The Mysterious Bell – Chapter 1443
"उसी पैसे से," उसने कहा, "ये भवन खड़ा हुआ।"
मैदान में सबसे पहले माँ ने आवाज़ की।
"हे राम," वो धीरे से बोलीं। और अपना हाथ काजल के हाथ पर रख दिया।
काजल ने माँ की तरफ़ देखा।
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
पापा अब भी अपनी जेब पर हाथ रखे खड़े थे। उनकी आँखें हरिप्रसाद पर थीं। पर उनका चेहरा कुछ और कह रहा था — जैसे वो हरिप्रसाद की हर बात खुद भी जी रहे हों। जैसे "मैं भी तो इसी काग़ज़ के नीचे बैठा हूँ।"
मैंने हरिप्रसाद की तरफ़ देखा।
"आपने इतने साल चुप क्यों रहे?" मैंने पूछा। "अगर आपको पता था — आपने ये सब क्यों नहीं बताया?"
वो मेरी तरफ़ मुड़ा।
"क्योंकि मैं डर गया था, बेटा," उसने कहा। "शुरू में। फिर शर्म आ गई। फिर आदत पड़ गई। और फिर…"
वो रुका।
"फिर वो मुझे भूल गया।"
उसके चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान आई।
"वो मुझे भूल गया, बेटा। सबसे बड़ी सज़ा यही है। जब तुम्हारा दुश्मन तुमसे डरता नहीं, वो तुम्हें याद भी नहीं रखता। मैं उसके लिए एक पुराना मिस्त्री था, बस। एक नाम जो किसी पुराने रजिस्टर में है।"
वो हिला।
"मैं वो नाम होना नहीं चाहता था जो भूल जाए।"
वो मुड़ा।
उसकी आँखें भीड़ के पीछे कहीं टिकी थीं।
और मैंने देखा कि उसकी नज़र भीड़ के आख़िरी हिस्से में खड़े एक नौजवान पर जाकर रुकी।
नौजवान — शायद पच्चीस छब्बीस का। पहने हुए सस्ती सफ़ेद कमीज़, कंधों पर धूल। हाथों में काम करने की आदत वाली गठानें। और वो वहाँ खड़ा था — पीछे, अकेला — जैसे आया तो था, पर मंच तक आने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा।
हरिप्रसाद ने उसकी तरफ़ हाथ बढ़ाया।
"गोपी," उसने कहा।
नौजवान हिला।
"आ जा, बेटा।"
कोई नहीं हिला।
"गोपी," हरिप्रसाद ने फिर कहा, और उसकी आवाज़ इस बार काँपी। "मुझे पता है तू आज सुबह से वहाँ खड़ा है। मैंने तुझे देख लिया था। आ जा।"
नौजवान — गोपी — धीरे-धीरे आगे आया।
और हरिप्रसाद ने उसे पास आते देखा, और फिर सबके सामने हाथ जोड़कर उसके सामने झुक गया।
मैदान में कुछ लोग हड़बड़ा गए।
"हरिया भाई—" किसी ने कहा।
"मत रोक," हरिप्रसाद ने कहा, वो झुका ही रहा। "पच्चीस साल का हिसाब है। पूरा होने दो।"
मैंने गोपी की तरफ़ देखा।
उसके हाथ जैसे किसी और चीज़ में उलझे थे।
उसकी आँखें।
उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो एक शागिर्द की आँखों में उस दिन रणवीर के लिए थी — और आज जो हरिप्रसाद ने सबको दिखा दी थी।
"बेटा," हरिप्रसाद ने कहा, आवाज़ में रुलाई। "उस दिन — उस रात — मैंने डर के मारे तेरे बाप पर झूठा दोष लगा दिया। मैं भूल गया कि गलती मेरी थी, कि मैंने उसे इतना भरोसा दिया कि वो मेरी जगह लेने की सोचने लगा। मैंने उस पर इल्ज़ाम लगाया, जिससे लोग कहें — वो मेरा हाथ नहीं था, उसने मेरी जगह लेने के लिए मशीन खराब की।"
"लेकिन—" गोपी की आवाज़ फूटी।
"आज मैं सबके सामने कहता हूँ," हरिप्रसाद ने कहा, "कि गलती मेरी थी। तेरे बाप पर लगा इल्ज़ाम मेरा था। उस रात जो हाथ मशीन के पीछे खड़ा था, वो तेरे बाप का नहीं था, वो खुद मेरा शागिर्द था। और मैंने उसका नाम बचाने के लिए तेरे बाप का नाम ख़राब किया।"
मैदान में एक ऐसी चुप्पी उतरी, जो मैंने पहले कभी नहीं सुनी।
वो चुप्पी जो लोगों की सांस से बनती है।
गोपी खड़ा था।
बस खड़ा था।
और फिर वो आगे आया।
उसने हरिप्रसाद का हाथ पकड़ लिया।
वो हाथ जिसकी आधी उँगली नहीं थी।
और उसने उस हाथ को अपने सीने से लगा लिया।
बस इतना किया।
एक शब्द नहीं बोला।
और हरिप्रसाद, जो पच्चीस साल से सूखा खड़ा था — वो एक आदमी जो पच्चीस साल किसी से कुछ नहीं कहा — वो फूट-फूटकर रोया।
