The Mysterious Bell – Chapter 1450
मैंने मुँह खोला।
कुछ नहीं निकला।
क्योंकि जवाब मेरे पास था — पर वो जवाब सच नहीं था। जवाब सच का होता तो मैं बोल देता। और सच ये था कि मेरे पास जो भी है, वो ईंट-मसाला नहीं है। वो चीज़ों को नहीं जोड़ता। वो रिश्तों को जोड़ता है।
पर अगर मैं ये कहूँ — तो? कौन मानेगा?
मैदान में किसी और ने हाथ उठाया।
गुड्डू के पापा।
वो पहले भी बोले थे — नल के झगड़े में। जब सब टूटने की बात कर रहे थे, तब उन्होंने कहा था — भरोसा ख़त्म हो गया है।
अब उन्होंने आगे बढ़कर कहा —
"मैं कुछ नहीं कहता, अंकुश। तेरा काम अपनी जगह। पर एक बात साफ़ कह देता हूँ। ये ज़मीन — ये पीपल, ये मैदान, ये अस्पताल, ये स्कूल — सबका है। किसी एक का नहीं। न रणवीर भारद्वाज का। न तेरा। और कोई किसी की याद बंधक नहीं रख सकता। न तेरे पास, न उसके पास, न उस बूढ़े के पास।"
उन्होंने लकड़ी के जूतों वाले बूढ़े की तरफ़ उँगली उठाई।
"ये जो कोई भी हैं — चाबी उनके पास है, याद उनके पास है, हिसाब उनके पास है। पर मेरे भाई की दुकान, मेरे सामने है। मेरी बीवी का इलाज, सामने है। मेरे बच्चे का स्कूल, सामने है। अगर सच बोलने से इन तीनों में से एक भी ठीक हो जाए — तो मैं सबसे पहले बोलूँगा। पर तेरी घंटी सिर्फ़ सच गिनती है, या सच के बाद कुछ देती भी है?"
मैदान फिर सन्न।
टिंकू मेरी कमर से चिपका हुआ था। उसकी उँगलियाँ मेरी कमीज़ में धँसी थीं। उसने धीरे से, बहुत धीरे से, मेरे कान के पास कहा —
"उस्ताद…"
मैंने हल्का-सा "हूँ" कहा।
"अगर तुम्हारे पास जादू होता…" उसकी आवाज़ काँप रही थी। "तो तुम स्कूल की छत पहले ठीक कर देते। सच में। मैंने देखा है — चिंटू सीढ़ी पर चढ़ रहा था, प्लास्टर गिरा, वो फिसला। अगर जादू होता — तो मैं सोचता — छत पहले। मगर… मगर तुमने वो नहीं किया। तुमने… तुमने माफ़ी करवाई। तुमने भाई जोड़े। तुमने शबनम आपा को रज़िया आपा से मिलाया।"
वो रुका।
मैंने पलटकर उसकी तरफ़ देखा।
"और? तो?"
उसकी आँखें भरी हुई थीं।
"तो क्या… तो क्या वो सब… कम था?"
किसी ने हँसी नहीं उड़ाई।
मैदान में एक भी आदमी नहीं हँसा।
क्योंकि टिंकू तेरह साल का था, और वो सच में पूछ रहा था। और सब जानते थे — उसका पापा छह महीने पहले मर गया था। और वो अब भी कभी-कभी दुकान पर आकर मुझसे कहता था — उस्ताद, कल पापा सपने में आए थे, मुझसे कह रहे थे कि तेरे हाथ की चाय अच्छी बनती है।
मैंने उसका कंधा थामा।
"कम नहीं था, टिंकू। पर तू एक बात समझ ले। इन सबके बीच — किसी के भाई का जुड़ना — स्कूल की छत से कम नहीं है।"
उसने पलक झपकाई।
"पर छत से पानी टपकता है, उस्ताद।"
"हाँ," मैंने कहा। "और जब सारे भाई जुड़ जाएँ, गली एक हो जाए, तो छत भी ठीक होगी। अस्पताल भी। स्कूल भी। अकेले मैं कुछ नहीं कर सकता।"
मैंने उसकी आँखों में देखा।
"अब मुझे ये समझ आया।"
वो मुझसे चिपका रहा।
और मेरे अंदर — कहीं गहरे — एक और आवाज़ थी। मेरी अपनी।
जो कह रही थी — बकवास।
सच ये था कि मेरे अंक कम पड़ रहे थे।
घंटी की हर आवाज़, हर परत, हर जुड़ाई — सब उसके हिसाब में जाता था। कुछ जुड़ता था तो कुछ जाता था। और आज जो जुड़ा — सबसे बड़ा जोड़ — रामा मैडम का मीरा से, हरिप्रसाद का गोपी से, गोविंद का पापा से — उसने बहुत कुछ दिया। पर खर्चा भी बहुत हुआ।
और उसके ऊपर — जो अभी होने वाला था।
सौ अंक। सच्ची ज़ुबान।
उस्ताद ने कहा था — सिर्फ़ तब चलती है जब तू खुद झूठ न बोले।
और सबसे बड़ी बात — जो मैंने अभी याद किया, और जिस पर मुझे पहले से ध्यान देना चाहिए था — जब कभी मैंने इस तंत्र से कुछ खरीदा, तो उसका असर सिर्फ़ सामने वाले पर नहीं पड़ता। मेरे ऊपर भी पड़ता है। अगर मैं एक मिनट के लिए सच्ची ज़ुबान खरीदूँ, तो उस एक मिनट में मैं भी झूठ नहीं बोल सकता।
एक मिनट में कितना झूठ होता है?
