The Mysterious Bell1429 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 1429

6 min read November 5, 2026

उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा। उनकी उँगलियाँ पतली थीं और उनमें चूल्हे की गरमी थी।

"मैंने तेरे पापा से कहा है," माँ ने कहा, "कि आज तू उस मंच पर खड़ा होगा — नहीं, वो खड़ा नहीं होगा। आज तू खड़ा होगा। और मैं तेरे साथ बैठूँगी।"

मैंने सिर हिलाया।

शाम हो गई।

और जब शाम हो गई, तो मैंने पहला दीया जलाने के लिए मैदान की तरफ़ कदम बढ़ाया।

मेरे हाथ में दीया था — माँ का मिट्टी का वो ही छोटा दीया जो उन्होंने चूल्हे के पीछे से उठाया था। मेरे पीछे पापा थे, माँ थीं, काजल थी, मीरा थी, टिंकू और बच्चे थे, उस्ताद थे, शबनम और रज़िया थीं, भोला भाई थे, नसीमा बाई थीं, साजिद था, बूढ़े काका थे — और गली के और भी बीस-पच्चीस लोग।

मैं मैदान के गेट पर पहुँचा।

और तभी सुना।

लकड़ी के जूतों की आवाज़।

मैं रुका।

सामने खड़ा था।

वही बूढ़ा। वही जो मेरे घर में आया था। वही जो पापा को डराकर साइकिल ले गया था। उसका चेहरा झुर्रीदार था, आँखें छोटी, और उसके हाथ में एक लाठी थी जिसकी नोक ज़मीन पर टिकी थी।

मेरे पीछे सब रुक गए।

मैंने दीया नीचे नहीं रखा।

"क्या चाहिए?" मैंने पूछा।

वो मुस्कुराया। धीरे से। कोई मज़ाक नहीं था उस मुस्कान में, कोई चोट भी नहीं थी। सिर्फ़ उम्र थी।

"बेटा," उसने कहा, "मैं तेरी माँ से मिलने आया हूँ।"

मेरे पीछे से आवाज़ आई — पापा की। "तू यहाँ क्यों आया?"

बूढ़े ने पापा की तरफ़ नहीं देखा। उसने मेरी आँखों में देखकर कहा, "क्योंकि आज जो बोलेगा, वो तेरे पापा के बारे में नहीं होगा, बेटा।"

वो रुका। उसने मेरी तरफ़ देखा।

"आज जो बोलेगा, वो तेरे बारे में होगा।"

॥

बूढ़े ने मेरी आँखों में देखा और फिर मेरे पीछे खड़ी माँ की तरफ़ देखा।

"सुशीला," उसने कहा।

माँ आगे आईं। काजल ने उनका हाथ पकड़ा, पर माँ ने हाथ छुड़ाया और सीधे उस बूढ़े के सामने खड़ी हो गईं।

"आप आ गए," माँ ने कहा।

उसकी आवाज़ में कोई हैरानी नहीं थी। जैसे वो इस आदमी के आने का इंतज़ार कर रही थीं। जैसे यह आदमी आज नहीं, बरसों से आना था और आज आया।

"आ गया," बूढ़े ने कहा। "तेरे बेटे का हिसाब देखने।"

"बैठिए," माँ ने कहा।

और वो बूढ़ा, जिसने मेरे घर में घुसकर मेरे पापा को डराया था, जिसने दादा की साइकिल उठाई थी — वो मेरी माँ के सामने सिर झुकाकर चलकर मैदान के पीछे गया और कुर्सी पर नहीं, ज़मीन पर बैठ गया।

पापा ने कुछ कहना चाहा। मैंने पापा का हाथ पकड़ लिया।

"पापा," मैंने कहा, "अभी नहीं।"

पापा ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में गुस्सा था और उससे भी ज़्यादा कोई पुराना डर। फिर उन्होंने सिर हिलाया और पीछे हट गए।

मैं मैदान के अंदर आया।

और मैं रुक गया।

मैदान में दो सौ अठारह दीये जल रहे थे। छोटे, मिट्टी के, कतार में। हवा हल्की थी, इसलिए लौ सीधी जल रही थी, काँप नहीं रही थी। पीपल के नीचे चिंटू और गुड्डू की बनाई रंगोली थी और उसके चारों तरफ़ टिंकू ने लाठी से घेरा बना दिया था, जैसे कोई सीमा खींच दी हो — यहाँ पैर नहीं पड़ेगा।

मेज़। मैदान के बाहर लंबी मेज़ थी, जिस पर सैकड़ों काग़ज़ पड़े थे। सबसे ऊपर वो काग़ज़ जिस पर शंकरलाल यादव लिखा था और नीचे प्रस्तुतकर्ता भारद्वाज ट्रस्ट।

और उस मेज़ के ठीक बीच में माइक का स्टैंड खड़ा था — खाली। अभी कोई नहीं बोल रहा था, पर वो खाली स्टैंड ऐसे खड़ा था जैसे उसे पता हो कि आज कौन-कौन बोलेगा।

पीछे पंद्रह-बीस कुर्सियाँ रखी थीं। सफ़ेद कपड़े से ढकी हुई। उनके पीछे खंभे से बँधी वो काली पुरानी साइकिल थी — दादा की साइकिल, जिसका हैंडल खाली था, घंटी की जगह सिर्फ़ पीतल का ब्रैकेट बचा था।

