The Mysterious Bell – Chapter 1447
मैंने अपनी आँखें मलीं। एक बार नहीं, दो बार।
मैदान में दो सौ सोलह दीये जल रहे थे।
और मैं क़सम खाकर कहता हूँ — एक भी लौ नहीं हिल रही थी।
धुआँ नहीं उठ रहा था। बत्ती नहीं काँप रही थी। जैसे किसी ने पूरे मैदान को तस्वीर बना दिया हो और तस्वीर के अंदर वक़्त भूल गया हो।
मैंने पहले कभी ऐसा नहीं देखा था।
पीपल के पत्ते भी नहीं हिल रहे थे। और पीपल के पत्ते — तुम नहीं जानते — हमारी गली में हमेशा हिलते हैं। हमेशा। बारिश में, धूप में, बिना हवा के भी। पीपल का पेड़ बूढ़ा है, पर उसकी आदत जवान है। वो चुप नहीं रह सकता।
आज चुप था।
मैंने रणवीर की तरफ़ देखा।
उसने ताला हवा में उठाया हुआ था। दोनों हाथों से। उसकी उँगलियाँ ताले को ऐसे पकड़े हुई थीं जैसे कोई बच्चा अपनी माँ की चूड़ी पकड़ता है — नहीं, ग़लत बोला। जैसे कोई डूबता आदमी तिनके को पकड़ता है।
नहीं, वो भी ग़लत है।
जैसे कोई आदमी अपनी ही क़ब्र का पत्थर उठाकर दिखा रहा हो और पूछ रहा हो — "देखो, ये मेरा है ना?"
मैंने उसके हाथ देखे।
काँप रहे थे।
रणवीर भारद्वाज के हाथ काँप रहे थे।
वो आदमी जिसने अस्पताल की ज़मीन हड़पने के लिए पूरे मोहल्ले को आपस में लड़ाया था। वो आदमी जिसकी मुस्कान टीवी पर आती थी और उसके पीछे काग़ज़ों में लोगों के घर बिकते थे। वो आदमी जिसने पापा को रुलाया था और माँ को चुप करवाया था।
उसके हाथ काँप रहे थे।
और मैंने सोचा — यही वो पल है, अंकुश। यही वो पल है जिसका इंतज़ार तू कर रहा था। बोल अब। बोल दे कुछ ऐसा कि सब खत्म हो जाए।
पर मैं बोल नहीं पाया।
क्योंकि तभी हवा में कुछ आया।
तुम सोच रहे होगे कि हवा में क्या आ सकता है? धूल? खुशबू? कोई पत्ता?
नहीं, भाई।
ये वो चीज़ थी जो हवा के साथ आती है पर हवा नहीं होती। ये वो सुई थी जो कान के अंदर जाती है, रीढ़ तक, और फिर दिल के पास रुक जाती है।
ठंडी सुई।
फुसफुसाहट।
मैंने घंटी जेब में महसूस की। वो बर्फ़ जैसी ठंडी थी।
और मैंने सुना।
किसी ने कहा — धीरे से, बहुत धीरे से, जैसे किसी ने मेरे कान के बिल्कुल पीछे मुँह रखकर कहा हो:
"ये भी तो जादू ही है।"
मैंने पलटकर देखा।
पीछे एक आदमी खड़ा था — चालीस के आसपास, हरी शर्ट, हाथ में मोबाइल। वो मुझे देख नहीं रहा था। वो मेज़ की तरफ़ देख रहा था। जहाँ काग़ज़ों का ढेर था। जहाँ शंकरलाल यादव का नाम लिखा था।
उसने फिर कहा — धीरे से, अपने बगल वाले से:
"जिस लड़के के पास घंटी है, वो भी तो कुछ ना कुछ कर रहा है। सब ठीक हो रहा है, धड़ाधड़। सालों के झगड़े, एक शाम में। कुछ तो गड़बड़ है।"
और तभी…
दूसरी आवाज़।
"अस्पताल की ज़मीन पर तो सबका हक़ है ना? गली के सब लोगों का। तो फिर एक आदमी क्यों सारे काग़ज़ अपने पास रखे है?"
