The Mysterious Bell – Chapter 1434
"उस बक्से से रात को आवाज़ आती है।"
मैदान में हवा तक रुक गई।
"और साहब उसके सामने खड़े होकर बात करते हैं।" बबलू ने आँखें मीच लीं, फिर खोलीं। "किसी से नहीं। जो वहाँ कोई नहीं होता, उससे बात करते हैं। और मैंने एक रात दरवाज़े से झाँका था — पंद्रह साल में एक ही बार — और साहब ने सिर्फ़ इतना कहा था, 'आ जा भई, बैठ, आज भी एक हिसाब बाकी है।' और मैं भाग गया। क्योंकि साहब वो बात उस बक्से से कर रहे थे, और वो बक्सा ऐसे चुप हो गया जैसे उसने सिर हिला दिया हो।"
उसकी आवाज़ फिसल गई। "मैं बारह साल से भाग रहा हूँ, भाई। बारह साल से।"
मैंने उसका कंधा नहीं छोड़ा। मैंने देखा — उसकी आँखों में वो पानी था जो मोटे आदमियों की आँखों में आसानी से नहीं आता, क्योंकि दुनिया मोटे आदमियों से मज़ाक करती है और उन्हें रोने की छुट्टी नहीं देती।
और तभी एक आवाज़ आई।
"बबलू।"
धीमी। बिल्कुल धीमी। एक नाम, दो अक्षर, और उसमें इतनी बर्फ़ कि मैदान के सारे दीये ठंडे लगे।
वो रणवीर ने कहा था।
वो अब भी मेज़ के पास खड़ा था, अपना कुर्ता ठीक कर रहा था, और उसके चेहरे पर वो सादापन था जो गिलास गिरने के बाद आया था। उसने अपनी उँगली बबलू की तरफ़ उठाई — सिर्फ़ भले लोगों की तरह, प्यार से, जैसे कोई बड़ा भाई अपने छोटे को समझा रहा हो।
"बबलू, तू मेरा नौकर है।" उसकी आवाज़ बहुत शांत थी। शांत और साफ़, और इसीलिए सबसे ज़्यादा डरावनी। "पंद्रह साल मेरी रोटी खाई है, मैंने तुझे कभी ये नहीं कहा कि तू मेरा साथी है। तू मेरे दरवाज़े का आदमी है। और दरवाज़े का आदमी जब झूठ बोलता है, तो लोग हँसते हैं — क्योंकि दरवाज़े की आवाज़ से घर नहीं गिरता।"
उसने मुस्कुराने की कोशिश की और मुस्कान आधी बनी, आधी रह गई। "इसकी बात का कोई मोल नहीं। ये वही आदमी है जिसे कल मैंने स्कूल के पीछे आग लगाते देखा—"
"मैंने नहीं लगाई!" बबलू चिल्लाया, और वो चीख उसके शरीर से निकली, गले से नहीं।
"तो माचिस किसने जलाई?" रणवीर ने बहुत आराम से पूछा।
और पूरा मैदान बैठ गया। क्योंकि यही सवाल था। यही सवाल सबके सीने में था और कोई उसे बोल नहीं रहा था। रणवीर ने उसे पूछकर अपना काम कर दिया।
पर बबलू ने वो किया जो मेरे हिसाब से कोई नहीं करता।
उसने अपना हाथ अपनी पैंट की जेब में डाला।
वो अपनी जेब झाड़ रहा था — धीरे, बहुत धीरे। मैंने सुना — कपड़ा हिला। और फिर उसने अपनी बंद मुट्ठी बाहर निकाली और वो अपना हाथ ऊपर करके मंच की मेज़ की तरफ़ बढ़ाया, जहाँ सैकड़ों काग़ज़ पड़े थे — वो काग़ज़ जिन पर आज सुबह छपी एक ही लाइन थी, यह काग़ज़ अपने आप नहीं बोलेगा, इसे बोलने वाला चाहिए।
और उसकी मुट्ठी खुली।
मेज़ पर एक माचिस का डिब्बा गिरा।
आधा जला। छोटा। किनारे से काला। और उस पर एक नीली, घिसी हुई गोल मुहर — यही मुहर मैंने सुबह शंकरलाल यादव के काग़ज़ पर देखी थी।
पूरा मैदान उस छोटी सी चीज़ को देख रहा था। सैकड़ों आँखें। दीयों की रोशनी उस पर पड़ी और माचिस का जला हुआ कोना एकदम साफ़ दिखा, जैसे कोई सबूत खुद को पेश कर रहा हो।
"ये मैंने नहीं जलाया," बबलू ने कहा। और उसकी आवाज़ अब काँप नहीं रही थी। अब उसमें वो चीज़ थी जो डर के पार जाने पर आती है। "ये मुझे उस रात स्कूल के पीछे से मिला था। मैंने देखा कि किसी ने जलाया है, मैं ने उसे उठाया और डर से जेब में रख लिया। और फिर तीन महीने अपने बच्चों के सामने ऐसे बैठा रहा जैसे मैंने कुछ नहीं देखा।"
उसने उँगली माचिस पर रखी।
"साहब कह रहे हैं कि माचिस किसने जलाई।" उसने अपना सिर उठाया और इस बार उसने रणवीर की आँखों में देखा — मैं गवाह हूँ, उसने देखा, पंद्रह साल में पहली बार। "ये डिब्बा इस मेज़ पर मैंने रखा है। और जिसने इसे जलाया, वो भी इसी मेज़ पर बैठा है। इसी मैदान में। इसी सफ़ेद कुर्ते में। आप पूछिए साहब, किसको लगी थी आग? स्कूल को? या उस काग़ज़ को जो स्कूल के स्टोर में रखा था?"
