The Mysterious Bell – Chapter 1445
और रणवीर भारद्वाज…
वो मुस्कुरा रहा था।
पर ये वो मुस्कान नहीं थी जो टीवी पर होती थी। ये वो मुस्कान थी जो आदमी के चेहरे पर तब आती है जब वो जानता है कि उसके पास आख़िरी पत्ता बचा है।
उसने मेज़ से ताला उठाया।
उसके हाथ में ताला छोटा लग रहा था। बहुत छोटा। पर उसका वज़न महसूस हो रहा था, क्योंकि रणवीर का कलाई ज़रा झुक गई थी।
"तो ये है वो," उसने कहा। "ये है वो ताला।"
उसने ताले को हिलाया।
अंदर से कुछ खड़खड़ाया।
और पूरे मैदान में आधे लोगों ने एक साथ साँस रोक ली।
"जानते हो," रणवीर ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो मिठास आ गई जो किसी को बेचने से पहले आती है, "इस ताले के बारे में मुझे बहुत कुछ पता है। पता है कि इसमें क्या बंद है। किसकी याद बंद है। और कब बंद हुई।"
उसने ताले को हवा में उठाया।
"चार साल पहले," उसने कहा। "सुशीला जी, आपको याद है? वो साल? जब आपको अस्पताल ले जाना पड़ा था। जब आपके घर में इलाज के पैसे नहीं थे। जब आपका बेटा ये गली छोड़कर कहीं और काम ढूँढने की सोच रहा था।"
वो मेरी तरफ़ मुड़ा।
"तुम्हें याद है, अंकुश? उस दिन तुमने मेरा दफ़्तार छोड़ते वक़्त क्या कहा था?"
मैंने कुछ नहीं कहा।
"मैं बता दूँ?" उसने कहा। "तुमने कहा था — साहब, मैं पैसे लौटा दूँगा। मैंने कहा था — बेटा, लौटाने की ज़रूरत नहीं। इलाज कराओ, माँ ठीक हो जाए, बाकी बाद में।"
वो रुका।
"और आज तुम मेरे ख़िलाफ़ खड़े हो?"
मैदान में कुछ लोगों ने मुझे देखा।
बहुत लोगों ने मुझे देखा।
और मुझे लगा कि मेरे पैरों के नीचे की ज़मीन ज़रा ढीली हो गई।
"तो सुनो," रणवीर ने कहा। "उस पैसे की वजह से माँ का इलाज हुआ। उस पैसे की वजह से वो आज ज़िंदा हैं। उस पैसे की वजह से…"
उसने ताले को अपनी आँखों के सामने उठाया।
"…ये याद उस घर में आई। यानी इस याद में मेरा हिसाब है। और क़ानून में जिसका हिसाब हो, उसकी चीज़ भी उसी की होती है।"
उस्ताद ने कहा, "क़ानून में याद नहीं होती, बेटा।"
रणवीर ने उनकी तरफ़ देखा।
"उस्ताद जी," उसने कहा। "आप इस वक़्त चुप रहिए। आपकी उम्र इससे ज़्यादा लड़कर नहीं कटी होगी।"
और फिर रणवीर ने ज़मीन से एक पत्थर उठाया।
पीपल के नीचे रखी पुरानी ईंट। मैदान की उस मेज़ के पैर के नीचे रखी — जो किसी ने रात में पक्का करने के लिए लगाई थी। वो ईंट चटककर दो हिस्सों में बंट गई और उसका एक हिस्सा रणवीर के हाथ में आ गया।
"ये नहीं मानते?" उसने कहा। "तो ठीक है। मैं इसे खोलूँगा नहीं।"
उसने ताला मेज़ पर रखा।
"मैं इसे तोड़ूँगा।"
मैदान में एक औरत ने धीरे से कहा, "माँ।"
मैंने पीछे मुड़कर देखा।
माँ उठ रही थीं।
चारपाई से।
काजल उनका हाथ पकड़कर उन्हें सहारा दे रही थी, पर माँ ने अपना सहारा अपने हाथ से ठेल दिया और खुद खड़ी हो गईं। उनके पैर काँप रहे थे। अस्पताल की सफेद कमज़ोर आँखों में आज कुछ और था। मैंने उन्हें ऐसा पहले कभी नहीं देखा था।
वो आगे आईं।
धीरे-धीरे। एक कदम। दो कदम।
मैदान के बीच में आईं। मेरे पास आईं। मेरे कंधे पर हाथ रखा — नहीं, मुझे पीछे किया। मुझे।
"माँ," मैंने कहा।
"चुप," माँ ने कहा।
और वो रणवीर के सामने खड़ी हो गईं।
उनकी आवाज़ धीमी थी। पर साफ़ थी। इतनी साफ़ कि मैदान के आख़िरी कोने तक गई होगी, माइक के बिना भी।
"मेरे इलाज के पैसे," माँ ने कहा। "मैं चुकाऊँगी।"
रणवीर ने कुछ कहने के लिए मुँह खोला, पर माँ ने उसे रुकने नहीं दिया।
"हर पैसा," उन्होंने कहा। "ब्याज समेत। मैं सारी उम्र टिफ़िन बेचूँगी। मैं सुबह चार बजे उठूँगी। मैं सत्तर बर्तन माँजूँगी। मैं किसी के घर झाड़ू लगाऊँगी। पर…"
