The Mysterious Bell – Chapter 1433
लंबी, तिरछी, ऊपर से नीचे तक।
और दूसरा धड़ाम आया।
सक्सेना की मेज़ पर रखा पानी का गिलास हिला, किनारे तक खिसका, और गिर गया। काँच फ़र्श से टकराया — एक तेज़, छोटी, साफ़ आवाज़ — और पूरा मैदान बैठ गया।
रणवीर उठा।
धीरे उठा। बहुत धीरे, जैसे उसकी कमर में दर्द हो। उसने दोनों हाथ मेज़ से उठाए और अपने कुर्ते की तरफ़ देखा — उस जगह, जहाँ से धुआँ जैसी लकीर उठी थी। लकीर अब नहीं थी। पर कुर्ते पर एक धुँधला निशान था, पीले रंग का, जैसे किसी ने गरम लोहा दबा दिया हो।
फिर उसने अपना सिर उठाया और उसने मैदान की तरफ़ देखा।
और मुझे कुछ समझ आया जो मैंने कभी नहीं देखा था।
वो मुस्कुराना भूल गया था।
पूरी कहानी में, जितनी बार मैंने उसे देखा था — कंबल बाँटते, टीवी पर भाषण देते, गुमटी पर आकर मिठाई बाँटते, मेरी दुकान पर आकर तोहफ़ा छोड़ते, मंच पर चढ़ते — उसके चेहरे पर हमेशा वो मुस्कान रही थी। बनावटी नहीं, असली जैसी। इतनी असली कि लोग उसे भूल जाते थे कि ये वही आदमी है जो उनके काग़ज़ पर अंगूठा लेता है। और अब वो मुस्कान नहीं थी।
उसका चेहरा सादा था। बिल्कुल सादा। जैसे किसी चीज़ के ऊपर से रंग उतर गया हो।
उसने जीप की तरफ़ देखा, फिर बक्से की तरफ़, फिर मेरी तरफ़।
और उसके होंठ हिले। मैंने पढ़ा।
"अभी नहीं।"
मेरी जेब में घंटी ठंडी थी। बिल्कुल ठंडी। बर्फ़ जैसी। और उस ठंडक के बीच से एक आवाज़ आई — बहुत छोटी, बहुत धीमी, एक ही शब्द।
"खुल रहा है।"
मैंने मुट्ठी कस ली और सीधा खड़ा रहा।
क्योंकि मैं जानता था — जिस चीज़ के लिए ये सारा मैदान इकट्ठा है, वो अभी शुरू हुई है।
॥
काँच की आवाज़ जैसे हवा में लटक गई।
मैंने पलटकर देखा — सक्सेना की मेज़ के नीचे पानी फैल रहा था और टूटा गिलास टुकड़ों में बिखरा पड़ा था। एक टुकड़ा दीये की रोशनी में चमका, फिर बुझ गया। कोई हिला नहीं। कोई बोला नहीं। दो सौ कुर्सियों पर बैठे लोगों की गर्दनें एक साथ मुड़ीं — किसी की मेज़ की तरफ़, किसी की जीप की तरफ़, किसी की उस लोहे के बक्से की तरफ़ जो अब भी ज़मीन पर पड़ा था और जिसकी सतह पर वो लंबी तिरछी दरार अब भी ज़िंदा थी, जैसे किसी ने उसे चाकू से खींचा हो और छोड़ दिया हो।
और उसी चुप्पी में एक कुर्सी पीछे खिसकी।
लकड़ी का पाया पक्की मिट्टी पर रगड़ खाकर चरमराया, और मैंने देखा — बबलू खड़ा हो गया था।
वो चौथी कतार में बैठा था, गोल कंधे, मोटा शरीर, और उसकी गोद में पानदान रखा था। उसने पानदान उठाया, जेब में ठूँसा, और चलने लगा।
धीरे नहीं चला। सीधा चला। मैदान के बीच से, दीयों के बीच से, कुर्सियों की कतारों के बीच से — और जैसे-जैसे वो आगे बढ़ा, लोगों ने घुटने किए, किसी ने कुर्सी खींची, किसी ने मुझे देखा।
मैंने सोचा — ये आदमी अब क्या करेगा। ये वही आदमी है जिसने मेरा गला पकड़ा था, जिसने मेले में चूड़ियों वाले की गुमटी उलट दी थी, जिसने मेरी दुकान पर मुझे पान की पीक से बताया था कि मैं मोहल्ले का कुछ नहीं हूँ।
और मुझे याद आया — चार बजे उसने अपनी जेब से कुछ निकालकर मेरे हाथ में रखा था। तीन माचिस वाला डिब्बा। वो अब भी मेरी जेब में है।
बबलू मंच से चार कदम पहले रुका।
उसने अपना हाथ गले पर रखा। उँगलियाँ चेन के नीचे घुसीं। फिर उसने एक झटका दिया — वो ज़ोर का झटका जो आदमी तब देता है जब वो किसी और का कुछ तोड़ने के लिए मजबूर हो, अपने ही सीने पर।
चेन चटकी।
और सोने की वो मोटी चेन हवा में घूमकर दीयों के बीच गिरी, धूल में, किसी के पैर के पास। कोई उठाने को नहीं झुका।