रणवीर का हाथ, जो कुर्ता ठीक कर रहा था, रुक गया।
और मैदान में तीन लोग उठकर खड़े हो गए।
मैंने उन्हें देखा।
पहला — रामलाल। चौकीदार। वो अपने बेटे अजय का हाथ पकड़े खड़ा था और उसका बुढ़ापा उस वक़्त गिर गया था। दूसरा — सुनीता दीदी। उन्होंने अपनी कटोरी ज़मीन पर रखी, बिल्कुल वैसे जैसे कोई अपना सारा कुछ रख देता है। और तीसरा — मास्टर इरफ़ान, जिनके हाथ में वो पुराना पीला काग़ज़ था जिस पर उनके अब्बा का नाम था।
कोई नहीं बोला। उन्होंने बस खड़े होकर इंतज़ार किया। और यही सबसे बड़ी बात थी — कि वो खड़े थे, और सबने देखा कि वो खड़े हैं।
और सक्सेना की कलम —
मैंने देखा कि चंद्रेश सक्सेना की कलम चल रही थी। वो काग़ज़ों के ऊपर थी और कुछ लिख रही थी, और चलते-चलते रुक गई। उन्होंने अपना सिर उठाया, तीन लोगों को खड़ा देखा, और उनका चेहरा एक पल के लिए बिल्कुल खाली हो गया — वो शून्य जो बहुत होशियार आदमी के चेहरे पर आता है जब उसका हिसाब पहली बार गलत बैठ रहा हो।
मैंने सुना — किसी ने पीछे से कहा, "बैठो, बैठो, क्या खड़े हो।" पर कोई नहीं बैठा। और फिर वो आवाज़ भी चुप हो गई।
मैं बबलू के पास से मंच की तरफ़ बढ़ा। उस्ताद मेरे पीछे थे, मुझे उनके जूतों की आवाज़ से पता चला। माँ कुर्सी पर बैठी थीं और उनका हाथ काजल के हाथ में था। मैंने उनकी तरफ़ नहीं देखा, क्योंकि अगर देखता तो मेरी आवाज़ रुक जाती, और आज मेरी आवाज़ नहीं रुकनी थी।
पीछे ज़मीन पर वो बूढ़ा बैठा था — लकड़ी के जूते वाला — जिसने अभी थोड़ी देर पहले पापा की गवाही दी थी। उसका चेहरा शांत था, जैसे वो कोई पुरानी फ़िल्म देख रहा हो जिसका अंत उसे पहले से पता हो।
और बबलू —
बबलू अब भी वहीं खड़ा था, माचिस की तरफ़ देख रहा था, जैसे उसने अभी-अभी अपनी ज़िंदगी की सबसे भारी चीज़ उतार दी हो और अब उसे उठाने की ताक़त न बची हो।
मैं वापस उसके पास गया। मैंने उसके कंधे पर फिर हाथ रखा और धीरे से कहा, इतना धीरे कि सिर्फ़ वो सुने — "बबलू चाचा, आपने आज जो किया, वो कोई नहीं करता। अब बैठ जाइए। आगे का काम मेरा है।"
उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो सवाल था जो बच्चे पूछते हैं — अब मेरा क्या होगा।
"आपका हिसाब मेरे साथ है," मैंने कहा। "किसी और के साथ नहीं।"
और तभी —
"मेज़ पर एक और चीज़ रखनी है?" रणवीर की आवाज़ आई। वो अब मुस्कुरा रहा था, और यह मुस्कान पहले वाली नहीं थी। यह मुस्कान चाकू की थी। "बबलू, तू बहुत बोल गया। अब मैं तेरे लिए एक बात बोलता हूँ। तेरी बेटी की शादी अगले साल है न? मैंने तेरे घर आज सुबह एक लिफ़ाफ़ा भिजवाया था। उसमें जो लिखा है, वो तेरे बेटे ने पढ़ लिया है। तू जानता है मैं क्या लिख सकता हूँ।"
बबलू का शरीर एक झटके में सिकुड़ गया। मैंने उसका कंधा अपनी मुट्ठी में महसूस किया — वो फिर काँपने लगा था, और इस बार मैं जानता था कि यह डर नहीं, गुस्सा था। गुस्सा जो बहुत देर से आया था और इसीलिए सबसे ज़्यादा ज़हरीला था।
"आपने मेरे घर लिफ़ाफ़ा भेजा," बबलू ने कहा। उसकी आवाज़ बहुत धीमी हो गई थी, इतनी धीमी कि मैदान के पहली कतार वालों ने भी कान किए। "आपने मेरी बेटी का नाम लिया। आपने मेरे बेटे के हाथ में काग़ज़ दिया। और अब आप यहाँ खड़े होकर कह रहे हैं कि मैं झूठा हूँ।"
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