The Mysterious Bell – Chapter 1432
"मैंने लिया था। डर के दबाव में। रात को। उनके घर के बाहर खड़ा होकर। और तब से मैं सो नहीं पाया।"
फिर वो काँपने लगे। दोनों हाथ माइक के स्टैंड की तरफ़ बढ़े, पर स्टैंड वहाँ नहीं था, वो गिर चुका था। काजल ने फिर उनका हाथ पकड़ा और वो उसी पर टिक गए।
"रात को," गोविंद भाई ने कहा, "मैं उनके दरवाज़े पर खड़ा था। मेरे हाथ में वो काग़ज़ था और मेरे हाथ में स्याही नहीं थी। उनसे कहा गया था कि अंगूठा लगाइए। उन्होंने नहीं लगाया। मैंने कहा कि साहब ने भेजा है। उन्होंने फिर भी नहीं लगाया।"
वो रुके। उनका गला सूख गया था। मैंने अपनी जेब से पानी की बोतल निकाली — नहीं, वो काजल की थी, उसने दी थी — और किसी ने — पता नहीं किसने, शायद रज़िया आपा ने — वही स्टील का गिलास थमा दिया और गोविंद भाई ने एक घूँट पिया।
"फिर मैंने कहा," उन्होंने आवाज़ धीमी करके कहा, "कि साहब कह रहे हैं, बच्चे का इलाज भी वही कराएंगे। और बहू की दवा भी वही। और मैं झूठ बोल रहा था। साहब ने कुछ नहीं कहा था। साहब ने सिर्फ़ काग़ज़ भेजा था। बाक़ी सब मैंने खुद जोड़ा — क्योंकि मुझे अपना चूल्हा बचाना था।"
मैदान में फुसफुसाहट फैली।
और वो फुसफुसाहट एक अजीब तरह की थी। लोग किसी की बुराई नहीं कर रहे थे। लोग यह बता रहे थे कि उनका भी चूल्हा वहीं जलता है। एक औरत ने अपने आगे बैठे आदमी से कहा — "देखा, मैं कह रही थी न, गोविंद भाई ऐसा नहीं करता।" और उस आदमी ने कहा — "अब क्या फ़ायदा, बात हो गई।"
और तभी — मैदान के बीच में, आगे की पंक्ति से — कुर्सी के पाए की आवाज़ आई।
मैंने पलटकर देखा।
पापा खड़े थे।
माँ ने उनका हाथ पकड़ना चाहा, पर उन्होंने बहुत धीरे से अपना हाथ छुड़ाया — बिना झटके, बिना ज़ोर के — और काजल की तरफ़ देखा। काजल ने सिर हिला दिया, जैसे कह रही हो — जाओ।
पापा ने अपना चश्मा ठीक किया। वो चश्मा जो उन्होंने सुबह दरवाज़े पर छोड़कर जाना चाहा था और जिसे मैं पहनकर आया था और जो अब मेरी कमीज़ की जेब में था। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा — एक पल — और उनकी आँखों में कुछ था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा था। डर नहीं था। शर्म नहीं थी। एक अजीब सी शांति थी, जैसे किसी ने बहुत लंबा सफ़र करके आख़िर में बोझ ज़मीन पर रख दिया हो।
वो माइक के पास आए, जहाँ काजल के सहारे गोविंद भाई खड़े थे।
और वो बोले — बिना माइक, बिना तार, बिना तैयारी। बस बोले।
"गोविंद भाई सच कह रहे हैं। अंगूठा मैंने लगाया था।"
मेरे भीतर कुछ टूटा।
नहीं, टूटा शब्द ठीक नहीं है। कुछ जम गया। जैसे पानी को ठंड में रख दिया जाए और वो अचानक पत्थर बन जाए। मैं वहीं जम गया, माइक के कटे तार के पास, हाथ में दीया, और मेरी जेब में घंटी फिर गरम होने लगी — हल्की गरम, इतनी हल्की कि किसी को पता न चले, पर इतनी कि मैं समझ जाऊँ।
मैंने मुट्ठी भींच ली।
क्योंकि मैं जानता था। मरम्मत के वक़्त मैं झूठ नहीं बोल सकता। मैं चुप रह सकता हूँ, बात छुपा सकता हूँ, पर अगर मेरे मुँह से एक झूठ निकला तो इस जोड़ के सारे अंक शून्य। और ये जोड़ मेरे पापा का था। ये जोड़ मेरे घर का था।
इसलिए मैंने मुँह खोला ही नहीं।
पापा आगे बोले। उनकी आवाज़ धीमी थी, पर साफ़। "किसी ने मेरा हाथ नहीं पकड़ा। कोई मेरे घर में आकर नहीं खड़ा हुआ। मेरा डर मेरे साथ था। मेरे साथ सोया, मेरे साथ उठा। और मैंने अंगूठा लगा दिया।"
उन्होंने रुककर मेरी तरफ़ देखा।
"और मेरे बेटे को इसका पता नहीं था।"