उन्होंने आगे एक कदम रखा।
"…मेरा ईमान नहीं बेचूँगी।"
मैदान में सन्नाटा था।
"तुमने मेरे इलाज के पैसे दिए," माँ ने कहा। "बहुत अच्छा किया। भगवान तुम्हें इसका हिसाब देगा। पर तुम उस पैसे के बदले मेरे बेटे का हाथ नहीं खरीद सकते। तुम उस पैसे के बदले उस याद को नहीं खरीद सकते जो मेरे घर की है। और सबसे बड़ी बात…"
उनकी आवाज़ एक पल के लिए रुकी।
"…उस पैसे से तुमने इलाज कराया था, या मेरे बेटे से अंगूठा लिया था — ये फ़र्क़ तुम जानते हो। मैं जानती हूँ। और ये पूरा मैदान जानता है।"
रणवीर का चेहरा एक पल के लिए बदला।
फिर वो हँसा।
"सुशीला जी," उसने कहा, "आप भूल रही हैं कि आपके पति ने किसके काग़ज़ों पर अंगूठा लगाया था।"
"मैं कुछ नहीं भूल रही," माँ ने कहा। "मैंने बाईस साल से एक भी चीज़ नहीं भूली। मैंने बाईस साल इस घर में चुपचाप सब देखा और सब सहा। आज मैं बोल रही हूँ, तो पूरा बोलूँगी।"
उन्होंने काजल का हाथ कसकर पकड़ा।
"तुम उस ताले को तोड़ना चाहते हो," माँ ने कहा। "तोड़ो। पर जान लो — उसमें जो बंद है, वो मेरे बेटे की अकेली की चीज़ नहीं है। वो मेरे घर की है। और तुम जिस चीज़ के ऊपर पत्थर उठा रहे हो…"
उन्होंने रणवीर की आँखों में देखा।
"…उसके नीचे मेरा सिर है।"
मैदान में एक औरत फूट-फूटकर रोने लगी।
मैंने देखा — शबनम आपा थीं। वो अपनी साड़ी का पल्लू मुँह पर दबाए खड़ी थीं और उनके कंधे हिल रहे थे।
और रज़िया आपा उनका हाथ पकड़े खड़ी थीं।
रणवीर ने पत्थर उठाया।
उसका हाथ ज़रा भी नहीं काँपा। कमबख़्त का हाथ। इतना साफ़ हाथ, जैसे उसने अपनी सारी ज़िंदगी में पत्थर उठाना सीखा हो।
"आख़िरी बार कह रहा हूँ," उसने कहा। "हट जाओ, सुशीला जी।"
मैंने एक कदम आगे बढ़ाया।
मेरे हाथ में पापा की कॉपी थी। वो पुरानी, काली जिल्द वाली कॉपी। जिसमें पापा ने बाईस साल का हिसाब लिखा था। मैंने उसे सीने से लगाया हुआ था, जैसे कोई ढाल पकड़ी हो।
"रणवीर," मैंने कहा।
मेरी आवाज़ काँप रही थी। मैं झूठ नहीं बोलूँगा। काँप रही थी।
"तू चाहे जो कर," मैंने कहा। "पर माँ के ऊपर से हाथ उठाने से पहले सोच ले कि इस गली में तेरा एक भी आदमी बचेगा या नहीं।"
"मेरे आदमी मेरे पास हैं," रणवीर ने कहा।
"हैं?" मैंने कहा। "कहाँ? उन दो सिपाहियों में से एक ने अभी सक्सेना की तरफ़ देखा है। और सक्सेना का हाथ काँप रहा है। तेरा ख़ुद का हाथ नहीं काँप रहा — पर तेरे सबसे वफ़ादार आदमी का हाथ काँप रहा है। सोच क्यों।"
रणवीर ने सक्सेना की तरफ़ देखा।
सक्सेना ने नज़र नीची कर ली।
"चंद्रेश," रणवीर ने कहा।
"सर," सक्सेना ने कहा, बहुत धीरे।
"रजिस्टर बंद करो," रणवीर ने कहा।
सक्सेना ने रजिस्टर बंद किया।
रणवीर ने पत्थर ऊपर उठाया।
और ठीक उसी पल, भीड़ में से कोई निकला।
भीड़ चीरकर।
धीरे-धीरे।
मैंने पहले उसकी नीली शर्ट देखी — घिसी हुई आस्तीन वाली पुरानी नीली शर्ट। फिर वो टेप से बँधा चश्मा। फिर वो हाथ, जिनमें आज कोई औज़ार नहीं था। खाली हाथ।
पापा।
पापा आए।
और वो सीधे रणवीर के सामने जाकर खड़े हो गए।
मेरे और माँ के बीच में।
मेरी साँस रुक गई।
"पापा," मैंने कहा।
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा भी नहीं।
"रणवीर भारद्वाज," पापा ने कहा।
उनकी आवाज़ वो आवाज़ नहीं थी जो घर में होती थी। वो आवाज़ नहीं जो छोटे-छोटे वाक्यों में बोलती थी और फिर चुप हो जाती थी। ये आवाज़ किसी और आदमी की थी। किसी ऐसे आदमी की, जो बाईस साल से खुद को क़ैद में रखे हुए था और आज अपने आप को रिहा कर रहा था।
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