The Mysterious Bell – Chapter 1446
"ये ताला," पापा ने कहा। "ये याद। इसे तोड़ना है तो पहले मुझे तोड़।"
रणवीर ने उन्हें देखा।
"शंकर भाई," उसने कहा। "आप ज़्यादा न बोलिए। आपने पहले ही आज बहुत बोल दिया।"
"आज मैं जितना बोलूँगा, उतना कम है," पापा ने कहा।
उन्होंने अपना हाथ आगे बढ़ाया।
"मुझे दे," उन्होंने कहा।
"क्या?"
"ताला।"
रणवीर हँसा।
"क्यों? आप खोलेंगे?"
"नहीं," पापा ने कहा। "पर जब तुम इसे तोड़ोगे, तो वो हाथ मेरा होगा। क्योंकि ये याद मेरे बेटे की अकेली नहीं है। ये हम दोनों की है। मेरी और उसकी माँ की। और उसकी भी — जिसने इसे बंद किया था।"
पापा की आवाज़ रुकी।
"मैंने इसे बंद किया था," उन्होंने कहा। "मैंने इसे बंद करते वक़्त सोचा था कि मैं अपने बेटे को बचा रहा हूँ। आज मुझे पता चला कि मैं उसे बचा नहीं रहा था। मैं उससे दूर जा रहा था।"
मेरे हाथ से पापा की कॉपी फिसल गई।
मुझे पता तक नहीं चला कि कब। बस एक आवाज़ आई — किसी पुराने काग़ज़ों के बंडल के ज़मीन पर गिरने जैसी — और वो कॉपी मेरे हाथ से निकलकर मिट्टी पर खुल गई।
और मेरे पैर…
मेरे पैर जैसे ज़मीन में गड़ गए।
मैं हिला भी नहीं।
मैं एक कदम पीछे भी नहीं जा सका।
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। काजल ने मेरा हाथ पकड़ा — उसका हाथ ठंडा था। मुझे लगा मैं उसका हाथ पकड़ रहा हूँ या वो मेरा, समझ नहीं आया।
"शंकर भाई," रणवीर ने कहा, और उसकी आवाज़ में पहली बार ज़रा-सी थकान आई, "आप मेरे साथ खड़े होकर इस ताले को तोड़ दीजिए। बस इतना कर दीजिए। फिर मैं आपका पूरा हिसाब माफ़ कर दूँगा। आपकी दुकान का काग़ज़ साफ़ कर दूँगा। आपके घर का… आपकी बीवी का इलाज…"
पापा ने उसकी बात बीच में काटी।
"रणवीर," उन्होंने कहा। "तू मेरा हिसाब माफ़ करेगा?"
वो रुके।
"मेरा हिसाब तू नहीं माफ़ करेगा। मेरा हिसाब मैं खुद चुकाऊँगा। इसी मैदान में। आज। अभी।"
और फिर ऐसा हुआ जो मैंने सपने में भी नहीं सोचा था।
रणवीर ने ताला ज़मीन की तरफ़ झुकाकर अपने हाथ में लिया — जैसे किसी बच्चे की गेंद उठाई हो — और अपने हाथ से आगे बढ़ा दिया। जैसे कोई मज़ाक में कहे — ले, छू ले।
पर मज़ाक नहीं था।
वो जानता था कि अगर पापा ने उसे छुआ, तो कुछ होगा। वो उसे चुनौती दे रहा था। आगे बढ़ाकर। सबके सामने।
पापा ने हाथ बढ़ाया।
और ताला पापा के हाथ में आ गया।
और उसी पल…
ताले से एक हल्की नीली चमक निकली।
बहुत हल्की। इतनी हल्की कि लगा जैसे सिर्फ़ मैंने देखी। या मैंने देखने की कोशिश की। पर फिर मैंने माँ की तरफ़ देखा और माँ की आँखें उसी ताले पर टिकी थीं। मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा और उस्ताद का मुँह खुला रह गया।
"शंकर," उस्ताद ने धीरे से कहा।
पापा ने उनकी तरफ़ नहीं देखा।
पापा ताले को हाथ में लिए खड़े थे।
और उनके हाथ में वो ताला… वो हिल नहीं रहा था। वो जैसे उनके हाथ में जगह ढूँढ रहा था। वो जैसे पापा की हथेली की शक्ल पहचान रहा था। और पापा की हथेली भी — मैंने उनका हाथ देखा — उनकी उँगलियाँ ताले के चारों तरफ़ उस तरह बैठ गईं, जैसे वो इसी ताले को उठाने के लिए बनी हों।
मैंने अपना हाथ जेब में डाला।
घंटी।
अब भी ठंडी।
पर ज़रा कम ठंडी।
"देखो," रणवीर ने कहा, और उसकी आवाज़ में ज़रा-सा हड़बड़ापन आ गया था, "देखो — मैंने तो दिया था। आपने उसे लिया। आपके हाथ में अब मेरा ताला है। सब गवाह हैं।"
"तुम्हारा ताला नहीं है," पापा ने कहा।
"क्या?"