गोपी की आँखें भी छलक आईं।
उसने हरिप्रसाद का सिर अपने कंधे पर रख लिया।
और मैदान में जो लोग खड़े थे — शबनम आपा, रज़िया, दुबे अंकल, उस्ताद, रेडियो वाले बूढ़े, खेलू-बेलू, क़ादिर-बद्री… सब खड़े हुए।
किसी ने नारा नहीं लगाया।
किसी ने ताली नहीं बजाई।
बस खड़े हो गए।
जैसे एक पुरानी दीवार हो और उसके आगे पूरी गली खड़ी हो — कि "अब आगे नहीं।"
मैंने अपनी जेब में घंटी पकड़ी।
वो अब भी गरम थी।
पर बोल नहीं रही थी।
पर मैं जानता था — वो सुन रही है।
बबलू ने कुछ कहना चाहा।
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
उसने अपना मुँह बंद कर लिया और सिर हिलाया — "ठीक है तू कर।"
और उसी वक़्त…
रणवीर के पीछे, मंच के एक तरफ़, जहाँ मिट्टी और पुराने सामान का ढेर था, एक लोहे का बड़ा बक्सा रखा था।
मुझे नहीं पता था वो वहाँ कब से था।
वो मैदान में पहले नहीं था। मैंने पहले नहीं देखा था।
पर अब वो वहाँ था।
और उसी वक़्त — जैसे गोपी के हाथों ने हरिप्रसाद को छुआ — वो बक्सा ज़ोर से चटका।
आवाज़ इतनी तेज़ थी कि पूरा मैदान हिल गया।
कुछ लोग झुक गए।
किसी ने चीख मारी।
काजल ने माँ को पकड़ लिया।
पापा ने आँखें बंद कर लीं।
और उस बक्से से — उसकी दरार से — सूखी मिट्टी की तरह कुछ झड़कर ज़मीन पर गिरा।
धीरे-धीरे।
फिर ज़्यादा।
फिर और।
जैसे कोई बहुत पुरानी चीज़ हो जिसके अंदर से अपना ही खोखलापन बह रहा हो।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
उसका कैमरा पहले से उस दरार पर था।
उसकी आँखें फटी हुई थीं।
"ये—" वो फुसफुसाई। "ये तो…"
वो रुक गई।
मैंने शालिनी की तरफ़ देखा।
उसने अपनी फाइल पहले ही खोल ली थी और उसमें एक नया पन्ना डाल रही थी। उसका हाथ काँप रहा था। वो लिख रही थी — जैसे वक़्त न हो, जैसे कुछ भी हो जाए, ये लिखा जाना चाहिए।
मैंने रणवीर की तरफ़ देखा।
उसने अपना बक्सा चटकते देखा।
और उसके चेहरे पर कुछ था…
डर नहीं।
डर से बढ़कर।
वो अपने साथ कुछ ऐसा होते देख रहा था जो उसने पहले कभी नहीं देखा।
जैसे कोई अपने ही शरीर का कोई हिस्सा गिरता देख रहा हो।
सक्सेना ने खड़े होकर अपना रजिस्टर उठाने की कोशिश की।
उसका हाथ मेज़ पर रखे पन्नों से टकराया।
कुछ पन्ने गिर गए।
"रुको—" उसने कहा।
वो झुका।
रजिस्टर उठाने के लिए।
उसकी उँगलियाँ उन पन्नों तक पहुँचीं।
और रणवीर ने कुछ किया जो मैंने उम्मीद नहीं की थी।
उसने मेज़ के नीचे से अपना हाथ बढ़ाया।
उसने कुछ उठाया।
मैंने देखा।
एक पुराना ताला।
भारी।
काला।
ज़ंग लगा।
और उसके छल्ले पर एक पीली पड़ी रस्सी बँधी थी, जिस पर वही निशान था।
वही दो लकीरें।
वही बीच का बिंदु।
मैं वो निशान पहचानता था।
वो निशान मैंने देखा था — चूल्हे के पीछे वाले दरवाज़े पर।
वो निशान मैंने देखा था — घंटी के छल्ले पर।
वो निशान मैंने देखा था — पीपल की मिट्टी में, गुमटी के पीछे, बिजलीघर के बक्से पर, और अब…
अब मैंने उसे रणवीर के हाथ में उठे हुए ताले पर देखा।
और मेरी जेब की घंटी, जो अब तक गरम थी — एकदम ठंडी पड़ गई।
"रणवीर—" सक्सेना ने कहा।
रणवीर ने उसकी तरफ़ देखा भी नहीं।
वो मेरी तरफ़ देख रहा था।
वो ताला उसके हाथ में मैदान की रोशनी में चमक रहा था — एक अजीब नीली चमक।
और उसने वो ताला हवा में उठा दिया।
"देख रहे हो?" उसने कहा। आवाज़ मज़बूत थी, पर उसमें जो काँप था, वो छुप नहीं रहा था। "देख रहे हो, हरिया भाई? तुम सब यहाँ अपने काग़ज़ों पर, अपने नामों पर, अपने सचों पर खड़े हो।"
उसने ताले को ऊँचा उठाया।
"पर तुम्हारे पास एक ही चीज़ बची है," उसने कहा। "और वो काग़ज़ नहीं है। वो सच नहीं है। वो ये है।"
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