The Mysterious Bell – Chapter 1427
"उस्ताद," वो हाँफते-हाँफते बोला, "उस्ताद — बाहर — मैदान के बाहर — एक लंबी मेज़ लग गई है।"
"मेज़?"
"लंबी। बहुत लंबी। जितनी हमारी गली है।" उसने हाथ से इशारा किया, फिर झुककर घुटनों पर हाथ रखकर साँस लेने लगा। "और उस पर — उस पर काग़ज़ रखे हैं। सैकड़ों। जितने उसकी अलमारी में थे।"
"काग़ज़?"
"हर काग़ज़ पर एक नाम है, उस्ताद।" टिंकू ने सिर उठाया। उसकी आँखें डबडबाई हुई थीं — गुस्से से या डर से, मुझे नहीं पता। "और सबके ऊपर वाला काग़ज़ — सबसे ऊपर —"
वो रुका। उसने पापा की तरफ़ देखा।
"बोल, टिंकू," मैंने कहा।
"सबसे ऊपर वाला काग़ज़ पापा के नाम का है।" उसने कहा। "शंकरलाल यादव। और उसके नीचे लिखा है कि यह काग़ज़ बोलेगा — प्रस्तुतकर्ता, भारद्वाज ट्रस्ट।"
मेरे हाथ से कॉपी फिसल गई।
वो ज़मीन पर गिरी, खुली, और मैंने देखा — पन्ना खुला रह गया, वही पहला पन्ना, वही लिखाई — "मैं पहले मैदान जा रहा हूँ। तू अपनी घंटी लेकर आ।"
और मेरी जेब से घंटी बजी — एक बार, ठंडी, बहुत ठंडी — और उसने कहा —
"अब मेज़ बोलेगी। पर घंटी पहले बोलेगी।"
॥
घंटी के उन शब्दों के बाद मैंने एक पल सोचा कि मैं सब कुछ छोड़कर भाग जाऊँ। फिर मैंने अपनी कॉपी उठाई, झाड़ी, और मैंने कहा — "चलो, वो मेज़ देखते हैं।"
काजल ने मेरा हाथ पकड़ लिया। "अकेले?"
"नहीं।" मैंने कहा। "सबके साथ। पर पहले मैं देखता हूँ कि वो मेज़ है क्या चीज़।"
मैदान के मुँह तक जाने में हमें लगभग दो सौ कदम लगे। और जब हम पहुँचे तो मैंने देखा — टिंकू सच बोल रहा था।
लंबी मेज़। लकड़ी की मोटी, पुरानी, जैसे किसी शादी से उठाकर लाई गई हो। उस पर सफ़ेद कपड़ा बिछा था, और उस कपड़े पर काग़ज़ों के ढेर — सच में सैकड़ों। हवा चलती तो कोने उठते, फिर बैठ जाते, जैसे ढेर साँस ले रहा हो।
और सबके ऊपर, एक काग़ज़ — ज़रा अलग रखा हुआ, पत्थर से दबा हुआ, ताकि हवा उसे न उड़ा दे।
शंकरलाल यादव।
नीचे, छोटे अक्षरों में — प्रस्तुतकर्ता: भारद्वाज ट्रस्ट।
"पापा," मैंने धीरे से कहा, "ये वही नाम है जो उस्ताद की दादी ने बताया था। पेचकस के हत्थे वाला।"
पापा ने कुछ नहीं कहा। वो मेज़ के पास गए, झुके, और अपनी उँगली उस काग़ज़ पर रख दी। बस रख दी। जैसे कोई क़ब्र पर हाथ रखता है।
"इसे वो नहीं लिख सकता," पापा ने कहा। "ये नाम उसने किसी और से लिखवाया है।"
"किससे?"
पापा ने सिर उठाया। उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो मैंने पहले कभी नहीं देखी थी। गुस्सा नहीं। पहचान। "जिसने बाईस साल पहले मुझसे अंगूठा लिया था। उसी से।"
मैंने पीछे देखा। मीरा और शालिनी मेज़ के दूसरे सिरे पर खड़ी थीं, दोनों काग़ज़ों की तरफ़ झुकी हुईं।
"अंकुश," मीरा ने कहा, आवाज़ दबी हुई, "ये सब आज सुबह छपे हैं। स्याही अभी सूखी नहीं है। और हर काग़ज़ पर एक ही लाइन है।"
"क्या?"
"यह काग़ज़ अपने आप नहीं बोलेगा। इसे बोलने वाला चाहिए।"
और तभी — मैंने कसम खाई है, मैं झूठ नहीं बोलूँगा — तभी मैदान के पीछे, पुराने प्लॉट की तरफ़ से, एक लंबी सीटी बजी। किसी ट्रक की नहीं। किसी मशीन की नहीं। वैसी सीटी जो रेफरी बजाता है, या कोई स्कूल का मास्टर बच्चों को बुलाने के लिए।
टिंकू का सिर उठा। "ये हमारी सीटी है।"
"कौन बजा रहा है?"