पता नहीं। कभी गिना नहीं।
Par ek baat maine andar se maan li thi — ek minute ke andar main jo bhi bolunga, sach hoga. Aur agar sach bolne ki aadat nahi hai, toh ek minute bahut lamba hota hai.
मैंने घंटी जेब में दबाई। मेरी उँगली पर उसकी गरमाहट ठंडी हो चली थी। जैसे उसने मेरी सोच सुन ली हो।
मैंने उस लकड़ी के जूतों वाले बूढ़े की तरफ़ फिर देखा।
उसकी मुस्कान वही थी। पर धागा अब नहीं हिल रहा था। वो स्थिर था। जैसे उसने भी साँस रोक ली हो।
मेरे पीछे माँ की आवाज़ आई।
"बेटा।"
मैं पलटा।
माँ मेरे पीछे खड़ी थीं। काजल के हाथ में उनका हाथ था। माँ के सिर पर वो पुरानी चुनरी — पीली, घिसी — बँधी हुई थी। जो रज़िया आपा ने लाई थी। जो पंद्रह साल से एक संदूक में थी। जिसको माँ ने आज पहना था जैसे किसी के घर जाने के लिए।
"तू क्या करने जा रहा है," उन्होंने पूछा।
सीधा सवाल। माँ का सवाल। कोई घुमाव नहीं।
मैंने कहा नहीं। मैंने सिर्फ़ उनकी आँखों में देखा। और मुझे लगा — वो जानती हैं। वो हमेशा जानती हैं। जब मैं आठ साल का था और छत से गिरा था, तब भी उन्होंने पूछा था — तू क्या करने जा रहा था। जब मैं पंद्रह साल का था और साइकिल पर अकेला कहीं जाने लगा था, तब भी पूछा था। और जब आज सुबह मैं अस्पताल से चुपके से निकला था — तब भी।
मैंने धीरे से कहा —
"माँ। मैं एक मिनट की सच्चाई खरीदने जा रहा हूँ।"
उन्होंने कुछ नहीं कहा।
मैंने आगे कहा —
"सौ अंक लगेंगे। और उस एक मिनट में… मुझे भी झूठ नहीं बोलना होगा। बिल्कुल नहीं। कोई बहाना नहीं। कोई छुपाव नहीं। माँ, अगर उस एक मिनट में मैं किसी को कुछ कहूँ, और वो सच न हो — तो सब बेकार। मेहनत बेकार। घंटी बेकार। जो जोड़ा है वो भी बेकार।"
माँ ने मेरे सिर पर हाथ रखा।
"तो सच बोल दे।"
"पर माँ…"
"बेटा," उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा। "तू मुझे बता — तू सच बोल सकता है या नहीं?"
मैंने उनकी आँखों में देखा।
"मैं… कोशिश करूँगा।"
उन्होंने सिर हिलाया।
"कोशिश काफ़ी है?"
मैं चुप रहा।
फिर मैंने कहा —
"नहीं। पर मेरे पास और कुछ नहीं है।"
माँ ने उस पुरानी चुनरी का एक कोना सीधा किया। जो हवा से हटकर कंधे पर आ गया था। उन्होंने कहा —
"मेरी माँ की चुनरी थी ये। जब मेरी शादी हुई, तब दी थी। उन्होंने कहा था — बेटी, जब तेरा बेटा बड़ा हो और किसी बड़ी बात पर खड़ा हो — तो ये ओढ़ लेना। जैसे मैं साथ खड़ी हूँ।"
मैंने उनका हाथ कसकर पकड़ा।
परदे के पीछे से काजल ने कहा —
"भैया, आज शाम तक सब ठीक हो जाएगा न?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखें भरी हुई थीं। पर वो हँस रही थी।
"देख, ये मेरी बहन," मैंने कहा। "मैं एक मिनट के लिए सच बोलूँगा और तू 'सब ठीक हो जाएगा' पूछ रही है।"
उसने मुँह बनाया।
"हाँ तो। मैं भी उस एक मिनट में सच बोलूँगी।"
"तू अच्छे से बोल।"
"तू भी।"
हम दोनों हँसे। बहुत हल्की हँसी। पर मैदान की सारी सन्नाटा-भरी हवा को तोड़ने के लिए काफ़ी।
पापा मेरे पीछे खड़े थे। वो अब तक कुछ नहीं बोले थे। उनका हाथ मेरे कंधे पर था। पर उन्होंने कुछ नहीं कहा।
मैं उनकी तरफ़ पलटा।
वो मेरी आँखों में देख रहे थे। कुछ पल। बहुत लंबे पल। जैसे किसी किताब का वो पन्ना जिस पर एक लाइन लिखी हो — और उसे पढ़ने से पहले आपको तैयार होना पड़ता है।
फिर उन्होंने कहा —
"जो भी हो। सच के साथ हो।"
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