The Mysterious Bell – Chapter 1457
वो मुड़ीं। सीढ़ी की तरफ़ बढ़ीं।
और फिर रुककर, बिना पलटे, उन्होंने आख़िरी बात कही —
"और मेरी साड़ियाँ गिनती में कम हैं — इसलिए जल्दी चुकाइए।"
मैदान हँसा।
मैं भी हँसा। और मेरी आँखें भर आईं।
माँ सीढ़ी से नीचे उतरीं, और काजल ने उन्हें थाम लिया।
और फिर —
"हिसाब आज ही चुकेगा।"
पापा। पीछे से। मंच पर से। उनकी आवाज़ बहुत धीमी थी, पर जैसे किसी ने माइक लगा दिया हो — पूरा मैदान सुन रहा था।
पापा आगे आए। अपना टेप वाला चश्मा सीधा किया। नीली शर्ट की आस्तीन चढ़ाई।
"साहब," उन्होंने कहा, "आपने मेरी बीवी का इलाज कराया — मैं उसका नमक खाया है, ये मैं नहीं भूलूँगा। पर ये भी सच है कि मैंने अपना अंगूठा उस काग़ज़ पर रखा था जिसे मैंने पढ़ा नहीं था। और मैंने ये नहीं कहा कि सिर्फ़ आपने मुझे डराया। मैं भी डरा। मैं अपना डर आप पर नहीं फेंकूँगा।"
वो मेरे पास आए। मेरे कंधे पर हाथ रखा। उनका हाथ भारी था।
"पर साहब — मेरा बेटा अभी जवान है। और मैंने उसे बत्तीस साल बाद कुछ दिया है। मैंने उसे एक चीज़ दी है। आज मैंने उसे सच दिया है।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। मुझे नहीं — मेरे ऊपर से — मेरे अंदर देखा।
"और मैं इसे अब वापस नहीं लूँगा। पूरी गली गवाह है।"
फिर वो रणवीर की तरफ़ मुड़े।
"हिसाब आज ही चुकेगा, साहब। पैसा जो चुकाना है, चुकाऊँगा। काग़ज़ जो देना है, दूँगा। पर ये ताले — ये यादें — ये काग़ज़ जो मेरे बेटे ने नहीं लिखे, जो मेरे बाप ने नहीं लिखे — ये मैं किसी को नहीं छूने दूँगा।"
मैदान फिर गरमाया।
"हाँ!"
"बोलो, दे दो हिसाब!"
"हम पर भी जो किया, बोलो!"
और मैंने उस एक पल में देखा — मैदान में दो हिस्से नहीं रहे थे। डर का एक हिस्सा रह गया था — पर वो छोटा था। बहुत छोटा।
रणवीर के साथ खड़े जो दो-चार आदमी बचे थे — वो भी अब सक्सेना के करीब नहीं थे।
सक्सेना खुद ज़मीन पर बैठे थे — मैंने सोचा था वो बैठे हैं क्योंकि उनके पैर नहीं कर रहे।
फिर मैंने देखा — वो बैठे नहीं थे।
वो अपने बिखरे हुए रजिस्टर के पन्ने उठा रहे थे।
एक-एक करके। धूल झाड़कर। करीने से।
और वो कुछ फुसफुसा रहे थे। मैं पास गया।
वो अपने ही हाथ से लिखी एक लाइन पर उँगली रखे थे और वही लाइन बार-बार पढ़ रहे थे —
"ब्याज — माफ़। शर्त — अंगूठा।"
मैंने झुककर देखा। वो लाइन रणवीर के काग़ज़ की नहीं थी। वो उनके अपने हिसाब की लाइन थी।
उन्होंने सिर उठाया।
"अंकुश बेटा," उन्होंने कहा, "मैं उन्नीस साल से ये काग़ज़ नहीं पढ़ रहा था। मैं सिर्फ़ लिखता जा रहा था। लिखना आसान होता है। पढ़ना मुश्किल।"
उन्होंने वो रजिस्टर बंद किया। और उसे दोनों हाथों से पकड़कर अपने सीने से लगाया।
"ये मैं उन्नीस साल में पहली बार पढ़ूँगा। आज रात।"
मैदान में तालियाँ बजीं।
मेज़ पर से किसी ने तालियाँ नहीं बजाईं।
और रणवीर —
रणवीर ने अपनी वो मुस्कान आख़िरी बार निकाली।
"अच्छा," उसने कहा। "बहुत अच्छा।"
उसने रसीद मोड़ी। जेब में रखी। फिर दोनों हाथ जेब में डालकर खड़ा हो गया — वैसे ही जैसे वो तस्वीरों में कंबल बाँटते वक़्त खड़ा होता था।
"तो अब ये मुहर का रोना शुरू?"
उसकी आवाज़ मीठी थी — इतनी मीठी कि मुझे मिचली आई।
"गोविंद भाई, आपने बत्तीस साल मेरे यहाँ काम किया। आपकी तनख्वाह, आपके बच्चों की पढ़ाई, आपकी बीवी का ऑपरेशन — सब मेरे हाथ से गया। आपने आज सबके सामने मेरा नाम मिट्टी में मिला दिया। शाबाश।"
उसने उन्हें देखा।
"और आप, शंकर जी। आपकी बीवी की दवा मेरे पैसे से आती थी — और आप यहाँ खड़े होकर 'हिसाब चुकाऊँगा' कह रहे हैं। किससे चुकाओगे? अपनी दुकान से? जो मेरे नाम पर है?"
