The Mysterious Bell – Chapter 1431
"और जवाब देने का दिन आज है।"
मैदान में कुछ लोग उठकर खड़े हो गए। मैंने देखा — सुनीता दीदी खड़ी थीं, उनके हाथ में कुछ था। रामलाल चौकीदार खड़े थे। रेहाना दाई खड़ी थीं, अपनी पुरानी लाल जिल्द वाली डायरी सीने से लगाए।
रणवीर ने उन्हें देखा। उसकी मुस्कान पूरी तरह नहीं गई, पर उसका रंग बदल गया — जैसे किसी ने उस मुस्कान पर ठंडा पानी डाल दिया हो।
उसने धीरे से अपना हाथ मेज़ से उठाया और माइक उसकी तरफ़ खींच लिया।
माइक मेरे हाथ से खिसककर उसकी मेज़ पर चला गया। वो खड़ा हुआ, दोनों हाथ मेज़ पर रखे, और मुस्कुराकर सबको देखने लगा — जैसे किसी शादी में दूल्हे का बाप खड़ा होकर पहली बात कहता है।
उसने मुँह खोला।
"आप सब—"
और फिर आवाज़ नहीं आई।
माइक से कोई आवाज़ नहीं निकली। उसके होंठ हिले, उसकी गर्दन की नसें उभरीं, उसने माइक को थोड़ा और अपने मुँह के पास खींचा — पर मैदान में एक भी शब्द नहीं आया।
मैंने देखा, माइक का तार।
वो तार ज़मीन पर पड़ा था और उसका आख़िरी सिरा — कटा हुआ। दोनों तार साफ़-साफ़ कटे हुए, जैसे किसी ने चाकू से एक ही बार में काटा हो।
और तभी वो हुआ।
माइक से नहीं — हवा से।
एक आवाज़ आई। नहीं, आवाज़ नहीं थी। चुभन थी। सुई जैसी, पतली, तेज़, जो कान के अंदर से घुसकर सीधे दाँतों तक जाती है और सिर के पीछे फट जाती है।
पूरे मैदान में एक साथ लोग झुक गए।
माँ ने कान दबाए। काजल ने सिर नीचे किया। टिंकू ने अपने दोनों हाथ सिर पर रख लिए। पीछे ज़मीन पर बैठे उस बूढ़े ने आँखें खोलीं और कान नहीं दबाए — वो बस उठकर खड़ा हो गया, जैसे उस आवाज़ को पहले से जानता हो।
कुछ लोग दीयों पर गिर गए। एक दीया बुझ गया।
चार पुलिस वालों में से दो ने अपनी बंदूकों की तरफ़ हाथ बढ़ाया, जैसे इस चुभन से बंदूक बचा सकती है।
सक्सेना ने अपना चश्मा उतारकर आँखें बंद कर लीं। रणवीर मेज़ पर झुक गया — उसके दोनों हाथ मेज़ पर, सिर नीचे, और उस पीतल के ताबीज़ की जगह से कुर्ते पर धुआँ जैसी पतली लकीर उठी।
और मैं खड़ा रहा।
मुझे चुभा। बहुत चुभा। मेरे कान में भी वो सुई उतरी, पर मैंने कान नहीं दबाए, क्योंकि मेरी जेब से एक चीज़ गरम हो रही थी।
घंटी।
वो बर्फ़ जैसी ठंडी घंटी अचानक गरम हो रही थी, जैसे किसी ने उसे आग पर रख दिया हो।
मैंने जेब में हाथ डाला।
चुभन और तेज़ हो गई। लोग कराहने लगे। कोई बोला — "ये क्या है?" कोई बोला — "कान फट रहे हैं।"
और मैंने घंटी को हथेली में दबाकर पकड़ लिया, और मन में कहा — सम्भल।
चुभन रुकी।
एक पल में रुकी — जैसे किसी ने सुई खींच ली हो।
मैदान में लोग धीरे-धीरे उठने लगे। किसी ने कान पकड़े रहे, किसी ने आँखें मसलीं। एक बूढ़ी औरत ने अपना गमछा कान पर बाँध लिया।
मैंने घंटी बाहर निकाली।
वो गरम थी। और उस पर एक नई लकीर उभर आई थी — पतली, सीधी, जो पहले नहीं थी।
मैंने माइक के तार की तरफ़ देखा — कटे हुए तार, ज़मीन पर।
और मैंने रणवीर की तरफ़ देखा — वो अभी भी मेज़ पर झुका हुआ था, साँस ले रहा था, और उसके होंठ हिल रहे थे, बिना आवाज़ के, एक ही बात बार-बार।
मैंने पढ़ा।
वो कह रहा था — "नहीं। अभी नहीं।"
और मैदान की सबसे पिछली कतार से, उस बूढ़े की आवाज़ आई, बहुत शांत, बहुत साफ़, ऐसे जैसे वो सबको सुना रहा हो —
"अब हो गया।"
॥
चुभन रुकी तो पहले कुछ नहीं सुनाई दिया।
और फिर सुनाई दिया — दीये की लौ।
एक लौ हिली, बस हिली, हवा से नहीं, अपनी ही आग से। और मुझे उसके हिलने की आवाज़ आई, जैसे किसी ने काग़ज़ की पतली पर्ची को दो उँगलियों से दबाया हो।