मैंने अपनी जेब में हाथ डाला।

घंटी ठंडी थी। बहुत ठंडी। जैसे किसी ने उसे बर्फ़ में रख दिया हो। मैंने उसे हिलाया। कोई आवाज़ नहीं।

"अभी चुप रह," मैंने धीरे से कहा। "जब वक़्त आएगा, तब बोलना।"

और मैंने दीया ज़मीन पर रख दिया। पहला दीया, रंगोली के ठीक बीच में, जहाँ टिंकू ने घेरा खींचा था।

तभी गेट पर आवाज़ आई।

दो लोग आए थे। एक बूढ़ा और एक औरत। मैंने उन्हें पहचाना नहीं। वो दोनों रुक गए, जैसे अंदर आने से पहले पूछ रहे हों कि आना है या नहीं।

शबनम आपा गुमटी से बना हुआ चूल्हा छोड़कर आईं और उनके हाथ में मिट्टी का कुल्हड़ पकड़ा दिया।

"पी लो," उन्होंने कहा। "यहाँ कोई कुछ नहीं पूछेगा। जो आया है, वो आया है।"

वो दोनों अंदर आए। पीछे बैठ गए।

फिर चार आए।

फिर आठ।

फिर मैंने गिनना छोड़ दिया, क्योंकि टिंकू गिन रहा था।

"बीस!" टिंकू ने कहा। "अरे नहीं, इक्कीस। सानिया, तूने क्यों नहीं लिखा?"

"मैंने लिखा था," सानिया ने कहा, "पर तूने उसी आदमी को दो बार गिन लिया।"

"कौन?"

"जो पीली शर्ट में है। वो एक बार अंदर गया, फिर बाहर गया, फिर आया।"

"अरे!" टिंकू ने कहा। "तो फिर से।"

और टिंकू ने फिर से गिनना शुरू किया। एक, दो, तीन।

फिर रफ़ीक़ ने कहा, "उस्ताद, ये लोग जो बाहर से आ रहे हैं — ये गली के नहीं हैं।"

मैंने देखा।

सही था। गली के लोग तो आ गए थे — नसीमा बाई अपने बेटे साजिद के साथ, भोला भाई अपनी बीवी और बेटी आरज़ू के साथ, किशनलाल काका, बूढ़े काका, रेडियो वाले बूढ़े, सुनीता दीदी और राहुल, मास्टर इरफ़ान, रामलाल चौकीदार और उनका बेटा अजय, रेहाना दाई, सकीना बी जिन्हें टिंकू हाथ पकड़कर लाया था, हमीदा दाई, ज़ुबैदा — सानिया की अम्मी, मंज़ूर चाचा बैसाखी के सहारे।

पर इनके साथ जो नए चेहरे थे, वो गली के बाहर से थे। नए बाज़ार से। पुराने बाज़ार से। कोई दूर की बस्ती से।

"डरो मत," मीरा ने धीरे से कहा, मेरे कान के पास। "मैंने तीन घरों के लोगों को खुद बुलाया है। आज जो सुनेगा, वो कल बोलेगा। इसीलिए उन्हें आना चाहिए था।"

"और जो रणवीर के भेजे हुए हों?" मैंने पूछा।

"वो भी आने दो," मीरा ने कहा। "जो देखेगा, वो भूल नहीं पाएगा।"

तीस पैंतीस, फिर पचास।

फिर मैंने पीछे देखा — माँ और काजल कुर्सियों पर बैठ चुकी थीं, मेरे ही पीछे, जैसे माँ ने कहा था। माँ ने साड़ी का पल्लू कमर में ठीक से खोंसा हुआ था। उनके हाथ में कोई काग़ज़ नहीं था, कोई हिसाब की कॉपी नहीं थी। सिर्फ़ हाथ, गोद में रखे हुए।

काजल ने माँ के पैरों के पास बैठकर उनका पल्लू ठीक किया, और माँ ने उसका सिर सहलाया।

शबनम आपा हर आने वाले के हाथ में चाय पकड़ा रही थीं। और उनकी आवाज़ में आज पहली बार घबराहट नहीं थी। बस कड़क थी — वैसी कड़क जो सम्भालती है।

"अरे, तू क्यों खड़ा है?" किसी बूढ़ी औरत से वो बोलीं। "बैठ। कुर्सी है। और हाँ, चाय पी। आज की चाय में मैंने चीनी कम डाली है, क्योंकि आज सबको मीठा बोलना है, चाय में नहीं।"

कुछ लोग हँसे।

थोड़ी देर में वो हँसी मैदान में फैल गई। छोटी-सी हँसी, जैसे डर के ऊपर रखी गई पतली चादर।

पापा मेरी दाईं तरफ़ खड़े थे। एक हाथ से उन्होंने मेरा कंधा पकड़ रखा था। मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं आई।

"क्या कहा, पापा?" मैंने पूछा।

"कुछ नहीं," उन्होंने कहा। "बस — तेरी शर्ट ठीक कर रहा हूँ।"

उन्होंने मेरी शर्ट का कालर ठीक किया। बहुत देर तक। ज़्यादा देर तक।

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho