The Mysterious Bell – Chapter 1428
फिर मैंने उनकी तरफ़ देखा और कहा, "सुनो।" और दोनों चुप हो गए। "आज कोई झगड़ा नहीं। तुम दोनों नहीं। आज हमें उस हँसी की ज़रूरत है जो कल काम आएगी। इसलिए नहीं बोलो कोई बात। दीयों का हिसाब तुम खुद करो। मुखिया टिंकू है — और वो सबसे बड़ा दीया नहीं जलाएगा। वो दीया मैं जलाऊँगा।"
"क्यों?" चिंटू ने कहा।
"क्योंकि मैंने उस दीये को आज तक नहीं जलाया," मैंने कहा। "और उसके बारे में माँ ने कहा है कि उसे मैं जलाऊँगा, तो मैं जलाऊँगा।"
चिंटू ने अपनी चप्पल पकड़ी और सिर हिला दिया। "ठीक है। समझ गया।"
और वो भागा — सीधा माँ के पास, यह पूछने के लिए कि क्या सच में उस दीये को मैंने जलाना है।
मैं मुड़ा और उस्ताद की तरफ़ गया। उस्ताद मैदान के कोने में, चबूतरी के पास बैठे थे, उनकी गोद में सफ़ेद कपड़ा था और उनके हाथ में सुई। बैनर सिल रहे थे — सच की चौपाल।
"उस्ताद," मैंने कहा, "इस पर ये लिखा है — सच की चौपाल।"
"हाँ।" उन्होंने सिर नहीं उठाया। "सुना है तेरी माँ लिख रही है।"
"माँ?"
"माँ।" उस्ताद ने एक टाँका और लगाया। "आज सुबह उसने कहा — कोई नाम नहीं लिखूँगा, किसी की तारीफ़ नहीं लिखूँगा, बस तीन शब्द लिखूँगा — सच की चौपाल। जो बोटी, जो नहीं बोती, सब वहीं आ जाए।"
मैं चुप हो गया। माँ कभी-कभी मुझे चौंका देती हैं।
"उस्ताद," मैंने कहा, और क्या कहूँ मुझे पता नहीं था, "आज शाम अगर कुछ हो जाए—"
"तू कुछ होने नहीं देगा," उन्होंने कहा, और यह कहते हुए उन्होंने सुई मुझे दी। "ये सुई मेरी माँ की थी। बोलने पर पलटी आ जाती है।" वो अपने हाथ पर एक टाँका लगा रहे थे और मैंने देखा कि वहाँ पहले से एक टाँका है, बहुत पुराना। "ये काटती नहीं। ये जोड़ती है।"
मैंने सुई अपनी जेब में रख ली।
शबनम आपा पीछे चूल्हे पर खिचड़ी बना रही थीं। रज़िया आपा प्याज़ काट रही थीं — दोनों बहनें, पंद्रह साल बाद, एक ही चूल्हे पर। बड़ा चूल्हा था, जो गली से उठाकर मैदान में लाया गया था। माँ के कहने पर। "गली का चूल्हा गली में नहीं जलेगा, मैदान में जलेगा," माँ ने कहा था।
"रज़िया," शबनम आपा ने कहा, "नमक कम डाला तूने।"
"मैंने डाला ही नहीं।"
"तो यही तो कमी है।"
"आपा, आपने पहले नहीं बताया।"
"पंद्रह साल पहले तूने खुद ही कहा था — चूल्हे पर आपा का हाथ नहीं आता। अब मैं आपा हूँ, तू रज़िया है, और ये चूल्हा हमारा है। तो नमक दोनों ने मिलकर डालना है।"
रज़िया ने नमक फेंका। शबनम आपा ने हाथ पकड़ लिया। दोनों हँस पड़ीं। फिर दोनों में एक चुप्पी आई, और शबनम ने कहा, "आज जो भी हो, ये चूल्हा जलेगा।"
मैंने सुना, पर कुछ नहीं कहा।
मैंने मुड़कर देखा। मैदान के मुँह पर, गली के मोड़ पर, वही दो सफ़ेद शर्ट-नीली पैंट वाले लड़के अब पर्चे नहीं बाँट रहे थे। वो अब सीधे गली में जा रहे थे — दुकान-दुकान। और जो दुकानदार काग़ज़ लेता, वो सिर झुकाकर दुकान के अंदर चला जाता, और फिर शटर उतरता।
पहला शटर गिरा — मेरे सामने — साइकिल के पुर्जों वाली दुकान का। दूसरा — छोटी चूड़ी की दुकान का। और फिर मैंने सुना कि तीसरा भोला इलेक्ट्रिकल का भी गिरने वाला है।
मैंने घंटी निकाली, हिलाई। वो ठंडी थी। कोई आवाज़ नहीं।
मैंने शालिनी की तरफ़ देखा।
वो झटके से मेरे पास आई।
"सुना," उसने कहा। "मैं भी देख रही थी। मैंने तीन जगह सुना — शटर गिरते वक़्त दो बातें हो रही हैं। एक, ये काग़ज़। दूसरा — गली के लोग डर रहे हैं।"
"तो?"
"तो यही तो वो चाहता है," शालिनी ने कहा। "ये काग़ज़ सिर्फ़ काग़ज़ नहीं है। ये डर का काग़ज़ है। और मेरे पास कोई उपाय नहीं है — क्योंकि हमने सभा के लिए इजाज़त नहीं ली है।"
मुझे वो सुनकर एक झटका लगा। "इजाज़त?"
