The Mysterious Bell – Chapter 1444
उसने ताले को घुमाया।
वो मेरी तरफ़ झुकाया।
"और मैं इसे — तुम्हारे सामने — तोड़ दूँगा।"
मैदान में ऐसी चुप्पी छा गई कि दीयों की लौ की आवाज़ सुनाई देने लगी।
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला।
घंटी अब भी ठंडी थी।
बर्फ़ जैसी।
जैसे पूरी दुनिया में सबसे ठंडी चीज़।
मैंने घंटी निकाली।
उसे अपनी हथेली पर रखा।
और मैंने धीरे से कहा — मैं नहीं जानता कि मैंने कहा या सिर्फ़ सोचा — "अब तू चुप क्यों है?"
घंटी ने जवाब नहीं दिया।
मैंने उसे हिलाया।
कुछ नहीं हुआ।
मैंने मुट्ठी में रखकर भींचा।
कुछ नहीं हुआ।
मैंने उसे अपने माथे से लगाया।
वो ठंडी थी।
रफ़ीक़ ने मेरी कमीज़ खींची।
"उस्ताद," उसने कहा। "वो—"
"पता है," मैंने कहा। "घंटी चुप है।"
"तो?"
मैंने ताले को देखा।
उस ताले को।
रणवीर के हाथ में।
मैंने रणवीर की तरफ़ देखा।
और मैंने अपनी आवाज़ में उतना ही मज़ाक डालने की कोशिश की जितना उस रात, जब मैंने पहली बार उसे पहचाना नहीं था।
"रणवीर साहब," मैंने कहा। "आप एक ताला तोड़ने की बात कर रहे हैं। उस चीज़ को तोड़ने की बात कर रहे हैं जो आपके पास कभी थी ही नहीं।"
वो मेरी तरफ़ मुड़ा।
"क्या मतलब?"
"मतलब," मैंने कहा, "कि ये ताला आपने किसी से लिया है। और वो किसी ने आपको दिया नहीं है। आपने उसे छीना है।"
मैंने उसकी तरफ़ एक कदम बढ़ाया।
"और इस गली में, हमारे साइकिल गली में, हमने एक बात सीखी है — जो छीना हुआ होता है, वो कभी पूरा नहीं होता। वो हमेशा अधूरा रहता है।"
वो हँसा।
एक छोटी हँसी।
जिसमें पहली बार मुझे कुछ समझ आया — वो हँसी थी नहीं, वो डर की आवाज़ थी।
"अंकुश यादव," उसने कहा। "तू समझता है कि तू मुझे हरा रहा है। तू समझता है कि आज तेरी गली जीत रही है।"
उसने ताले को अपने सीने से लगाया।
"पर तू भूल रहा है — ये ताला मेरे पास है। ये जिसके भी हो, अब ये मेरे पास है। और जिसके पास कोई चीज़ होती है…"
उसने मेरी आँखों में आँखें डालीं।
"…वो उसे तोड़ सकता है।"
मेरी जेब की घंटी — जो अब तक ठंडी थी — काँपी।
एक बहुत छोटी काँप।
जैसे किसी ने बहुत दूर से इसकी तरफ़ हाथ बढ़ाया हो।
मैंने घंटी को अपनी हथेली में कस लिया।
"तो तोड़ दो," मैंने कहा। "पर पहले ये सोच लो — अगर ये ताले में हमारी गली की हँसी है, हमारी गली का डर है, हमारी गली का बचपन है…"
मैंने उसकी आँखों में देखा।
"…तो इसे तोड़ने के बाद तुम्हारे पास क्या बचेगा?"
वो रुका।
उसका हाथ जो ताले पर कसा हुआ था — वो एक पल को ढीला पड़ा।
सिर्फ़ एक पल।
और उसी पल में उस्ताद अली बक्श आगे बढ़े।
वो मंच तक नहीं गए। वो सिर्फ़ आगे आए — मेरी अगल-बगल में खड़े हो गए।
और उन्होंने देखा।
"ये ताला," उस्ताद ने कहा, आवाज़ धीमी, "ये मंसूर का ताला है।"
रणवीर की आँखें उन पर टिक गईं।
"मंसूर ने इसे बनाया था," उस्ताद ने कहा। "और मंसूर के पास ऐसे दो ताले थे। एक मेरे घर में, एक…"
वो रुके।
"…एक उस घर में जो आज किसी और के नाम है।"
मैदान में फुसफुसाहट फैली।
रणवीर ने ताले को अपने पीछे कर लिया।
"बकवास," उसने कहा।
"बकवास नहीं," उस्ताद ने कहा। "मंसूर ने मुझे बताया था — ये ताले एक जैसे हैं, पर एक ही चाबी से नहीं खुलते। क्योंकि इनमें वो बात बंद है जो दो भाइयों के बीच थी। और जब तक दोनों भाई साथ नहीं बैठते…"
उन्होंने रणवीर की तरफ़ देखा।
"…ये ताला नहीं खुलता।"
रणवीर ने उस्ताद को देखा।
फिर मुझे।
फिर सक्सेना को।
और फिर उसने ताले को वापस मेज़ पर पटक दिया।
पूरे मैदान में धड़ाम की आवाज़ गूँजी।
"बहुत हो गया," उसने कहा। "मैंने आज इस मैदान में आने की ज़हमत उठाई। मैंने यहाँ अपना नाम लिखवाया। मैंने तुम सबको एक मौका दिया।"
उसने सक्सेना की तरफ़ देखा।
"चंद्रेश," उसने कहा। "सब कुछ लिख लिया?"