"रफ़ीक़।" वो भागा। "मैंने उसे पीछे की तरफ़ रखा था।"
वो भागा तो मैं भी पीछे-पीछे गया। और जब हम पहुँचे, रफ़ीक़ प्लॉट की बाउंड्री पर खड़ा था, हाथ में सीटी, और उसकी आँखें बड़ी थीं।
"क्या है?" टिंकू ने कहा।
रफ़ीक़ ने हमें इशारे से पास बुलाया। हम झाँके।
पुराने प्लॉट की दूसरी तरफ़, नई बस्ती की सड़क से सटी, एक सफ़ेद टेम्पो खड़ा था। और उससे उतर रहे थे — दो लड़के। नहीं, लड़के नहीं। दो आदमी। जवान, पर स्कूल के लड़कों जैसी सफ़ेद शर्ट-नीली पैंट में। एक के हाथ में काग़ज़ों का बंडल था। दूसरे के हाथ में — ब्रश और स्याही की डिब्बी।
"ये सुबह से हैं," रफ़ीक़ ने फुसफुसाया। "मैंने इन्हें तीन बार देखा है। पहले गली के मोड़ पर, फिर स्कूल की तरफ़, और अब यहाँ। ये लोगों को काग़ज़ देते हैं, और जो लेता है उसका नाम लिख लेते हैं।"
"कौन सा काग़ज़?"
"यही तो समझ नहीं आ रहा।" रफ़ीक़ ने कहा। "मैंने एक बूढ़े काका से पूछा तो उन्होंने दिखाया। उस पर सिर्फ़ तीन लाइनें हैं।"
"बोल।"
"सभा गैरकानूनी है। जो आया, उसका नाम पुलिस के रजिस्टर में चढ़ जाएगा। और आज शाम के बाद जो मज़ा आएगा, वो तुम्हारे बच्चों के साथ भी होगा।"
मेरे हाथ में कॉपी थी। मैंने उसे कसकर पकड़ा।
"और नाम?" मैंने पूछा। "वो क्यों लिख रहे हैं?"
"रफ़ीक़," टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो ठंडक आ गई जो बारह साल के बच्चे में नहीं होनी चाहिए, "अगर किसी का नाम लिखा जाए, तो वो पहले से डर जाता है। और डरा हुआ आदमी सभा में आता ही नहीं।"
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। उसके कंधे अब भी छोटे थे, पर उसकी आवाज़ आज किसी और की थी।
"सही बोला," मैंने कहा। "चलो, अब मैं तुम्हें बताता हूँ क्या करना है।"
हम मैदान में लौटे और मैंने सबको बुलाया — काजल, माँ, पापा, मीरा, शालिनी, रफ़ीक़, टिंकू, सानिया और गुड्डू और चिंटू। चिंटू अपनी चप्पल से खेल रहा था और जब उसने मेरा चेहरा देखा तो चप्पल पकड़कर सीधा बैठ गया।
"अच्छा सुनो," मैंने कहा। "आज शाम सात बजे जो होगा, वो इस मैदान में होगा। मैं नहीं छिपूँगा, न ही भागूँगा। पर एक बात — आज किसी को अकेले नहीं जाना है। कोई बच्चा अकेले पानी भरने नहीं जाएगा, कोई औरत अकेले चूल्हे पर नहीं बैठेगी, कोई बूढ़ा अकेले गेट पर नहीं खड़ा रहेगा। हम सब आज एक दीवार हैं। समझे?"
"समझे," सबने कहा, और सानिया ने चिंटू को कोहनी मारी ताकि वो भी बोले।
"अच्छा," मैंने कहा। "तो अब काम बाँटते हैं।"
और यहीं से वो सुबह शुरू हुई जो मैं कभी नहीं भूलूँगा।
टिंकू ने दीयों की गिनती शुरू कर दी — उसके पास एक छोटी कॉपी थी जिस पर उसने कोयले से लिखा था "दीये — कुल कितने।" उसने सानिया को दीयों की ज़िम्मेदारी दी और गुड्डू को तेल की, और चिंटू को बत्तियों की, और रफ़ीक़ को — जैसा हमेशा से था — पहरा।
पर सानिया और टिंकू का झगड़ा दीयों पर शुरू हो गया। सानिया चाहती थी कि दीये दो हिस्सों में बराबर बँटें, और टिंकू का कहना था कि एक दीया बड़ा हो और वो जो बड़ा होगा वो उसका होगा।
"तू समझ नहीं रही," टिंकू ने कहा, उसकी आवाज़ में वो बड़प्पन आ गया जो सिर्फ़ बारह साल के बच्चे में हो सकता है। "मैं पाँच बच्चों का मुखिया हूँ। मुखिया होने के नाते मेरा एक ही हक़ है — मैं सबसे बड़ा दीया जलाऊँगा।"
"अच्छा?" सानिया ने कहा, और उसने बाल पीछे किए। "और तू किस नाते मुखिया है? तूने थोड़े ही किसी को बचाया था।"
"मैंने उस्ताद की जासूसी किट संभाली थी।"
"तूने वो किट खो दी थी।"
"नहीं खोई थी। मैंने उसे दुकान के पीछे वाले कमरे में उस्ताद के पैर के नीचे रखा था ताकि उस्ताद को आराम मिले। उसे खोना नहीं कहते। उसे पहुँचाना कहते हैं।"
मैं दूर खड़ा हूँ, हँस रहा हूँ। और यह जानते हुए भी कि आज शाम क्या होगा, उस हँसी में मुझे कोई झूठ नहीं लगा।
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