पापा हिले नहीं।
"तो अब सुनो सब," रणवीर ने मैदान की तरफ़ देखा। "मैंने इन लोगों को कुछ नहीं दिया। इन्होंने खुद मुझे दिया। ये मेरे प्लॉट पर मज़दूरी करने आए। ये मेरी तिजोरी के सामने हाथ फैलाकर खड़े हुए। और जिस दिन मेरा फायदा हुआ, उस दिन ये लोग मेरी बीवी-बच्चों के लिए दुआ देते थे।"
वो मुस्कुराया।
"अब जब वो फायदा याद आता है — तो मुहर याद आती है। और जब मुहर याद आती है — तो ये लड़का घंटी निकाल लाता है।"
वो मेरी तरफ़ मुड़ा।
"बेटा, तेरी घंटी में क्या है? कुछ है भी? मुझे बता — एक बात का जवाब दे, मैदान में, आज, सबके सामने। तेरी घंटी ने जो कहा — उसमें से एक बात भी सच हुई? बता। एक भी?"
मैदान चुप।
मेरे हाथ में घंटी थी। ठंडी। चुप।
मैंने उसकी आँखों में देखा।
"साहब," मैंने कहा, "मेरी घंटी ने मुझसे जो कहा, वो मैंने किसी को नहीं बताया। क्योंकि वो मेरी और उसके बीच था। पर आप पूछ रहे हैं — तो सुनिए।"
मैंने घंटी उठाई।
"इस घंटी ने मुझे सबसे पहले कहा था — 'तू जोड़ सकता है, पर तेरे पास कुछ नहीं रहेगा।' और देखिए साहब — मेरे पास कुछ नहीं है। न अंक। न ताक़त। न कोई जादू। सिर्फ़ एक वादा है कि मैं झूठ नहीं बोलूँगा।"
मैंने घंटी नीचे की।
"और आपने पूछा कि एक बात भी सच हुई। तो हाँ। मैंने आपके मुँह से आज एक सच्ची बात सुनी। आपने पापा को 'शंकर जी' कहा — पर पहली बार आपकी आवाज़ में कुछ था जो मिठास नहीं था। वो डर था।"
रणवीर के होंठ सिकुड़े।
"मेरे पास डरने की कोई वजह नहीं है, बेटा।"
"तो फिर आप अपनी उँगली पर बँधा वो काला धागा क्यों छिपा रहे हैं?"
वो हिला।
उसने अपने हाथ जेब में और गहरे डाल लिए।
और मैंने देखा — उसकी जेब के अंदर उसका हाथ घूम रहा था। कुछ पकड़ रहा था। छोड़ रहा था। फिर पकड़ रहा था।
वो चुप था। बहुत देर चुप था।
और उस चुप्पी में मैंने अपने पीछे एक आवाज़ सुनी —
"अंकुश।"
मैं पलटा।
उस्ताद अली बक्श कुर्सी से उठ खड़े थे। उन्होंने अपनी कैंची ज़मीन से उठा ली थी। और उनकी आवाज़ में वो बात थी जो आज तक नहीं थी।
"बात बहुत हो गई। फाइल खोल।"
मैंने फाइल की तरफ़ देखा।
"गोविंद भाई। सक्सेना जी। आइए।"
दोनों आए।
गोविंद भाई ने हार मेज़ पर रखा। सक्सेना ने रजिस्टर मेज़ पर रखा। और मैंने फाइल पर अपने दोनों हाथ रख दिए।
"पहला हाथ — गोविंद भाई का।"
गोविंद भाई ने हाथ बढ़ाया। उनका हाथ काँप रहा था — पर उन्होंने ज़ोर लगाया और फाइल की रस्सी खींची।
गाँठ खुली।
"दूसरा हाथ — सक्सेना जी का।"
सक्सेना ने काग़ज़ का ऊपरी पन्ना उठाया।
और फिर सब रुके।
क्योंकि फाइल के अंदर सबसे ऊपर वाला काग़ज़ — जिस पर मेरी नज़र थी — वो काग़ज़ नहीं था जिसकी मुझे उम्मीद थी।
वो खाली था।
बिल्कुल खाली।
सफ़ेद। बिना लिखाई। बिना मुहर। बिना तारीख़।
मैदान में किसी ने साँस रोक ली।
"अरे…" गोविंद भाई ने धीरे से कहा।
"नीचे देखिए," सक्सेना ने कहा। उनकी आवाज़ फटी हुई थी।
मैंने खाली पन्ना हटाया।
नीचे वाला पन्ना — नीली स्याही, घिसे किनारे, पुरानी तह — वो असली था।
और उस पन्ने पर सबसे ऊपर एक लाइन लिखी थी, जो किसी भी हिसाब की नहीं थी।
"ये काग़ज़ जिस दिन खुलेगा, उस दिन माँ की हँसी उस ताले में आख़िरी बार बजेगी।"
मैंने सक्सेना की तरफ़ देखा। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। और उनका चेहरा — जैसे उन्होंने ये लाइन पहले कभी नहीं देखी हो।
"ये… ये मेरी लिखाई में नहीं है," उन्होंने कहा।
"मेरी भी नहीं," गोविंद भाई ने कहा।
मेरे कान में घंटी से एक धीमी आवाज़ आई —
"मुहर वाला हाथ।"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno