The Mysterious Bell – Chapter 1453
नहीं।
गिरे नहीं।
वो लड़खड़ाए।
उनका रजिस्टर उनके हाथ से फिसला और ज़मीन पर गिरा। धूल उठी। पन्ने खुले। हवा ने एक पन्ना उठाया और उड़ा दिया।
और सक्सेना — बैठ गए।
नीचे। ज़मीन पर। मैदान की ठंडी मिट्टी पर। दीयों के बीच।
और उन्होंने सिर उठाकर रणवीर की तरफ़ देखा।
उस नज़र में कुछ था जो मैंने आज तक किसी आदमी की आँखों में नहीं देखा था।
डर।
पर वो डर भगवान का नहीं था।
वो डर उस आदमी का था जिसने उम्र भर किसी और के लिए गड्ढा खोदा है और अब देख रहा है कि उसके अपने पैर उसी गड्ढे के किनारे पर हैं।
"साहब।"
उन्होंने कहा। और उनकी आवाज़ उस "साहब" शब्द में टूट गई।
"साहब, मैंने… मैंने मजबूरी में…"
रणवीर ने जवाब नहीं दिया।
उसने सिर्फ़ अपनी नज़र सक्सेना से हटाकर मेरे ऊपर डाली।
और उस नज़र में — पहली बार — कुछ ऐसा था जो मुझे अजीब तरह से जीत जैसा लगा।
थोड़ी देर पहले तक वो मुझे ऐसे देखता था जैसे कोई बड़ा भाई छोटे को देखता है। मुस्कुराते हुए। प्यार से। जिसमें धमकी होती है पर चीनी लगी होती है।
अब वो नज़र सिर्फ़ चीनी थी — और उस चीनी को उतार दिया गया था।
अब वो मुझे ऐसे देख रहा था जैसे कोई हिसाब लगा रहा हो।
कितना बचा है। क्या बचा है। कहाँ से निकलना है।
और उसी वक़्त मेरे पीछे से आवाज़ आई —
"छोड़ो उसे।"
दुबे अंकल।
उनकी लाठी ज़मीन पर टक हुई। टक। टक। टक। वो भीड़ चीरते हुए आगे आए। उनकी नीली शर्ट। उनका रूमाल गले में।
और वो मेरे पास आकर रुके। मेरे कंधे पर हाथ रखा — बूढ़े आदमी का हाथ, भारी, हड्डी वाला, काँपता हुआ, पर पक्का।
उन्होंने मैदान की तरफ़ देखा और कहा —
"आज अगर कोई भी, किसी भी आदमी को, इस मैदान में हाथ लगाएगा — तो वो मेरी लाठी से पहले मुझे गिराएगा। और मैं आज तीस साल पुरानी वर्दी वाले रामदीन दुबे की कसम खाता हूँ, मैं इस मैदान में गिरूँगा ज़रूर, पर अकेला नहीं।"
मैदान में जो पहले सन्नाटा था, वो टूटा।
पर अच्छे तरीके से नहीं।
बुरे तरीके से।
चारों तरफ़ से आवाज़ें उठीं। कुछ लोग आगे आए। कुछ पीछे हटे। एक औरत ने अपने बच्चे का सिर सीने से लगाया। कोई बोला — "बोलने दो बोलने दो"। कोई बोला — "ये सब नाटक है"।
और रणवीर ने — इस सबके बीच — अपना हाथ उठाया।
बस हाथ।
और उसके दो आदमी, जो मंच के दोनों तरफ़ खड़े थे, पीछे हट गए।
उसने माइक उठाया।
उसका माइक कटा हुआ था। उसकी तार काटी गई थी। पर वो उसे उठाकर मुँह के पास ले गया और बोला —
"भाइयों और बहनों।"
उसकी आवाज़ बाहर नहीं गई। क्योंकि माइक मरा हुआ था।
पर पहली पंक्ति में खड़े लोगों ने सुना। और उन्होंने आगे पहुँचाया। और धीरे-धीरे पूरा मैदान सुनने लगा — एक आदमी से दूसरे तक, फुसफुसाहट में।
"मैं आज किसी से कुछ नहीं छिपाऊँगा।"
मैं हँसा।
मेरे मुँह से हँसी निकली। बिना रोक। मैदान के बीच। सबके सामने।
"रणवीर साहब। आप माइक उठाकर 'कुछ नहीं छिपाऊँगा' कह रहे हैं। आपका माइक ही कटा हुआ है।"
कुछ लोग हँसे।
थोड़े।
पर हँसे।
और वो हँसी आज की सबसे बड़ी चीज़ थी। क्योंकि सालों से उस आदमी की हँसी के सामने सब चुप होते थे। आज मैदान में हँसी उसके बाद आई थी।
रणवीर ने माइक नीचे कर दिया।
और उसने वो किया जो वो हमेशा करता था जब उसका कोई हथियार टूटता था।
उसने मुस्कुराने की कोशिश की।
और इस बार — इस एक बार — मुस्कान नहीं बनी।
उसके होंठ काँपे।
एक पल के लिए। एक पल के लिए उसका चेहरा — जिस पर मैंने हमेशा सिर्फ़ चीनी देखी थी — टूट गया। और उस टूटे हुए चेहरे पर मुझे एक आदमी दिखा। अड़तालीस साल का। बहुत थका हुआ। जिसने अपनी पूरी ज़िंदगी किसी और के नाम पर, किसी और के हिसाब पर, किसी और की मुहर पर टिका दी थी।