"ये नकली है!" बबलू ने चिल्लाकर कहा। उसकी आवाज़ फट गई, जैसे बहुत पुरानी पड़ी रस्सी खींची गई हो। "सुनो सब! ये नकली है! असली कभी थी ही नहीं! मैंने दो सौ साठ रुपये दिए थे मेले वाले को, और उसने कहा था — चाचा, बिल्कुल असली माल है, पहनने से बंदा बड़ा लगता है। और मैं… मैं पंद्रह साल से यही सोचता रहा कि मैं बड़ा हूँ।"
मैदान में एक आवाज़ उठी।
फिर दूसरी।
फिर तीसरी — और फिर सब हँसने लगे।
न हँसी का ठहाका, न मज़ाक। वो हँसी थी जो डर के बाद आती है — जैसे किसी ने सबके सीने पर रखा पत्थर हटा दिया हो, और उस पत्थर के नीचे से हवा निकल पड़ी हो। मैंने देखा — एक बूढ़ी औरत अपना गमछा मुँह से हटाकर हँस रही है। एक आदमी अपना घुटना थपथपा रहा है। सुनीता दीदी अपनी कटोरी सीने से लगाए हँस रही हैं और हँसते-हँसते उनकी आँखों से पानी आ गया।
और पीछे से, बच्चों की कतार से, टिंकू की आवाज़ आई — वो तेज़, पतली, बेतरतीब आवाज़ जो सिर्फ़ तेरह साल की उम्र में होती है, जिसमें सवाल एकदम सीधा होता है और सबसे ज़्यादा चुभता है।
"चाचा! नकली होती तो पहले बताते! हम भी पहन लेते! हमें क्या पता था, असली बहुत महँगी आती है!"
हँसी दुगनी हुई। किसी ने ताली बजाई। किसी ने टिंकू की तरफ़ देखकर सिर हिलाया।
बबलू ने पीछे पलटकर देखा, और उसके चेहरे पर कुछ ऐसा आया जो मैंने उस चेहरे पर कभी नहीं देखा था — शर्म। शर्म और उसके पीछे एक अजीब सी राहत, जैसे किसी ने उससे कोई बोझ उतार लिया हो।
मैं आगे बढ़ा और मैंने अपना हाथ उसके कंधे पर रखा।
कंधा काँप रहा था। मोटा, भारी कंधा — और उसके नीचे जो आदमी था, वो पूरा काँप रहा था। मैंने हाथ नहीं हटाया। मैंने कहा — "बोलो, चाचा। मैदान सुन रहा है।"
और उसने बोला।
"मैं झूठ बोलता रहा।" उसकी आवाज़ में वो खुरदुरापन आ गया जो सुबह थाने में था। "मैं झूठ बोलता रहा कि साहब ने मुझे कुछ नहीं कहा। साहब ने मुझे स्कूल जलाने को कहा था।"
मैदान में एक झटका सा गया। किसी बच्चे ने अपनी माँ का आँचल पकड़ लिया। मैंने माँ की तरफ़ नहीं देखा, पर मुझे लगा कि उनकी कुर्सी की लकड़ी चरमराई।
"नौकरी दिखाई," बबलू ने कहा, और उसकी आवाज़ टूटने लगी। "कहा — बबलू, तेरे बेटे को साइट पर पक्की नौकरी, तेरी बेटी की शादी अगले साल, और मैं… मैंने सोचा, एक स्कूल क्या है? पुरानी कोठरी है। ढह जाए तो नई बनेगी, साहब के नाम की। मैंने सोचा — मेरा क्या जाता है।"
वो रुका। उसने अपने हाथ से अपना मुँह पोंछा।
"पर मैंने माचिस नहीं जलाई। उस रात मैं सिर्फ़ रास्ता बताकर आ गया। मैंने कहा था — पीछे वाली बाउंड्री के पास सूखी घास है, वहाँ से कोई नहीं गुज़रता। मैंने बस इतना कहा था। यही मैं बार-बार अपने को कहता रहता हूँ — मैंने माचिस नहीं जलाई। पर सच यह है कि अगर मैं रास्ता न बताता, तो वो आग नहीं लगती। इसलिए जलाई मैंने ही है।"
उसकी आवाज़ आख़िरी शब्द पर डूब गई। किसी ने कुछ नहीं कहा। उस्ताद चुप खड़े थे, और मैं जानता हूँ उस्ताद चुप तब खड़े रहते हैं जब चुप्पी के अंदर सबसे ज़्यादा कुछ हो।
फिर बबलू ने अपनी उँगली उठाई।
वो उँगली उसकी तरफ़ नहीं उठी जो मेरी तरफ़ थी। वो पीछे उठी — मैदान के किनारे, सफ़ेद जीप की तरफ़, और उसके पीछे ज़मीन पर रखे उस लोहे के बक्से की तरफ़।
"वो बक्सा," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में अब डर वापस आ गया था — वो डर जो उम्र भर की आदत से आता है। "वो बक्सा मैंने खुद सुबह टेम्पो से उतरवाया था। साहब ने कहा था — बबलू, इसे मंच के पास रख देना, किसी को छूने मत देना। और मैंने पूछा नहीं। पंद्रह साल में मैंने कभी नहीं पूछा। पर…"
वो रुका और उसने अपना हाथ गले पर रखा, वहाँ जहाँ अब चेन नहीं थी, जहाँ सिर्फ़ पसीना था।
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