"ये ताला मंसूर चाचा ने बनाया था," पापा ने कहा। "और ये मंसूर के उन दोनों तालों में से एक है जो उसने दो भाइयों के लिए बनाए थे। मैं ताला लेने यहाँ नहीं आया हूँ, रणवीर। मैं अपनी आधी चीज़ लेने आया हूँ।"
और तभी…
बक्से से आवाज़ आई।
वो लोहे का बड़ा बक्सा — जो पहले मैदान के कोने में धड़ाम से गिरा था और फिर चटका था — उसमें से कुछ और टूटा और फिर… फिर एक आवाज़।
ठंडी सुई जैसी आवाज़।
इतनी पतली कि मुझे लगा मेरे ही कान में कोई कील घुस रही है। मैंने कान पकड़ लिया।
माँ ने एक हाथ माँग पर रखा।
काजल ने कहा — "भैया।"
और वो आवाज़ उठी।
पूरे मैदान की तरफ़।
हर आदमी की तरफ़।
किसी के कानों में चुभती हुई।
किसी की रीढ़ से नीचे उतरती हुई।
और वो एक ही बात दोहरा रही थी।
"ये ताला… अब एक का नहीं…"
मैदान में लोगों ने अपने कान पकड़ लिए।
"ये ताला… अब एक का नहीं…"
कुछ लोग झुक गए। कुछ औरतें चीखीं — बच्चों की माँएँ अपने बच्चों को सीने से लगाने लगीं। टिंकू ने मेरी कमर पकड़ी और उसे एक पल के लिए छोड़ना भूल गया।
"…दो का है।"
और फिर वो रुक गई।
एक पल के लिए पूरा मैदान बहरा हो गया।
मैंने अपने कान छोड़े।
मैंने रणवीर की तरफ़ देखा।
और मैंने वो देखा जो मैंने इतने बरसों में कभी नहीं देखा था।
रणवीर भारद्वाज की मुस्कान…
…पूरी तरह गिर गई थी।
सिर्फ़ होंठ नहीं। पूरा चेहरा। जैसे किसी ने उसके चेहरे से मास्क उतार दिया हो। उसकी आँखें मेरे हाथ में नहीं थीं, पापा के हाथ में थीं। उसकी आँखें उस ताले पर थीं जो अब पापा की हथेली में जगह बना चुका था।
वो एक कदम पीछे हुआ।
पत्थर उसके हाथ से कब गिरा, उसे भी पता नहीं चला। वो पत्थर मिट्टी पर गिरा और वहीं दबकर रह गया।
"नहीं," रणवीर ने कहा।
बहुत धीमी आवाज़ में।
और मैंने पहली बार उसकी आवाज़ में कुछ ऐसा सुना जो मैं सालों से सुनना चाहता था — डर। वो डर नहीं जो कोई दिखाता है। वो डर जो अंदर से आता है। वो डर जो आदमी को रात में उठाकर बैठा देता है।
"नहीं," उसने फिर कहा। "ऐसा नहीं होता। ऐसा नहीं — मंसूर ने कहा था — ये ताले सिर्फ़ तभी खुलते हैं जब दोनों भाई साथ बैठें। दोनों भाई। मैं और कौन? मैं और कौन?"
वो उस्ताद की तरफ़ मुड़ा।
"उस्ताद, मैं और कौन? मैं अकेला हूँ!"
उस्ताद ने उसे देखा।
और उस्ताद ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा, "बेटा, ये ताला तुझे और तेरे हिस्से को जोड़ता है। और तेरा हिस्सा…"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"…शायद यहाँ है।"
रणवीर ने मेरी तरफ़ देखा।
फिर पापा की तरफ़।
फिर मैदान में खड़े लोगों की तरफ़।
और उसके होंठ हिले। बहुत धीमे। मैंने उसके होंठ नहीं सुने। पर मैं जानता हूँ कि उसने क्या कहा। मैंने उसे पहले भी कहते देखा था।
"अभी नहीं।"
मैंने एक कदम आगे बढ़ाया।
इस बार मेरे पैर हिले। ज़मीन ने मुझे छोड़ दिया।
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
पापा ने मुझे देखा।
और उन्होंने मेरी तरफ़ ताला बढ़ाया।
"ले," उन्होंने कहा। "दोनों हाथ लगा।"
मैंने हाथ बढ़ाया।
मेरी उँगलियाँ ताले पर रखीं।
और ताला मेरे हाथ में भी गरम हुआ।
धीरे। बहुत धीरे। जैसे किसी सोए हुए बच्चे ने मेरी उँगली पकड़ ली हो।
और मेरी जेब में…
घंटी…
एक बार फिर ज़िंदा हुई।
ठंडी नहीं। गरम।
और उसने बहुत धीमी आवाज़ में, सिर्फ़ उतनी आवाज़ में जितनी सिर्फ़ मैं सुन सकता था, एक शब्द कहा।
"मिला।"
मैंने आँखें बंद कर लीं।
और जब मैंने खोलीं…
तो मैदान के पीछे खड़ा लकड़ी के जूतों वाला बूढ़ा अपनी हथेली में लिपटी चीज़ को उठाए खड़ा था।
और उसके हाथ की चीज़ में बँधा लाल रेशमी धागा…
…धीरे-धीरे हिल रहा था।
हवा के बिना।
जैसे कोई उस धागे को अंदर से खींच रहा हो।
जैसे किसी ने कहा हो — अब बारी मेरी है।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno