The Mysterious Bell – Chapter 1448
उन्होंने मेरे कंधे पर से हाथ नहीं उठाया। उन्होंने थोड़ा और कसकर पकड़ा। और वो बोले, "कुछ न कर। अभी बोलने वाला तू नहीं है। अभी सुनने वाला तू है। सुन। देख उन्हें। जब सब बोल जाएँ, तब बोल।"
मैंने सिर हिलाया।
मैंने तीन साँसें लीं।
और मैंने देखा।
पहले माँ को।
माँ ने काजल का हाथ पकड़ा हुआ था। और माँ ने — मेरी माँ ने — सीना तान लिया था। साड़ी का पल्लू उनके कमर में था। बाल बिखरे हुए थे। और उनकी आँखें — जिनमें सुबह तक बुखार था — अब साफ़ थीं।
उन्होंने मेरी तरफ़ नहीं देखा।
उन्होंने उस औरत को देखा जिसने लाठी टिकाई थी।
"बहन जी," माँ ने कहा। "मेरी बेटी को छोड़ दो। अंदर जाना हो तो गुमटी में चली जाओ, चाय मेरे नाम पर।"
मैदान में कुछ लोग हँसे। हल्की हँसी। पर हँसी।
और मैंने सोचा — यही है मेरी माँ। आधी बात में डाँट, आधी बात में प्यार।
और फिर पापा।
पापा एक कदम आगे बढ़े।
मैंने उन्हें रोक दिया।
"पापा —"
"रुक।"
वो रुके।
पर उनकी आँखें उस औरत पर थीं। लाठी वाली बूढ़ी पर।
"मैं तुम्हें जानता हूँ, कमला," पापा ने कहा। इतनी धीमी आवाज़ में कि सिर्फ़ चार-पाँच लोगों ने सुना। "तेरी बेटी का नाम रुक़ैया है। उसकी शादी में मैं साइकिल किराए पर नहीं लेने दिया मैंने — मुफ़्त दी थी। दो दिन। याद है?"
कमला ने नज़रें चुरा लीं।
"याद है," उसने कहा।
"तो फिर आज —"
"आज तुम्हारा बेटा… ये सब…"
"मेरा बेटा," पापा ने लकड़ी की आवाज़ में कहा — मैंने उन्हें ऐसी आवाज़ में पहले कभी नहीं बोलते सुना — "मेरा बेटा आज सुबह उठकर नहीं आया, कमला। वो बाईस साल से उठकर आ रहा है। तूने उसे बड़ा होते देखा है। मैंने नहीं। मैं तो उससे छिपकर बैठा रहा। तूने उसे साइकिल ठीक करते देखा है। मैंने नहीं। जब तेरा पानी का नल टूटा था, तब कौन आया था?"
कमला कुछ नहीं बोली।
"तो मेरे बेटे पर कुछ बोलने से पहले — ये सोच ले कि तेरी बेटी के घर से तेरा बेटा कौन था।"
मैदान में खामोशी।
पर खामोशी सिर्फ़ उसी कोने में। मैदान के दूसरी तरफ़ दो और लोग बोल रहे थे।
"पर वो ताला — जादू — ये सब…"
"मैंने कहा था ना," किसी औरत ने कहा, "ये सब ठीक नहीं है।"
"रुको," उस्ताद ने कहा। उनकी आवाज़ भी अब भारी थी।
पर वो सिर्फ़ एक आवाज़ थे। भीड़ दस आवाज़ें थी।
तभी…
…रणवीर हँसा।
बहुत धीमी हँसी। किसी मरीज़ की हँसी। ऐसी हँसी जो नहीं होती, पर होती है।
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
उसने ताला अब भी हवा में उठाया हुआ था। पर अब वो हँस रहा था।
और हँसते हुए उसने कहा, "देखा? देखा तुम सबने? बस पाँच मिनट का खेल था। और पूरी गली… पूरी गली क्या, हाँ, पूरी गली — आपस में उलझ गई।"
उसने ताला धीरे से नीचे किया। अपनी छाती के सामने।
"अंकुश बाबू," उसने कहा। "आपकी घंटी कुछ नहीं करती। आप जानते हैं? आप सिर्फ़ शोर करते हैं। मैं आपको बता दूँ — असली चीज़ मैंने आपको दिखा दी।"
उसने ताला उठाया।
"ये।"
उसने ताले को हल्का-सा हिलाया।
"ये ताला। जिसे लोग कहते हैं मंसूर का ताला। ये ज़मीन का ताला नहीं है। ये याद का ताला है।"
मैदान में खामोशी आ गई।
"याद का?" किसीने पूछा।
"हाँ," रणवीर ने कहा। "मंसूर ने इसे बनाया था — एक याद के लिए। मेरी याद। मेरे बाप की याद। मेरी माँ की याद। वो याद जो मेरे साथ बंद है और किसी और के पास नहीं।"
वो मेरी तरफ़ मुड़ा।
"तुम कहते हो, दो भाई साथ बैठेंगे, तो ताला खुलेगा — है ना, उस्ताद? आपने यही कहा था।"
उस्ताद ने सिर हिलाया।
"तो देखो," रणवीर ने कहा। "मैं और मेरा हिस्सा। मेरा हिस्सा — याद। मेरी याद। जो मेरे अंदर है। जो मैंने सालों तक संभाली है। जो कोई नहीं छीन सकता।"
