The Mysterious Bell – Chapter 1458
मैंने रणवीर की तरफ़ देखा।
वो हँसा नहीं।
और तभी उसके आदमी — वो पतला काला बैग वाला जो पहले अंधेरे में खिसक गया था — मेज़ के पास आकर रुका और उसने रणवीर के कान में कुछ कहा।
रणवीर का चेहरा — उस एक पल में — बदल गया।
वो पीछे हटा।
तभी मैदान के किनारे से आवाज़ आई —
"साहब! गाड़ी!"
सानिया की आवाज़।
"गाड़ी में धुआँ निकल रहा है!"
रणवीर भागा नहीं।
वो उलटा, दो क़दम पीछे हटकर, ज़मीन की तरफ़ झुका और उसने वो पत्थर उठा लिया जो मंच के पास पड़ा था — ईंट का आधा टुकड़ा, बड़ा, भारी।
मैदान में चीख पड़ी।
माँ ने काजल की कमीज़ पकड़ ली।
पापा आगे बढ़े — पर मैंने उनका हाथ पकड़ लिया।
और रणवीर ने पत्थर उठाकर मेज़ पर रखा मंसूर का काला ताला दिखाया — वही ताला जिस पर दो लकीर-बिंदु निशान था — और उसने उसे हवा में उठा लिया।
"तो आज यह ताला तोड़कर देखते हैं।"
मैदान सन्न रह गया।
उस्ताद की कैंची फिर ज़मीन पर गिरी।
और घंटी — मेरी हथेली में बर्फ़ जैसी ठंडी घंटी — एक बार बजी।
एक बार।
बहुत धीमे।
और उसने एक ही शब्द कहा।
"नहीं।"
॥
"नहीं।"
एक शब्द। बस एक शब्द।
और वो शब्द मेरी हथेली से निकलकर पूरे मैदान में ऐसे फैला जैसे गरम तवे पर पानी की बूँद पड़े तो एक झटके में भाप बनकर चारों तरफ़ फैल जाती है।
रणवीर का हाथ हवा में था। ऊपर उठा हुआ। एक मुट्ठी में आधी ईंट, दूसरी हथेली पर मंसूर चाचा का काला ताला।
और वो रुका।
एक पल के लिए रुका। जैसे कोई तेज़ चलते-चलते दीवार देखकर ठिठक जाए। उसकी कलाई में जो ज़ोर भरा था, वो ज़ोर हवा में ही अटक गया।
मैं नहीं रुका।
मेरे पैर मुझसे पहले भाग चुके थे। मंच की सीढ़ी, फिर मेज़, फिर वो दो क़दम जो मेरे और उसके बीच थे — मुझे याद नहीं कि मैंने वो क़दम कब पूरे किए। बस इतना याद है कि मेरे कानों में पूरे मैदान की चीखें थीं।
माँ की आवाज़ सबसे ऊपर थी — "अंकुश!"
काजल — "भैया, रुक जा!"
और पीछे कहीं टिंकू की पतली आवाज़ — "उस्ताद!"
लेकिन मैं जितना तेज़ भागता, उतना ही मुझे लगता कि मैं देर कर रहा हूँ। क्योंकि रणवीर का हाथ ऊपर था और उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो मैंने आज तक नहीं देखी थी — सिर्फ़ हिसाब। न गुस्सा, न मज़ाक, न वो चिकनी मुस्कान। बस एक ठंडा हिसाब, जैसे कोई पुरानी किताब का आख़िरी पन्ना फाड़ रहा हो, ताकि किसी को आगे कुछ पढ़ने की ज़रूरत ही न पड़े।
और फिर —
मैंने अपने आगे कुछ देखा।
एक कमीज़। पुरानी नीली कमीज़। घिसी हुई आस्तीन।
पापा।
वो मुझसे पहले पहुँच गए।
मुझे नहीं पता कि वो कैसे पहुँचे। वो पीछे थे, माँ के पास, काजल के पास — और अगले ही पल वो मेरे और रणवीर के बीच में खड़े थे। सीधे। बिना झुके। मैं उन्हें बाईस साल से झुका हुआ देखता आया था — दुकान में झुके, औज़ार के सामने झुके, काग़ज़ के सामने झुके, हर किसी के सामने झुके।
आज वो सीधे खड़े थे।
और उनकी आवाज़ में वो काँप नहीं थी जो पिछले पाँच साल से थी। वो काँप था — पर किसी और चीज़ का। गुस्से का।
"रणवीर।"
रणवीर का हाथ वैसे ही हवा में था। उसने पापा को देखा। एक पल के लिए उसकी आँखों में कुछ चमका, फिर बुझ गया।
"शंकर," उसने कहा। आवाज़ बिल्कुल सपाट। "हट जा।"
"नहीं हटूँगा।"
"शंकर —" रणवीर ने पत्थर वाला हाथ ज़रा और ऊपर किया। "मैं एक बार कह रहा हूँ।"
"मैं भी एक बार कह रहा हूँ।"
पापा एक क़दम और आगे बढ़े। उनका कंधा रणवीर के सीने के सामने आ गया, ठीक उसी ताले के सामने जो रणवीर की दूसरी हथेली पर पड़ा था।
"इस याद को तोड़ना है ना?" पापा ने कहा। उनकी आवाज़ धीमी थी, पर मैदान के आख़िरी कोने तक पहुँच रही थी। "तो पहले मुझे तोड़।"