सक्सेना ने अपना रजिस्टर देखा। फिर उसने काँपते हाथ से सिर हिलाया।
"हाँ सर।"
"तो अब सुनो," रणवीर ने कहा, मैदान की तरफ़ मुड़कर। "ये जो काग़ज़ तुमने अपने नाम पर लिखवाए — ये मेरे रजिस्टर में हैं। और मेरे रजिस्टर में लिखा हुआ काग़ज़…"
वो रुका।
"…हमेशा बोलता है। चाहे जिसकी भी गली हो।"
वो मुड़ा।
और मेरी तरफ़ देखा।
"पूर्णिमा की शाम," उसने कहा। "सात बजे। नूर अस्पताल का खुला मैदान। वहाँ सब तय होगा।"
वो मुड़ा।
उसके आदमी उसके पीछे आए।
दो सिपाही, जो अब तक किनारे खड़े थे, उसके पीछे हुए।
रणवीर चला।
और जाते-जाते उसने एक बार मुड़कर देखा।
मुझे नहीं। मेज़ पर रखे उस ताले को।
फिर वो चला गया।
मैदान में सब खड़े थे।
कोई नहीं बोला।
फिर पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
और उन्होंने धीरे से कहा — इतना धीरे कि सिर्फ़ मैंने सुना —
"बेटा, वो ताला… वो वही है।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
और मैंने देखा कि उनकी जेब से जो चमकीली चीज़ झाँक रही थी, वो अब बाहर आ चुकी थी।
पापा के हाथ में।
एक चाबी।
पुरानी।
पीली रस्सी में बँधी।
और उस पर वही निशान था।
"मंसूर ने मुझे दी थी," पापा ने कहा। "उस दिन — मंसूर के जाने से पहले।"
उन्होंने चाबी मेरी तरफ़ बढ़ाई।
"अब तेरे पास है," उन्होंने कहा। "क्योंकि तेरे पास घंटी है।"
मैंने चाबी ली।
मेरी जेब में घंटी एक बार फिर गरम हुई।
बहुत धीमी।
जैसे सोते हुए किसी ने करवट ली हो।
और मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।
"अब?" मैंने पूछा।
उस्ताद ने उस ताले को देखा जो मेज़ पर पड़ा था।
फिर मेरी चाबी को।
फिर मेरी जेब को।
"अब," उस्ताद ने कहा, "हम दो नहीं हैं, तीन हैं।"
वो रुके।
"और हमें दोनों ताले चाहिए।"
मैदान में दो सौ अठारह में से एक और दीया बुझा।
पर इस बार किसी ने नहीं देखा।
सब उस ताले को देख रहे थे।
और मेरे हाथ में उस चाबी को।
जिसे पापा ने पच्चीस साल छिपाकर रखा था।
जिसे मंसूर ने अपने जाने से पहले पापा को दिया था।
और जिसे अब — इस वक़्त — मैंने अपनी हथेली में कस लिया।
और मैंने ताले को देखकर धीरे से कहा — सिर्फ़ अपने आप से — "अब तू बोल।"
॥
मैंने ताले को देखा।
और मैदान में हवा रुक गई।
सच में रुक गई। दीयों की लौ तक नहीं हिली। दो सौ सोलह लौएँ एक सीध में जल रही थीं, जैसे किसी ने उन्हें भी कह दिया हो — अब मत हिलो, अब देखो। मैदान के बाहर पीपल के पत्ते तक बंद हो गए थे। जो लोग पीछे खड़े थे, उनके कपड़ों की सरसराहट तक रुक गई।
और मेरी जेब में घंटी बर्फ़ जैसी ठंडी पड़ गई।
न बजी। न गरम हुई। न कुछ कहा। बस ठंडी। इतनी ठंडी कि मेरी जाँघ पर जैसे कोई बर्फ़ का टुकड़ा रख गया हो। मैंने जेब पर हाथ रखा और मुझे लगा कि मैं किसी ऐसी चीज़ को छू रहा हूँ जो साँस रोककर बैठी है।
मैदान में खड़े लोगों की आँखें उसी एक चीज़ पर टिकी थीं।
मेज़ पर पड़ा वो काला ज़ंग लगा ताला।
और मुझे यक़ीन हो गया कि गली के हर आदमी को पता है कि उस ताले में क्या बंद है।
क्योंकि कोई नहीं बोला। कोई नहीं हिला। माँ की कुर्सी के पास खड़ी काजल ने अपना हाथ मुँह पर रख लिया, जैसे किसी औरत ने अपने ही घर का दरवाज़ा खुलते देख लिया हो। शबनम आपा ने अपनी चूड़ी वाली कलाई पकड़ ली। उस्ताद अली बक्श ने अपना मोटा चश्मा उतार लिया और सीधे उस ताले को देखने लगे, जैसे बिना चश्मे के उसे ज़्यादा साफ़ देख सकेंगे।
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