The Mysterious Bell – Chapter 1449
"हाँ। ये हिस्सा। ये तो पहले से मेरा था। दूसरा हिस्सा — जो आज लकड़ी के जूतों वाले बूढ़े ने उठाया है — वो मेरा था।"
"आपका?"
"बाप का।"
"तो फिर," मैंने कहा — और मैंने अपनी आवाज़ धीमी रखी — "बार-बार क्यों कह रहे हैं कि ये ताला दो भाई साथ बैठेंगे तभी खुलेगा? अगर आपका बाप मर गया, तो आप अकेले क्यों नहीं खोल सकते? आख़िर आप ही तो बेटे हैं?"
रणवीर का हँसता हुआ चेहरा एक पल को जम गया।
"क्योंकि —" उसने कहा। "क्योंकि दो लोग ज़रूरी हैं।"
"कौन दो?"
"मैं। और —"
"आपका भाई?"
वो चुप।
"रणवीर भाई," मैंने कहा। "आपका भाई कौन है?"
मैदान में खामोशी।
अजीब खामोशी। जैसे किसी ने एक बहुत पुराना सवाल पूछ दिया हो — इतना पुराना कि किसी को याद ही नहीं कि जवाब क्या है।
और फिर… मैंने कुछ सुना।
नहीं, सुना नहीं। महसूस किया।
घंटी ने जेब में एक बार हल्की-सी कंपन की।
मैंने उसे निकाला।
बर्फ़ जैसी ठंडी थी।
पर उसमें एक आवाज़ थी — जो मैंने पहले कभी नहीं सुनी थी। एक आवाज़ जो अंदर से आ रही थी, जैसे पीतल के अंदर किसी ने साँस ली हो।
"अभी मत," वो बोली। "अभी सिर्फ़ सुन। सुन। दो। दो आवाज़ें। दोनों साथ हैं।"
मैंने आँखें बंद कीं।
और मैंने सुना।
मैदान में आवाज़ें उठ रही थीं।
"अरे, ये रणवीर भी तो…"
"नहीं, ये लड़का भी…"
"मुझे तो कुछ समझ नहीं आ रहा…"
"अंकुश, अब बता ना! क्या है ये सब?"
"वो लकड़ी के जूते वाला कौन है?"
"वो चीज़ क्या है उसके हाथ में?"
"अंकुश, हमें भी बताओ।"
"अंकुश!"
"अंकुश!"
"अंकुश!"
मेरा नाम। सौ बार। हज़ार बार।
मैंने आँखें खोली।
मैंने मैदान देखा।
दो सौ सोलह दीये। मगर एक भी लौ नहीं हिल रही थी — अब भी।
लोगों के हाथ जुड़ रहे थे। कुछ औरतें रो रही थीं। बबलू की आँखों में आँसू थे — वो पोंछ नहीं रहा था। शालिनी ने अपना बैग उठा लिया था — कहीं जाने के लिए नहीं, बस पकड़ने के लिए। कुछ पकड़ना ज़रूरी था।
टिंकू ने मेरी कमर नहीं छोड़ी थी। उसकी उँगलियाँ मेरी कमर में धँसी हुई थीं।
पापा मेरे पीछे खड़े थे। माँ काजल के साथ।
उस्ताद का हाथ अब भी मेरे कंधे पर था।
और मैदान के पीछे — बहुत दूर — लकड़ी के जूतों वाला बूढ़ा रुका हुआ था।
उसका लाल रेशमी धागा अब हिल रहा था। तेज़ हवा से। जैसे किसी ने उसे हिलाना शुरू किया हो। जैसे किसी ने उसका पता लिया हो। जैसे उसने सुना हो कि बात बढ़ रही है।
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
उसने मेरी तरफ़ देखा।
हम दोनों एक-दूसरे को देख रहे थे।
और उसके होंठों पर — मुझे लगा — एक मुस्कान थी। एक बहुत धीमी, बहुत अजीब मुस्कान। जैसी किसी बूढ़े आदमी के चेहरे पर आती है जब वो अपने बेटे को बड़ा होते देखता है।
और फिर…
…मेरी जेब में घंटी।
गरम।
बहुत गरम।
इतनी गरम कि मैंने एक झटके में उसे निकाल दिया।
वो मेरी हथेली पर आई।
लोगों ने मेरी हथेली की तरफ़ देखा।
और घंटी ने कहा।
सबने सुना।
इस बार सबने सुना।
"सौ।"
आवाज़ — जो पहले धीमी थी, फुसफुसाहट थी — अब साफ़ थी। साफ़ और धीमी। पर सब तक पहुँच रही थी।
"सौ। सच बोलेगा?"
मैंने मैदान देखा।
मैंने रणवीर को देखा।
मैंने उसके हाथ में ताला देखा।
मैंने अपनी हथेली में घंटी देखी।
और मैंने धीरे से, अपने ही मन में कहा —
सौ अंक का सच?
कौन? मैं? रणवीर? कौन?
घंटी ने कोई जवाब नहीं दिया।
बस एक बार गरम हुई — छोटी सी उँगली जलने के जितनी — और चुप हो गई।
मैंने उसे जेब में रखा।
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।
उनकी आँखें मुझ पर थीं।
और उन्होंने बहुत धीमे से कहा, "सौ अंक की शक्ति है — सच्ची ज़ुबान। पर वो सिर्फ़ तब चलती है जब तू खुद झूठ न बोले।"
मैंने सिर हिलाया।
"तो क्या — इसे खरीदूँ?"
उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस मेरा कंधा थोड़ा और कसकर दबाया।
मैंने साँस ली।
मैंने उस लकड़ी के जूते वाले बूढ़े की तरफ़ देखा।
उसने अपनी हथेली उठाई। उसमें कपड़े में लिपटी चीज़ थी — वही चौकोर।
उसने उसे हल्का-सा हिलाया।
और उसकी आवाज़ आई — पहली बार। मैदान में। सबने सुनी।
"सच," उसने कहा। "सच जिसके पास है — उसके पास ही चाबी है।"
रणवीर ने उसकी तरफ़ देखा।
"कौन हो तुम?" उसने पूछा।
बूढ़ा मुस्कुराया।
"मैं वो हूँ," उसने कहा, "जिसे तुम पचास साल से ढूँढ रहे थे और पहचान नहीं पाए।"
उसने अपनी हथेली खोली।
कपड़े में लिपटी चीज़।
और उसके चारों तरफ़…
…लाल रेशमी धागा।
जो हिल रहा था।
अब भी।
मैंने उसकी आँखें देखीं।
और मुझे कुछ ऐसा दिखा जो मुझे बाद में समझ आया — बहुत बाद में। उस बूढ़े की आँखों में मैंने खुद को देखा।
नहीं — मैंने खुद को नहीं देखा।
मैंने उस आदमी को देखा जो मैं होने वाला था। पचास साल बाद। अगर मैं ज़िंदा रहा।
और मुझे ठंड लगी।
पर घंटी गरम थी।
बहुत गरम।
और वो फुसफुसा रही थी।
सिर्फ़ मेरे लिए।
"सौ। सच बोलेगा?"
मैंने आँखें बंद कीं।
और मैंने अपने ही मन में कहा —
हाँ। अगर सच बोलने से इतना डर है…
…तो सच बोलना ही होगा।
॥
कुछ देर तक मैदान में कोई कुछ नहीं बोला।
सिर्फ़ दीये फड़फड़ा रहे थे। दो सौ सोलह दीये। सिर्फ़ लौ हिल रही थी। पीपल के पत्ते स्थिर, जैसे पत्तों ने भी साँस रोक ली हो। हवा जैसे रुक गई हो किसी के कहे हुए शब्द पर।
फिर सबसे पहले फुसफुसाहट उठी।
बहुत धीमी। बहुत दूर से। जैसे किसी के मुँह से निकलकर दूसरे के कान तक पहुँचने से पहले ही मर जाए। पर मरी नहीं। फैली। पत्थर पर पानी की तरह। एक बूँद, फिर दूसरी, फिर पूरा तालाब।
"जादू…"
"ईसा सब जादू है भाई…"
"अगर इतना ही करामात है तो…"
"तो क्या?"
मैंने घंटी को जेब में दबाया। उसकी गरमाहट मेरी उँगली पर रह गई। मैंने हथेली जाँघ से रगड़ी।
मैंने उस लकड़ी के जूतों वाले बूढ़े की तरफ़ देखा।
वो अब भी वहीं खड़ा था। हथेली खुली। कपड़े में लिपटी चौकोर चीज़। लाल रेशमी धागा हवा में। पर अब हवा भी लग रही थी जैसे उसी के इशारे पर चल रही हो। मेरे यहाँ। पीपल के पत्तों पर नहीं। उस पर।
उसकी आँखें मुझ पर थीं। और वो हल्की मुस्कान अब भी उसके होंठों पर थी।
फिर भीड़ में कोई खड़ा हुआ।
मैंने देखा — सानिया के अब्बा।
जो नल के झगड़े में मुझे छूने से मना कर गए थे। जिनका हाथ मैंने पकड़ा था, नसीम भाई के सामने। जिन्होंने कहा था — तेरे आने से हमारी गली टूट रही है।
वो अब मैदान में खड़े थे। कंधे झुके। पर आवाज़ साफ़ थी। सबने सुनी।
"अंकुश," उन्होंने कहा। मेरा नाम उनके मुँह पर अजीब लगा। "मैं कुछ पूछूँ?"
मैंने सिर हिलाया।
"पूछिए, अब्बा जी।"
"अगर तेरे पास ताक़त है — जादू है, करामात है, जो भी है — तो बता।"
मैंने कुछ कहा नहीं।
"अगर तेरे पास ताक़त है," उन्होंने फिर कहा, आवाज़ थोड़ी ऊँची, "तो स्कूल की छत पहले क्यों नहीं ठीक की?"
मैदान में सन्नाटा। फिर एक हल्की सी हाँ जैसी फुसफुसाहट। किसी ने किसी से कहा — सही बात। कोई दूसरा बोला — अस्पताल की छत पर प्लास्टर गिर रहा है, मेरी बहू वहाँ है, वो पहले ठीक होती।
सानिया के अब्बा ने मेरी तरफ़ ही देखते हुए आगे कहा —
"मेरी बेटी रात भर बुख़ार में तड़पी। मैंने तेरी घंटी पर इल्ज़ाम लगाया। मुझे लगा — तेरी वजह से है। मैं ग़लत था, ये मैं अब मानता हूँ। पर मुझे ये भी बता — तेरे पास इतना सब होते हुए, वो छत क्यों नहीं ठीक हुई? वो वार्ड क्यों नहीं खुला? माँ को दवा क्यों नहीं मिली?"
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