दो सौ अठारह दीये जल रहे थे। एक बुझ चुका था। बाक़ी सबकी लौ की आवाज़ धीमी-धीमी मैदान में फैल रही थी, और वो आवाज़ इतनी बड़ी हो गई थी कि लोगों की साँसें उसके नीचे दब गई थीं।
किसी ने खाँसा नहीं। किसी ने कुछ कहा नहीं।
पुलिस वाले अपने हाथ बंदूक से हटा चुके थे, पर उनकी उँगलियाँ अभी भी काँप रही थीं, जैसे उन्हें भी समझ नहीं आ रहा कि जो हुआ, वो हुआ क्या।
सक्सेना ने चश्मा वापस अपनी नाक पर रखा। उसकी मुस्कान लौट आई थी — जल्दी लौट आई थी। इतनी जल्दी कि लगा किसी ने गिरी हुई चीज़ उठाकर जेब में छिपा ली हो।
और रणवीर अभी भी मेज़ पर झुका हुआ था। दोनों हाथ मेज़ के किनारे पर, सिर नीचे। उसके कुर्ते पर वो धुआँ जैसी पतली लकीर अब भी थी, बस फीकी पड़ रही थी, जैसे सुबह की धूप में कुहरा घुल जाता है।
मेरी हथेली में घंटी गरम थी।
मैंने उसे जेब में डाल दिया। बाहर नहीं निकाला, किसी को नहीं दिखाया। क्योंकि मैं जानता था कि अब जो होने वाला है, वो मेरे किसी जादू से नहीं होगा। वो किसी आदमी की ज़ुबान से होगा। और ज़ुबान वाली चीज़ें जल्दी नहीं होतीं।
और तभी कुर्सी की आवाज़ आई।
बहुत तेज़। चटखती हुई। जैसे कोई बहुत देर से बैठा हो और अचानक उठ खड़ा हो, बिना सोचे, बिना संभले।
सबकी नज़र उधर गई।
गोविंद भाई खड़े थे।
दो दिन में वो और पतले हो गए थे। उनका सफ़ेद कुर्ता ढीला लटक रहा था, धोती का पल्लू कमर पर ठीक से नहीं था, और चश्मा — वही चश्मा — कान पर टेप से बँधा हुआ, पर टेप की एक परत खुल गई थी और चश्मा उनकी नाक पर तिरछा लटक रहा था। हाथ काँप रहे थे। बहुत काँप रहे थे। इतने कि उन्होंने एक हाथ से दूसरे हाथ को पकड़ लिया, जैसे उसे रोकना चाहते हों।
वो चले।
दो कदम चले और लड़खड़ा गए।
मेरा दिल एक बार ज़ोर से धड़का। मैं आगे बढ़ा, पर काजल पहले पहुँच गई। उसने उनका हाथ पकड़ लिया, अपने कंधे के नीचे से उनका हाथ डाला और बहुत धीरे कहा, "संभलके, चाचा। संभलके।"
वो फिर चले। तीसरा कदम, चौथा। और फिर फिर लड़खड़ाए — इस बार अपने ही पैरों से नहीं, इसलिए कि माइक का स्टैंड उनके रास्ते में था और वो उसे देख ही नहीं रहे थे।
काजल ने उन्हें स्टैंड तक पहुँचाया।
गोविंद भाई ने माइक पकड़ा। उनके दोनों हाथ उस पर थे, जैसे किसी बूढ़े ने लाठी पकड़ी हो।
और मैदान में फिर वही चुप्पी आ गई, इतनी गहरी कि मुझे अपनी जेब में घंटी के ठंडा होने की आवाज़ तक सुनाई दी।
गोविंद भाई ने मुँह खोला।
"मैं—"
माइक से आवाज़ नहीं आई।
उन्होंने माइक पर उँगली मारी। फिर माइक को हिलाया। तार ज़मीन पर पड़ा था, कटा हुआ, और उसका कटा हुआ सिरा धूल में दबा था। वो उसे देखते रहे, फिर उनका चेहरा बदला — एक अजीब तरह का गुस्सा आया उन पर, जैसे बूढ़े को लगे कि इस पूरे मैदान में, इस पूरी रात में, सिर्फ़ यही एक तार उन्हें रोक सकता है।
और उन्होंने माइक को एक तरफ़ धकेल दिया।
स्टैंड हिला। माइक धूल पर गिरा। मैदान में एक आवाज़ आई — किसी औरत की छोटी सी चीख़, जो तुरंत दब गई।
गोविंद भाई सीधे खड़े हो गए। उन्होंने गला साफ़ किया — और उस काँपते हुए गले से बोले, बिना माइक, बिना तार, बिना किसी सहारे के।
"शंकर यादव का अंगूठा मैंने लिया था।"
उनकी आवाज़ पहले तीन कतारों तक ही गई। पीछे के लोग गर्दन आगे करके सुनने लगे। शबनम आपा ने उसी वक़्त मैदान के बीच से अपना हाथ उठाया और कहा — "सब चुप! सब चुप हो जाओ! ये आदमी बोल रहा है!" और उनके हाथ में उस वक़्त चाय की केतली थी, वो उठी हुई थी, और वो उसी हाल में जम गई।
गोविंद भाई ने फिर कहा, इस बार ज़ोर से, इस बार आँखें बंद करके, जैसे अपने ही मुँह से निकलती बात को देखना नहीं चाहते हों।
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