The Mysterious Bell – Chapter 1451
छोटी सी बात थी। पर उनके मुँह से सुनकर ऐसा लगा जैसे पचास साल का हिसाब एक झटके में हल्का हो गया। जैसे उन्होंने सारी चुप्पी के बदले मुझे ये एक ही राय दी हो — और वो काफ़ी थी।
मैंने सिर हिलाया।
मैंने मुड़कर उस्ताद की तरफ़ देखा।
उस्ताद मेरे बगल में खड़े थे। सत्तर की उम्र, मोटा चश्मा, कान पर पेंसिल, हाथ में कैंची। जो आज फिर से उनकी जेब में होनी चाहिए थी। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। मुझे लगा वो जानते हैं कि मैं क्या करने वाला हूँ।
"सौ अंक का चक्कर," उन्होंने कहा, "मैंने पचास साल पहले एक बार खरीदा था।"
मैंने कान उठाए।
"कब?"
"जब मेरा भाई खोया था। मैंने सोचा — एक मिनट के लिए सच बोलूँगा और सब मेरे सामने साफ़ हो जाएगा।"
"तो क्या हुआ?"
उन्होंने कैंची जेब में ठूँसी।
"हुआ ये कि उस एक मिनट में मेरा भाई — जो मेरे सामने बैठा था — मुझसे कहता रहा, 'भाई, तू सच बोल। मैं तुझे सच में गलती बता दूँगा।' और मैं — मैंने सच बोला। और वो सुनकर उठ गया। कह गया — भाई, तूने जो बोला, वो सच है। पर उस सच में मेरे लिए जगह नहीं थी। और चला गया। फिर कभी नहीं आया।"
मेरा मुँह खुला रह गया।
"तो…"
"तो सच बोलने का मतलब ये नहीं कि सब कुछ अच्छा हो जाएगा। सच बोलने का मतलब ये है कि जो अच्छा नहीं होगा, उसका ईमानदार हिसाब मिलेगा। ये सच का काम नहीं। सच उस हिसाब का काम करता है।"
"फिर भी मुझे खरीदना है।"
"खरीद। पर याद रख। एक मिनट की सच्ची ज़ुबान थोड़ी देर के लिए तेरी ज़ुबान से ज़्यादा मज़बूत हो जाती है। वो उस एक मिनट में तेरी आवाज़ बन जाती है। तू जो बोलेगा — वो दिल से नहीं, उस सच से आएगा जो तेरे भीतर है। और तेरे भीतर — जो कुछ हो — वो भी बाहर आएगा।"
मैंने एक लंबी साँस ली।
"उस्ताद, मुझे डर लग रहा है।"
"अच्छा है।"
"क्यों?"
"क्योंकि जो डरता नहीं, वो झूठ बोलता है। डर इंसान का सबसे ईमानदार हिस्सा है।"
उन्होंने मुझे कंधे से पकड़कर थोड़ा और करीब खींचा।
"एक बात और। सुन।"
मैंने सुना।
"जिस लम्हे तेरी ज़ुबान सच बोलेगी — उस लम्हे में तेरा सबसे पुराना झूठ भी बाहर आएगा। मेरे साथ आया था। तेरे साथ भी आएगा। तैयार रह।"
मेरी रीढ़ में ठंडी चुभन उतरी।
झूठ।
मेरा सबसे पुराना झूठ क्या था?
मुझे याद नहीं था।
शायद इसीलिए — यही डर — मैंने कभी सोचा ही नहीं।
मैंने मैदान की तरफ़ देखा।
भीड़ अब भी वहीं थी। पर अब चेहरे बदल रहे थे। कुछ लोग मेरी तरफ़ देख रहे थे। कुछ उस बूढ़े की तरफ़। कुछ रणवीर की तरफ़। कुछ चंद्रेश सक्सेना की तरफ़। कुछ मीरा की तरफ़ — जिसने अपनी कमर पर हाथ रखा हुआ था, और जिसकी क्लिपिंग अब भी चल रही थी, चाहे कैमरा इतना ऊपर था कि सब नहीं आ रहा था।
मीरा।
मीरा की आँखें मुझ पर थीं।
मैंने उसकी तरफ़ सिर हिलाया।
उसने आँख से इशारा किया — पूछ रही थी "क्या करने वाला है"।
मैंने कुछ नहीं कहा।
बस हाथ उठाया — एक पल के लिए — जैसे कह रहा हो — रिकॉर्ड करती रह। तेरी नज़र में मेरा हर पल हो।
मैंने घंटी जेब से निकाली।
अब वो गरम नहीं थी। वो ठंडी थी।
पर ठंडी होकर भी मेरी हथेली में जीवित थी। धातु जीवित नहीं होती। पर ये धातु मेरी हथेली में हिल रही थी — जैसे कोई छोटा जानवर मेरी उँगलियों के बीच बैठा हो।
मैंने उसे उठाया।
मैदान फिर सन्न।
मैंने धीरे से कहा —
"घंटी।"
कोई जवाब नहीं।
"मैं एक चीज़ खरीदना चाहता हूँ।"
फिर भी कोई जवाब नहीं।
"सौ अंक। सच्ची ज़ुबान। एक मिनट।"
घंटी चुप।
मेरे सीने में धड़कन तेज़।
मैंने एक गहरी साँस ली। और कहा —
"सच बोलूँगा। भले जो नुकसान हो। भले मुझे खुद पर बोलना पड़े। भले सब चला जाए। मैं सच बोलूँगा।"
घंटी अब भी चुप।
मैंने मन में उस्ताद की बात याद की — जो डरता है वो ईमानदार है।
मैंने कहा —
"मैं डर रहा हूँ। मुझे हर बात का डर है। माँ की दवा का, टिंकू के स्कूल का, पापा के हिसाब का, अस्पताल के सील का, उस्ताद की दुकान का, शबनम आपा के चूल्हे का, मीरा की ग़लती का, हरिप्रसाद की आधी उँगली का — सबका। और डर से भी बड़ा डर — मुझे इस बात का डर है कि जब मैं सच बोलूँगा, तो किसी को चोट पहुँचेगी। कोई मुझसे दूर हो जाएगा।"
मैदान में मेरी आवाज़ गूँज गई।
पर बात मैंने मेज़ पर नहीं कही थी। बात मैंने अपने अंदर कही थी। फिर भी सबने सुना। ये मेरी आवाज़ थी। सच की आवाज़।
मेरे हाथ में घंटी।
फिर।
एक बार — बहुत छोटा — बजी।
एक झटका।
फिर घंटी से नीली रोशनी निकली — ठंडी, हल्की, साफ़। किसी झरने की तरह। और वो रोशनी मुझसे निकली। मुझसे होकर। मेरे हाथ से। मेरे कंधे से। मेरे सीने से। और…
…वो बढ़ी।
फैली।
और मैदान की भीड़ के ऊपर से गुज़री — जैसे किसी पतली उँगली ने हवा को चीरा हो।
मैंने रोशनी की दिशा देखी।
वो सीधी जा रही थी।
मैदान के बीच से।
सबको छोड़कर।
…चंद्रेश सक्सेना की तरफ़।
सबने देखा।
सक्सेना मेज़ के पास खड़े थे। हाथ में रजिस्टर और कलम। उनकी कलम अब भी काग़ज़ पर थी — जहाँ वो कुछ लिख रहे थे। पर रोशनी के आते ही उनका हाथ रुक गया।
उन्होंने सिर उठाया।
रोशनी उनके सीने पर पहुँची।
और छा गई।
चंद्रेश सक्सेना की सफ़ेद कुर्ते पर — नीली रोशनी — ऐसी कि वो खुद अब सफ़ेद नहीं, नीले दिखने लगे।
उनकी आँखें बड़ी हो गईं।
उनके होंठ हिले।
पर आवाज़ नहीं निकली।
मीरा का कैमरा उन पर था।
दुबे अंकल ने लाठी उठाई।
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा।
और मैंने घंटी में देखा।
घंटी ठंडी हो रही थी। बर्फ़ जैसी। मेरी उँगलियों में।
और मैंने कुछ सोचा। एक बात। जो मेरे मुँह से निकली — बिना मेरे चाहे। बिना मेरे रोके।
मैंने कहा —
"सक्सेना जी।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
रोशनी अब भी उनके सीने पर थी।
मैंने कहा —
"जो काग़ज़ आप पूरी शाम से रजिस्टर में लिख रहे हैं — उसके सबसे नीचे, आख़िरी लाइन में — क्या वो सच है? या आप उस लाइन को बाद में मिटाने वाले हैं?"
मेरे मुँह से निकला। मैंने नहीं सोचा था। मैंने पूछा नहीं था। पर निकल गया।
रोशनी के भीतर।
सच के उस एक मिनट में।
सक्सेना की कलम उनके हाथ से छूटी।
गिरी।
मेज़ पर खट हुई।
और उनका रजिस्टर — एक हाथ — धीरे से उनके सीने से सट गया।
और उनके होंठ हिले — बहुत धीमे। शब्द नहीं निकले। पर उनके होंठ साफ़ कह रहे थे — कुछ।
मैंने घंटी को और कसकर पकड़ा।
रोशनी थोड़ी और तेज़ हुई।
और सक्सेना ने — मैदान के बीच — अपनी आँखें बंद कर लीं।
उनकी साँस लंबी थी।
फिर छोटी।
फिर बहुत छोटी।
और उन्होंने अपनी कलम उठाई। और रजिस्टर के उस पन्ने की तरफ़ देखा — जो वो पूरी शाम भर रहा था।
और मैंने — मेरी ज़ुबान से, बिना मेरे चाहे — फिर कहा —
"सक्सेना जी।"
उन्होंने सिर उठाया।
"आप इस शहर के सबसे चालाक वकील हैं। मैंने सुना है। आपसे लोग डरते हैं। आपको भी कोई डराता है?"
मेरे भीतर किसी ने कहा — रुक जा। ये नहीं पूछना था।
पर ज़ुबान — मेरी ज़ुबान — सच बोल रही थी।
और एक पल।
एक पल के लिए।
चंद्रेश सक्सेना की आँखों में — जो पूरे पचास साल उस्ताद की कैंची जैसा सीधा रहा — कुछ ऐसा आया जो मैंने कभी नहीं देखा था।
डर।
नहीं।
डर नहीं।
कुछ और।
और उन्होंने बहुत धीरे, बहुत धीरे, कहा —
"हाँ।"
मैदान सन्न।
रोशनी धीरे-धीरे उनके सीने से उतर गई। घंटी ठंडी हो गई। बर्फ़ जैसी। फिर मेरी हथेली में — जैसी हमेशा होती थी।
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