं।"
"कौन सी?"
"पहली — मेरा हाथ। क्योंकि मैंने बंद किया था।"
पापा ने ताले पर अपना हाथ रखा।
"दूसरी — तेरा हाथ।"
रणवीर ने अपना हाथ पीछे किया।
"तेरा हाथ, रणवीर। इस ताले पर। बिना जलन के।"
"मैं —"
"अगर तेरा हाथ जलता है तो इसका मतलब तेरे पास हक़ नहीं है। और अगर हक़ नहीं है तो तू इस याद के अंदर है ही नहीं।"
रणवीर ने एक लंबी साँस ली।
उसकी आँखें मेज़ पर थीं — पीली फाइल, उससे नीचे गोविंद भाई की रसीद, सक्सेना का रजिस्टर, और मेरी तरफ़। फिर पीछे भीड़ की तरफ़। फिर उसने धीरे से कहा —
"अगर मैं नहीं करूँ?"
"तो ये ताला कभी न खुलेगा," पापा ने कहा। "न तेरे लिए, न मेरे लिए, न अंकुश के लिए। बस — यहीं पड़ा रहेगा। गली में।"
"और तुम्हारी माँ की याद?"
माँ ने पहली बार आवाज़ उठाई।
"मेरी याद किसी ताले में नहीं है," उन्होंने कहा। "मेरी याद मेरे बेटे में है। मेरे पति में है। मेरी बेटी में है। मेरे हाथ की रोटी में है। ताले में नहीं।"
रणवीर ने उनकी तरफ़ देखा।
और माँ ने उसकी तरफ़ देखा, एक पल के लिए भी न झुकीं।
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