और फिर उसने आँखें झपकीं।
और चेहरा वापस आ गया।
अब वो मुस्कुरा रहा था।
और वो मुस्कान पहले से भी ज़्यादा डरावनी थी।
"बेटा।"
उसने मुझे फिर "बेटा" कहा।
पर इस बार शब्द गले में फँसा हुआ आया।
"तू बहुत आगे बढ़ गया है। एक मिनट की चीज़ से तूने मेरे वकील का मुँह खोल दिया।"
उसने धीरे से सिर हिलाया।
"अब सुन। तेरे पास अब कुछ नहीं है। तेरी घंटी ठंडी है। तेरे अंक साफ़ हो गए। तूने अपना पूरा ज़ख़ीरा इस एक मिनट में उड़ा दिया। और सक्सेना — सक्सेना जो बोला, वो मैदान में बोला। काग़ज़ पर नहीं। तारीख़ पर नहीं। मुहर पर नहीं।"
उसने मेरी तरफ़ उँगली उठाई।
पहली बार।
उस आदमी ने पहली बार मेरी तरफ़ उँगली उठाई।
"और कल सुबह नौ बजे मेरी गाड़ी, मेरी सीट, मेरी डिक्की — सब खाली मिलेगी। क्योंकि मुझे पता है तू क्या करेगा। तू सबसे पहले उसी गाड़ी पर जाएगा।"
और उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ ऐसा आया जो सच था। वो सच बोल रहा था। वो नहीं जानता था कि मैं क्या करूँगा, पर वो ये जानता था कि मैं गाड़ी पर जाऊँगा।
और मुझे उसी पल समझ आया।
उसने अपना हाथ जेब से निकाला।
बहुत धीरे से।
और मैंने देखा कि उसकी उँगली पर — दो लकीरें और बीच में बिंदु वाला — वो पुराना निशान नहीं था।
इसकी उँगली पर एक काला धागा था।
या।
या कोई चीज़ जो काला नहीं थी, पर रोशनी में काली दिख रही थी।
और उसने मेरी तरफ़ देखकर कहा —
"तेरे पास अंक नहीं बचे। तेरी घंटी ठंडी है। तेरे पास सिर्फ़ आवाज़ बची है। और आवाज़ — आवाज़ से काग़ज़ नहीं खुलते, बेटा। काग़ज़ के लिए हाथ चाहिए। और हाथ — हाथ तेरे पास एक भी नहीं है।"
मैदान में सन्नाटा था।
और मैंने — बिना सोचे — अपने हाथ उठाए।
दोनों।
और मैंने कहा —
"ये दो हाथ हैं।"
मैदान में किसी ने साँस ली।
मैंने आगे कहा —
"और इनके पीछे — ये पूरा मैदान है।"
मैंने उँगली से पीछे इशारा किया। मैंने देखा भी नहीं कि कौन खड़ा है। मैंने बस इशारा किया।
"आप गिन लीजिए। मैदान में कितने हाथ हैं।"
उसने मेरी तरफ़ देखा।
और उसके चेहरे पर — मुस्कान थी, पर आँखों में कुछ नहीं।
"मुझे हाथ नहीं चाहिए, बेटा। मुझे सिर्फ़ एक अंगूठा चाहिए। और अंगूठे — अंगूठे मेरे पास हैं। पचास से ज़्यादा। इसी गली के। इसी मैदान के।"
वो मुड़ा।
और मैदान से बोला —
"जिन भाइयों ने अपना अंगूठा दिया है, वो जानते हैं कि अगर काग़ज़ सच में खुल गया, तो पहला नाम किसका आएगा?"
किसी ने जवाब नहीं दिया।
"उनका।"
उसने मेरी तरफ़ देखकर कहा।
"उसका।"
और फिर उसने उस्ताद अली बक्श की तरफ़ देखा।
"और उसका।"
मैदान में जो लोग पहले आगे आए थे, वो थोड़े पीछे हट गए।
मैंने अपनी ज़ुबान काटी।
वो सच बोल रहा था।
और यही उसका सबसे बड़ा हथियार था।
वो लोगों को डराता नहीं था। वो उन्हें ये याद दिलाता था कि वो खुद कहाँ फँसे हैं।
मैंने अपनी साँस रोकी।
और मेरे कान में — बर्फ़ जैसी ठंडी घंटी से — एक आवाज़ आई।
बहुत धीमी।
एक शब्द।
"अब।"
बस।
मैंने घंटी को हथेली में कसा।
और मेरी नज़र — बिना मेरे चाहे — मैदान के किनारे की तरफ़ गई।
जहाँ दीयों की रोशनी खत्म हो रही थी।
जहाँ अंधेरा शुरू होता था।
और उस अंधेरे में — एक सफ़ेद गाड़ी खड़ी थी।
सक्सेना की गाड़ी।
मैंने उसे देखते हुए सुना कि मेरी हथेली में घंटी — फिर ठंडी हो गई, जैसे उसने भी अपनी आख़िरी बात कह दी हो।
मैंने सक्सेना की तरफ़ देखा।
वो अब भी ज़मीन पर बैठे थे। रजिस्टर उनके सामने खुला पड़ा था। हवा उसके पन्ने उठा रही थी।
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