उसने अपनी छाती पर हाथ रखा।
"ये ताला सिर्फ़ मेरे खून से खुलेगा। मेरी याद से। मेरी माँ से।"
उसने आँखें बंद कर लीं।
"मेरी माँ," उसने धीरे से कहा।
और मैंने देखा — वो सच बोल रहा था।
नहीं, ये ग़लत है। वो सच बोलता था, पर वो सच उसका अपना नहीं था। वो सच — वो सच किसी और का था, जिसे उसने अपना बना लिया था। वो सच किसी पुरानी तस्वीर में रोता हुआ बैठा था, किसी पुरानी रात में, और रणवीर उसे अपनी छाती में छिपाकर दिखा रहा था, जैसे कोई बच्चा अपनी माँ की फटी साड़ी को नए कुर्ते के नीचे छिपाता है।
उसने आँखें खोलीं।
"तुम," उसने कहा। "तुम्हारे पास क्या है? तुम्हारे पास याद है? तुम्हारे पास खून है? तुम तो गली का एक लड़का हो — जिसके बाप ने डर के मारे अंगूठा लगाया था। तुम्हारे पास कुछ नहीं है।"
वो मुस्कुराया।
"बस एक घंटी है। और वो भी उधार की।"
मेरा हाथ उठा।
नहीं, जानबूझकर नहीं उठा। अपने आप उठा। मेरा हाथ मेरी जेब पर गया। मैंने घंटी महसूस की। वो गरम थी। नहीं — वो और गरम हो रही थी। धीरे-धीरे। जैसे अंदर कोई… कोई…
अंदर कुछ हलचल मची हुई थी।
मैंने घंटी जेब से निकाली।
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा।
"अंकुश —"
पर मैंने घंटी हथेली पर रख ली।
वो गरम थी।
बहुत गरम।
और उसने — घंटी ने — कुछ कहा।
बहुत धीमी आवाज़ में।
इतनी धीमी कि मुझे भी नहीं पता चला कि मैंने सुना या सोचा।
"सौ। सच बोलेगा?"
मेरा हाथ थम गया।
सौ?
क्या सौ?
अंक?
मेरे पास अठारह बचे थे — अब शायद कम। नए जोड़ों के अंक अभी जुड़े नहीं थे, या जुड़े थे? पलक झपकते ही मैंने सोचा — कितने जोड़ हुए थे? गोविंद भाई का, हरिप्रसाद का, गोपी का, बबलू का, सुनीता का, रामलाल का, रेहाना का, रमा मैदम का… सब।
सौ?
सौ अंक?
सौ अंक का क्या — सच बोलेगा?
मैंने घंटी को हिलाया।
कुछ नहीं।
"सौ," मैंने धीरे से कहा। "सौ क्या?"
घंटी गरम रही।
फिर ठंडी होने लगी।
फिर गरम।
फिर ठंडी।
जैसे कोई साँस ले रहा हो। अंदर। बाहर। अंदर। बाहर।
और फिर उसने कहा, "नहीं। अभी नहीं। जब सब बैठेंगे।"
नहीं, ये घंटी ने नहीं कहा।
ये मैंने कहा था। मेरे होंठ हिल रहे थे।
मैंने घंटी को जेब में रखा।
मैंने रणवीर की तरफ़ देखा।
वो अब भी हँस रहा था — पर हँसी अब अलग थी। ऊपर से हँसी। जैसे कोई ऊपर से चिल्लाता हो, "देखो! ये डर गया!"
उसने हाथ फैलाए और मैदान की तरफ़ मुड़ा।
"मैं पूछता हूँ," उसने कहा। "अगर ये लड़का सच्चा है — तो इसे मेरी याद का हिस्सा क्यों नहीं पता? इसे मेरी माँ का नाम क्यों नहीं पता? मैंने दस मिनट में इसे एक सवाल से हरा दिया और आप सब देख रहे हैं, ये बोल नहीं रहा।"
मैदान में कुछ लोगों ने "हाँ" में सिर हिलाया।
मैंने साँस ली।
उस्ताद का हाथ अब भी मेरे कंधे पर था। उन्होंने मुझे नहीं छोड़ा।
और मैं बोला।
"रणवीर भाई," मैंने कहा।
आवाज़ धीमी। पर साफ़।
"आपने कहा — ये ताला याद का है। ठीक है। मैं मान गया।"
कुछ लोग हक्के-बक्के रह गए।
"अंकुश —" उस्ताद ने धीरे से कहा।
पर मैंने उन्हें रोका।
"पर एक बात पूछूँ?"
रणवीर ने भौंह चढ़ाई।
"ये ताला — ये याद का ताला — बाईस साल पहले किसने बंद किया था?"
रणवीर ने जवाब दिया, "मेरे बाप ने।"
"और उन्होंने इसे किस याद के लिए बंद किया?"
वो चुप रहा।
"बोलिए," मैंने कहा। "किस याद के लिए?"
"मेरी तलाश के लिए," रणवीर ने कहा। "ये ताला मेरी तलाश है। मैं आज तक नहीं पाया। पाँच साल पहले मैं यहाँ आया था — इसी गली में — इसी पीपल के नीचे — तो मुझे पता चला कि ताला यहाँ है।"
"पर ताला तो आपके पास है," मैंने कहा। "आपके हाथ में।"
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