मैदान में जो सन्नाटा था, वो और गहरा हो गया।
"क्योंकि ये ताला मैंने बंद किया था।"
मेरे पैर ज़मीन पर जम गए।
माँ की तरफ़ देखा तो वो अपनी साड़ी का पल्लू मुँह पर दबाए खड़ी थीं। काजल उनका हाथ पकड़े थी। काजल की आँखों में आँसू थे, पर वो रो नहीं रही थी। वो पापा को देख रही थी — जैसे पहली बार देख रही हो।
उस्ताद अली बक्श कुर्सी के पास खड़े थे। उनकी कैंची ज़मीन पर पड़ी थी और उन्होंने उसे उठाने की कोशिश भी नहीं की। उनका मुँह खुला था।
शबनम आपा ने अपनी चिमटी कमर में खोंस ली और रज़िया का हाथ पकड़ लिया।
हरीप्रसाद — जो अभी-अभी सबके सामने अपना पच्चीस साल पुराना सच खोलकर खड़े थे — उन्होंने अपनी आधी उँगली वाला हाथ सीने पर रख लिया, जैसे किसी चीज़ से बचाना हो।
और पीछे, बुझे हुए दीयों की आख़िरी पंक्ति के पास, वो लकड़ी के जूतों वाला बूढ़ा खड़ा था। उसकी हथेली में वो चौकोर चीज़ थी जिस पर लाल रेशमी धागा बँधा था। वो हिल नहीं रहा था। बस देख रहा था।
रणवीर ने एक धीमी साँस ली। उसकी मुट्ठी में पत्थर थोड़ा और कस गया।
"शंकर," उसने कहा, और इस बार उसकी आवाज़ में वो चिकनाई लौट आई थी। "तूने खुद बंद किया था। तेरी मर्ज़ी से। तेरे हाथ से। तेरे अंगूठे से।"
"हाँ।"
"तो हक़ मेरा है।"
"क्यों?"
रणवीर हँसा। छोटी हँसी। जैसे कोई बच्चा गलत सवाल पूछे।
"क्योंकि तूने मेरे लिए बंद किया था, शंकर। मेरे हिसाब के लिए। मेरे काग़ज़ के लिए। तेरा अंगूठा मेरे रजिस्टर पर है। ये ताला उसी रजिस्टर की याद है।"
"गलत।"
एक शब्द। बस एक शब्द।
मैंने पापा को कभी इतनी साफ़ आवाज़ में "गलत" कहते नहीं सुना था।
"ये ताला तेरे रजिस्टर की याद नहीं है," पापा ने कहा। "ये उस रात की याद है जिस रात मैंने अपनी मर्ज़ी छोड़ दी थी। उस रात के डर की याद है। और डर — डर तेरा नहीं होता, रणवीर। डर उसका होता है जो डरता है।"
उन्होंने एक क़दम और आगे बढ़ा। अब उनका सीना लगभग ताले से छू रहा था।
"और जो बंद करता है — खोलेगा भी वही।"
रणवीर की आँखें सिकुड़ीं।
"ये कोई पुरानी कहावत नहीं है, शंकर।"
"कहावत नहीं है," पापा ने कहा। "हिसाब है।"
और फिर —
ताले से रोशनी निकली।
नीली।
बहुत हल्की। जैसे अंधेरे कमरे में कोई पुराना बल्ब काँपकर जले। मैंने ये रोशनी एक बार पहले देखी थी — जब ताला मेरे हाथ में आया था और उसने कहा था कि ये अब एक का नहीं, दो का है।
पर इस बार कुछ अलग था।
इस बार रोशनी ताले से निकलकर सीधे रणवीर की हथेली में गई।
और रणवीर की हथेली — जो अब तक ताले को ठंडे लोहे की तरह पकड़े थी — अचानक खुल गई। नहीं, खुली नहीं। मजबूर होकर खुली।
उसने ताले को पकड़ने की कोशिश की, पर उसकी उँगलियाँ जैसे किसी चीज़ से जल रही थीं। वो ताला नीचे नहीं गिरा। वो रणवीर की हथेली से चिपका रहा, गरम होता रहा, और रणवीर — रणवीर जिसने आज तक किसी के सामने अपना हाथ नहीं काँपने दिया — उसका हाथ काँपने लगा।
और फिर —
पत्थर नीचे गिरा।
मैदान की मिट्टी पर। उसकी आवाज़ इतनी तेज़ थी कि लगा किसी ने बंदूक चलाई हो। पर नहीं — सिर्फ़ ईंट का आधा टुकड़ा था। बस वो गिरा, और उसके साथ पूरे मैदान का सन्नाटा और गहरा हो गया।
रणवीर ने अपना हाथ झटके से पीछे खींचा।
ताला उसकी हथेली से छूटकर पापा के हाथों में गिरा।
पापा ने उसे दोनों हाथों से पकड़ लिया। उनके हाथ नहीं काँपे। ताला उनके हाथों में ठंडा हो गया, जैसे कोई पुराना कुत्ता अपने मालिक के पास लौट आए और चुप हो जाए।
मैं वहीं खड़ा था। दो क़दम पीछे। मेरे हाथ अभी भी आगे बढ़े हुए थे — जैसे जिन्हें मैंने पकड़ने की कोशिश की थी और नहीं पकड़ पाया।
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