तीसरी।
"और ये जो लड़का है — अंकुश — इसका पापा ने तो अंगूठा लगाया था ना? डर के मारे? तो फिर बेटा क्यों सीधा-सीधा बोल रहा है? कुछ छिपा रहा है।"
चौथी।
"मैंने सुना है, इसकी घंटी रात में अपने आप बजती है। ऐसी चीज़ें अच्छी नहीं होतीं। मेरी बच्ची रात भर रोती है।"
और फिर…
पाँचवीं।
"और वो लकड़ी के जूते वाला बूढ़ा? उसने ये कब से हाथ में चीज़ पकड़ी है? क्या पता उसने भी कुछ किया हो।"
छठी।
"मुझे तो लगता है, ये सब नाटक है। सब मिले हुए हैं।"
सातवीं।
"सब मिले हुए हैं।"
आठवीं।
"सब मिले हुए हैं।"
नहीं।
रुको।
रुको, अंकुश।
ये आवाज़ें…
ये आवाज़ें मैदान से नहीं आ रही थीं।
ये मेरे अंदर से आ रही थीं।
मैं जानता हूँ। मैं पहचानता हूँ। मैंने सुना है। रात को, जब मैं अकेला होता हूँ, तब ये आवाज़ें आती हैं। धीरे-धीरे। एक-एक करके। जैसे कोई मेरे ही दिमाग़ की किताब के पन्ने पलट रहा हो और हर पन्ने पर मेरी सबसे बड़ी कमज़ोरी लिखी हो।
आज वो किताब पूरे मैदान में खुल गई थी।
मैंने चारों तरफ़ देखा।
लोगों के चेहरे बदल रहे थे।
कुछ लोगों ने अपने हाथ जोड़ लिए थे। कुछ औरतें धीरे-धीरे पीछे हट रही थीं — एक कदम, फिर दूसरा, फिर तीसरा — जैसे मैदान में कोई लकीर खींच दी गई हो और उस लकीर के आगे ज़मीन गरम हो।
शबनम आपा ने अपनी थाली पकड़ी — उसकी उँगलियाँ सफ़ेद हो गई थीं।
रज़िया ने शबनम का हाथ पकड़ा — पर वो भी पीछे हट रही थी।
मीरा ने अपना कैमरा उठाया — पर उसका हाथ काँप रहा था।
दुबे अंकल की लाठी — जो अभी तक सीधी टिकी थी — मिट्टी में धँसने लगी।
और सबसे ग़ज़ब की बात?
सबकी आँखें — सबकी आँखें मुझ पर थीं।
कल तक ये लोग मुझे "अंकुश बेटा" बुलाते थे। मुझे चाय पर बुलाते थे। अपनी साइकिलें लाते थे। अपने झगड़े लाते थे। और आज…
आज वो मुझे एक अजनबी की तरह देख रहे थे।
मुझे क्या हुआ था?
मैंने कोई जादू थोड़े ना किया था। मैंने किसी का हाथ नहीं पकड़ा था। मैंने किसी के काग़ज़ नहीं छीने। मैंने सिर्फ़ घंटी जेब में रखी थी। और घंटी ने — घंटी ने…
…और फिर वो हुआ जो मैंने सोचा भी नहीं था।
एक औरत आगे आई — साठ के पास, सफ़ेद बाल, हाथ में लाठी। मैंने उसे पहले देखा नहीं था। वो मेरे तीन कदम की दूरी पर रुकी और सीधे मेरी आँखों में देखकर बोली।
आवाज़ ऊँची नहीं थी। पर साफ़ थी।
"बेटा, तुझे पता है, मेरी बेटी क्यों नहीं आई आज?"
मैंने सिर हिलाया — नहीं।
"वो आती," औरत ने कहा। "वो आती। पर मैंने मना कर दिया। क्यों? क्योंकि मुझे डर है। तू अच्छा लड़का है। मैं जानती हूँ। तेरी माँ को जानती हूँ। उसके टिफ़िन भी खाए हैं मैंने। सालों से खाए हैं।"
उसने लाठी को ज़मीन पर टिकाया।
"पर तू बता — ये सब जो हो रहा है? ये ठीक है? कोई लड़का दो आदमियों के बीच ऐसे ही पैदा हो जाता है? आठ लोग एक-एक करके उठते हैं? उनके सीने फटते हैं जैसे हम कभी… हम कभी…"
वो रुकी।
और उसने वो कहा जो मुझे सबसे ज़्यादा चुभा।
"हम कभी किसी के सामने नहीं खोले, बेटा। हम गली के लोग अपनी पोटली नहीं खोलते। चुपचाप ढोते हैं। सालों तक ढोते हैं। और तू…"
उसने लाठी उठाई।
"…तू एक शाम में सब खोल रहा है।"
मेरी ज़मीन खिसक गई।
यही बोलते हैं ना? पैरों तले ज़मीन खिसकना?
मैंने सोचा था कि ये मुहावरा है। बस किताबों की बात है।
नहीं। ये सच है।
मैंने अपने पैर महसूस किए — मिट्टी पर, ठोस। पर मुझे लगा जैसे मैं अब भी हिल रहा हूँ। धीरे-धीरे। पीछे की तरफ़। जैसे किसी ने मेरी एड़ियों के नीचे से ज़मीन खींच ली हो।
और तभी…
…एक हाथ मेरे कंधे पर आया।
भारी हाथ। गरम हाथ। ऐसा हाथ जिसके नीचे आने के बाद तुम और नहीं डरते।
उस्ताद अली बक्श।
मैंने पलटकर देखा।
उनका चेहरा शांत था। बिल्कुल शांत। जैसे उन्होंने किताबों में पढ़ा हो, "भीड़ के बीच शांत रहना सीखो"। पर उनकी आँखें… उनकी आँखें बोल रही थीं।
वो मेरे कान के पास झुके।
"ताले को मत देख," उन्होंने कहा। "लोगों की आँखें देख। ताला तेरे हाथ में है। लोगों की आँखें किसी और के हाथ में हैं।"
"उस्ताद, वो मुझ पर शक कर रहे हैं।"
"नहीं," उन्होंने कहा। "वो अपनी ज़िंदगी पर शक कर रहे हैं। उन्होंने सालों तक झूठ में चैन से सोया था, अब सच उन्हें जगा रहा है। जगने में डर लगता है। तूने जगाया है — अब तू ही डर है।"
मैंने उनकी आँखें देखीं।
"तो क्या करूँ?"
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