उस एक लाइन पर मैदान में कुछ हुआ। मुझे समझ नहीं आया क्या। कोई रोया नहीं, कोई चिल्लाया नहीं। बस — पूरे मैदान की साँस एक साथ बाहर गई। दो सौ अठारह दीयों की लौ एक साथ हिली, जैसे किसी ने बड़ी हल्की सी फूँक मारी हो।
और उसी वक़्त, मेरी जेब में घंटी ठंडी पड़ गई।
इतनी ठंडी कि मुझे लगा जेब में बर्फ़ रख दी गई है।
मैंने हाथ जेब पर रखा और उसे दबाया।
और तभी सक्सेना की आवाज़ आई।
"बहुत बढ़िया।" वो खड़े हो गए थे, हाथ में मोटी सफ़ेद फाइल, और उनकी आवाज़ में वही पुरानी मिठास थी, जैसे गुड़ में ज़हर घोला गया हो। "अब मामला खत्म। कबूलनामा है, गवाह है, कबूल करने वाला खुद खड़ा है। अब किसी को कुछ नहीं चाहिए। धन्यवाद, शंकर जी। आपने अपनी ज़िंदगी आसान कर ली।"
वो मुस्कुराए।
"काग़ज़ पर अंगूठा था। अंगूठा आपका था। अब सब साफ़।"
और मुझे लगा कि सब खत्म हो गया।
क्योंकि सच बोलने के बाद आदमी और क्या करता है? वो अपना सच बोल देता है और दुनिया अपना हिसाब बचा लेती है।
पर पापा नहीं रुके।
उन्होंने अपनी जेब से वो पीली, मुड़ी हुई चीज़ निकाली जो मंसूर के काले ताले की कड़ी में मिली थी। उन्होंने उसे खोला। और वो काग़ज़ सक्सेना के सामने, मैदान के बीच, हवा में खड़ा कर दिया।
"ये देखिए," उन्होंने कहा। "ये वही काग़ज़ है। जिस पर अंगूठा है।"
सक्सेना की मुस्कान एक पल के लिए रुकी। फिर लौट आई। "तो?"
"अंगूठे के नीचे तारीख़ है," पापा ने कहा। "पढ़िए।"
सक्सेना ने नहीं पढ़ा।
"पढ़िए," मैदान से कोई बोला। फिर दो लोग बोले। फिर पूरी पंक्ति बोली। "पढ़िए! पढ़िए!"
सक्सेना ने काग़ज़ लिया। उन्होंने देखा। उनका चेहरा नहीं बदला — यही उनकी सबसे बड़ी कला थी, चेहरा न बदलना। पर उनकी उँगली काग़ज़ के किनारे पर दब गई, इतनी ज़ोर से कि काग़ज़ मुड़ने लगा।
"तारीख़ है," उन्होंने कहा।
"और रकम?" पापा ने कहा। "रकम कहाँ है? बिक्री की जो रकम लिखी है, वो मेरे किसी खाते में आई? मेरे किसी काग़ज़ पर लिखी है कि मुझे पैसा मिला? मेरे अंगूठे के नीचे तारीख़ है — पर जिस दिन की वो तारीख़ है, उस दिन मैं अस्पताल के बाहर बरामदे में बैठा था, अपनी बीवी के ऑपरेशन के बाहर, रात भर।"
उस वक़्त मैदान के पीछे से एक बूढ़ा आदमी खड़ा हुआ।
बहुत बूढ़ा। उसकी कमर झुकी हुई थी और उसने अपनी लाठी दोनों हाथों से पकड़ी हुई थी। उसकी आवाज़ में वो खुरदुरापन था जो सिर्फ़ उम्र से आता है, और वो ज़ोर से बोला — इतनी ज़ोर से कि मुझे लगा उसने पूरी ज़िंदगी का ज़ोर लगा दिया।
"उस दिन हम सब अस्पताल के बाहर खड़े थे! पूरी गली! रात भर! और ये आदमी—" उसने पापा की तरफ़ उँगली उठाई, "—इस आदमी ने एक बार भी अंदर जाने की ज़िद नहीं की, क्योंकि डॉक्टर ने कहा था कि एक ही आदमी अंदर रहेगा और ये अपनी बीवी को अंदर रखकर बाहर बैठा रहा। और यह बात बिल्कुल सच है! बिल्कुल सच!"
और उस बूढ़े के बोलते ही — मुझे याद है — लोगों की साँस लौट आई।
जैसे पूरे मैदान ने एक साथ साँस ली हो। दीयों की लौ सीधी हुई। किसी ने अपना गमछा कान से खोला। माँ ने अपना आँचल मुँह से हटाया और मैंने देखा कि उनकी आँखों में पानी था, पर वो मुस्कुरा रही थीं — और वो मुस्कान मैंने बहुत दिनों बाद देखी थी। शायद पहली बार ठीक से देखी थी।
सक्सेना काग़ज़ वापस करने ही वाले थे कि मैदान में एक और आवाज़ आई — और ये आवाज़ किसी इंसान की नहीं थी।
धड़ाम।
इतनी ज़ोर की आवाज़ कि मेरे दाँत तक हिल गए।
मैंने पलटकर देखा।
रणवीर की सफ़ेद जीप मैदान के किनारे खड़ी थी, और उसके पीछे — ज़मीन पर रखा — वो लोहे का बड़ा बक्सा था जिसे कोई सुबह किसी टेम्पो से लाया था और जिसे किसी ने देखा तक नहीं।
उसकी सतह पर एक दरार पड़ गई थी।
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