"इजाज़त।" शालिनी ने कहा। "सार्वजनिक जगह पर सभा के लिए, अगर वो सरकारी ज़मीन है, तो लिखित इजाज़त चाहिए। और बिना इजाज़त की सभा पर एक ही झटके में रोक लग सकती है। एक काग़ज़। एक मुहर। और हम सब यहाँ से खदेड़ दिए जाएँगे।"
मैंने सुना।
पर मैंने यह भी सुना — हवा में, दूर से, पीपल के नीचे से — पैरों की आवाज़। वो आवाज़ मैं जानता था। धीमी। बहुत धीमी। पर सीधी। जैसे कोई हर कदम सोचकर रखता हो।
दुबे अंकल आ रहे थे।
वो अपनी नीली शर्ट में थे। पर आज कुछ अलग था। आज उन्होंने शर्ट के बटन ऊपर तक बंद किए थे — गले का बटन भी, जो वो कभी नहीं बंद करते। और उनके हाथ में एक मुड़ा हुआ काग़ज़ था।
वो हमारे पास आए। उन्होंने शालिनी की तरफ़ देखा, और मेरी तरफ़।
"बेटा," उन्होंने कहा, "मैंने पचास साल की नौकरी में पहली बार अपनी शर्ट के बटन ठीक से बंद किए हैं।" वो रुके। उन्होंने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया। "और ये — आज सुबह आठ बजे इजाज़त लिखवा ली है।"
मैंने काग़ज़ खोला।
इजाज़त।
सरकारी मुहर। तारीख़। और नीचे हस्ताक्षर — वो भी साफ़, बिना मुड़े हुए।
मैंने दुबे अंकल की तरफ़ देखा। "कैसे?"
"मैं पचास साल से थाने में बैठा हूँ," उन्होंने कहा, "और आज पहली बार उन्हें याद दिलाना पड़ा कि मैं भी तुम्हारे शहर का एक रहने वाला हूँ।"
"दुबे अंकल, आपने—"
"मैंने कुछ नहीं किया।" उन्होंने कहा। "मैंने सिर्फ़ कहा — अगर सभा गैरकानूनी है, तो इजाज़त लिख दीजिए। इजाज़त लिखने में किसी की जान नहीं जाती।"
मैं हँस पड़ा। पर मेरी हँसी में पानी था।
उन्होंने शर्ट के बटन की तरफ़ देखा। "पचास साल में पहली बार," उन्होंने कहा, "मुझे लगा कि बटन बंद करके आना चाहिए।"
मैंने काग़ज़ शालिनी को दिया। वो उसे पढ़कर चुप हो गई, फिर बोली, "ये असली है। मुहर सही है। ये चल जाएगी।"
फिर मैं मुड़ा और अंदर गया — स्कूल की कोठरी की तरफ़।
गोविंद भाई वहाँ बैठे थे। उनकी गोद में काग़ज़ों की कॉपी थी जिस पर उन्होंने अपना बयान लिखा था। वो उसे बार-बार पढ़ रहे थे, और उनका हाथ अब भी काँप रहा था। मैं दरवाज़े पर खड़ा रहा।
तभी पापा आए। मैंने सुना नहीं, देखा — पापा कोठरी के दरवाज़े पर खड़े थे, और गोविंद भाई ने उन्हें देखा, और वो उठने लगे, पर पापा ने हाथ से रोक दिया।
पापा बिना कुछ कहे उनके पास गए, उनके पास बैठे, और उनका कंधा पकड़ लिया।
एक शब्द नहीं।
बस कंधा पकड़ा।
गोविंद भाई की आँखों से आँसू आए और वो काग़ज़ पर गिरे। पापा ने उनका कंधा थोड़ा और कसकर पकड़ लिया।
दो आदमी। एक शब्द नहीं। पर बहुत कुछ कह दिया।
मैं पीछे हट गया। मैं अंदर नहीं आया। कुछ पल ऐसे होते हैं जो किसी और के होते हैं, और उनमें हमें नहीं घुसना चाहिए।
उसके बाद दोपहर हो गई।
मैदान में धूप आई, फिर ढल गई। काजल और सानिया दीयों की गिनती करती रहीं — दो सौ अठारह दीये। चिंटू और गुड्डू ने पीपल के नीचे रंगोली बनाई और टिंकू ने उस रंगोली को एक लाठी से घेर दिया, ताकि कोई उस पर पैर न रखे।
"तू यहाँ क्यों घेरा बना रहा है?" मैंने पूछा।
"उस्ताद," टिंकू ने कहा, "क्योंकि रणवीर के पैर हमेशा रंगोली पर ही पड़ते हैं।"
और मैंने कुछ नहीं कहा, क्योंकि वो सही बोल रहा था।
माँ ने मुझे पास बुलाया।
"अंकुश," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ आज बहुत साफ़ थी, "तू आज शाम को कोई बड़ी बात मत बोलना। कोई भाषण मत देना। बस उन्हें अपना सच बोलने देना। जो अपना सच खुद बोलता है, वो सबसे मज़बूत होता है।"
"माँ," मैंने कहा, "अगर वो—"
"वो क्या करेगा?" माँ ने कहा। "बोलेगा? बोलने दो। पचास काग़ज़ दिखाएगा? दिखाने दो। पर आज कोई भी काग़ज़ पीपल के नीचे से उठकर नहीं बोलेगा। इंसान बोलेगा।"
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