The Mysterious Bell – Chapter 1426
"घंटी की आवाज़ तार से नहीं चलती," उन्होंने कहा। "वो हवा से चलती है। और हवा आज भी है।"
सानिया ने मेरी जेब की तरफ़ देखा। उसकी आँखें बड़ी थीं।
"और रफ़ीक़ ने —" उसने जल्दी से कहा, "— रफ़ीक़ ने जीप का नंबर लिख लिया है।"
"नंबर? कैसे? उसने पढ़ा?"
"नहीं, भैया। उसने आकृतियाँ बनाई हैं।" सानिया ने अपनी जेब से एक मुड़ा काग़ज़ निकाला और मेरी हथेली पर रख दिया। "वो कहता है — जब पढ़ना नहीं आता, तो शक्लें याद रखो।"
मैंने काग़ज़ खोला।
उस पर पेंसिल से चार आकृतियाँ बनी थीं — एक गोल, जैसे सूरज; एक सीधी लकीर जैसे दंड; एक कोने वाला, जैसे पहाड़; और आख़िरी में दो गोले जुड़े हुए, जैसे चश्मा। उनके नीचे रफ़ीक़ की टेढ़ी लिखाई में लिखा था — "यही क्रम। दो बार।"
मैंने काग़ज़ मोड़कर जेब में रखा। काजल ने कहा, "इससे क्या होगा?"
"कुछ नहीं," मैंने कहा। "अभी कुछ नहीं। पर अगर आज कुछ उलटा हुआ, तो ये चार आकृतियाँ उस जीप तक ले जाएँगी। और जीप किसी की होगी, वो किसी का होगा।"
तभी मेरी जेब से घंटी बजी।
धीमे से। एक बार। फिर उसने कहा —
"तार कटे। घंटी नहीं।"
मैंने आँख बंद की। मैंने साँस ली।
"चलो," मैंने कहा।
मैदान।
पुराने नूर अस्पताल के पीछे का खुला मैदान — वही, जहाँ एक हफ़्ते पहले रणवीर का मंच बना था, जहाँ तालियाँ बजी थीं, जहाँ मैं हारा था। आज वहाँ मंच नहीं था। सफ़ेद तंबू नहीं था। कुर्सियाँ नहीं थीं। बैनर नहीं थे।
सिर्फ़ एक माइक का स्टैंड खड़ा था।
खाली। बीच मैदान में। अकेला।
और उसके पीछे, एक पुराने खंभे से रस्सी से बँधी हुई — एक साइकिल।
मैं रुक गया।
वो काली साइकिल थी। ज़ंग लगी, पुरानी, हैंडल पर खाली पीतल का ब्रैकेट — जैसे किसी ने घंटी उतार ली हो। सीट फटी थी। पहिया मुड़ा था। और रस्सी उसे खंभे से ऐसे बाँधे हुए थी जैसे कोई जानवर बाँधा जाता है।
और साइकिल के पास, ज़मीन पर, पाँव फैलाकर, पीठ खंभे से टिकाकर — पापा बैठे थे।
मैंने उन्हें दूर से देखा। गोद में लकड़ी का डिब्बा था — वही, चूल्हे के पीछे वाला, जिसे वो कल रात खोलकर अनकही बात बताने वाले थे और फिर बीच में रुक गए थे। उनका एक हाथ डिब्बे पर था और दूसरा ज़मीन पर, जैसे वो गिरने से बचा रहे हों।
उनके बिना चश्मे के चेहरे पर मैंने पहली बार देखा — उम्र। पचपन साल की उम्र, जो चश्मे के पीछे छिपी रहती थी, आज खुली थी। आँखें सिकुड़ी हुई, भौंहें ऊपर, और होंठ — होंठ काँप रहे थे।
मैं दौड़ा।
माँ और काजल मेरे पीछे थीं, पर मैं आगे निकल गया। मेरी चप्पलें ज़मीन पर पटक रही थीं और मेरे कानों में सिर्फ़ मेरी साँस थी।
मैं उनके सामने घुटनों के बल बैठ गया।
"पापा।"
उन्होंने सिर उठाया। मुझे देखा। पर वो मुझे ठीक से नहीं देख पा रहे थे — आँखें कमज़ोर थीं, और मैं बहुत पास नहीं था।
मैंने कुछ नहीं कहा।
मैंने बस अपनी जेब से वो चश्मा निकाला — जो दरवाज़े पर टेप से बँधा था — और धीरे से उनके चेहरे पर लगा दिया। एक कान पर, फिर दूसरे कान पर। टेप खुली हुई थी, इसलिए मैंने उसे उँगली से दबाकर चिपका दिया, जैसे वो खुद करते हैं।
वो मेरी तरफ़ देखने लगे।
और पहली बार, बाईस साल में पहली बार, उन्होंने मेरी आँखों में सीधे देखा। बिना हटे, बिना झुके, बिना किसी बहाने के।
"तुम आ गए," उन्होंने कहा।
"आप चले गए थे," मैंने कहा।
"हाँ।" उन्होंने सिर हिलाया। "गलती की। मुझे तुझे जगाना चाहिए था। पर मुझे डर था कि अगर मैं तुझे जगाऊँगा, तो तू मुझे रोकेगा। और मुझे रुकना नहीं था।" उन्होंने डिब्बे पर हाथ कसा। "बाईस साल रुका। आज नहीं रुकूँगा।"
"पापा —"
"आज मैं चुप नहीं रहूँगा।" उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो कंप नहीं थी जो कल रात थी। वो बस थकी हुई थी, और साफ़ थी। "आज मेरी बारी है। मैंने बाईस साल सोचा कि चुप रहकर मैं तुम सबको बचा रहा हूँ। पर सच ये है — चुप रहकर मैंने सिर्फ़ उसको बचाया। उसे। और तुम सबको डराया।"
मैं कुछ नहीं बोला। मेरे गले में कुछ फँसा हुआ था।
तभी माँ आई।
वो धीरे चलकर आई। कोई दौड़ नहीं। कोई शोर नहीं। वो सीधे पापा के पास आई और उनके बगल में, ज़मीन पर, उसी तरह बैठ गई जैसे वो बैठे थे — पाँव फैलाकर, पीठ खंभे से टिकाकर। किसी ने कुछ नहीं कहा। उन्होंने पापा का हाथ नहीं पकड़ा, गले नहीं लगाया, कुछ नहीं। बस बैठ गईं।
और फिर उन्होंने पापा के कंधे पर हाथ रखा।
बस इतना।
पापा ने उनकी तरफ़ देखा। माँ ने उनकी तरफ़ नहीं देखा — वो सामने माइक के स्टैंड को देख रही थीं।
"तुम्हें पता था," पापा ने कहा। सवाल नहीं, बस कहना।
"पता था," माँ ने कहा।
"और तुम चुप रहीं।"
"तुम चुप रहे। मैं तुम्हारे साथ चुप रही।" उन्होंने कहा। "ये मेरी गलती थी। मैंने सोचा कि अगर मैं बोलूँगी तो घर टूट जाएगा। पर घर तो टूट ही गया — बस टूटकर भी खड़ा रहा, जो सबसे बुरा होता है।"
काजल भी आ गई और वो भी बैठ गई। मेरे पीछे।
हम चारों वहाँ बैठे रहे।
कितनी देर, मुझे नहीं पता। शायद दस मिनट। शायद आधा घंटा। मैदान खाली था, सूरज क्षितिज पर चढ़ रहा था, और साइकिल की परछाईं हम तक आ रही थी — लंबी, टेढ़ी, खंभे से बँधी हुई।
किसी ने कुछ नहीं कहा।
ये सभा से पहले की सभा थी। बिना शब्दों वाली। बिना माइक वाली। बिना काग़ज़ वाली। हम चारों बस वहाँ बैठे थे — और मुझे लगा कि यही वो चीज़ है जो रणवीर बीस साल से तोड़ रहा था और हम बीस साल से बचा रहे थे, पर कभी एक साथ नहीं बैठे थे।
तभी मेरी जेब में घंटी हल्की गुनगुनाई।
दो शब्दों में।
"देखो। पीछे।"
मैंने पीछे देखा।
मैदान के किनारे, दूर, धूल में कुछ चमक रहा था। कोई खड़ा था — सफ़ेद कपड़े में। हमारी तरफ़ नहीं देख रहा था। माइक की तरफ़ भी नहीं। वो बस खड़ा था, और उसके हाथ में कोई काग़ज़ था जो हवा में हिल रहा था।
फिर वो मुड़ा और गायब हो गया — पीछे के प्लॉट की ओर।
"कौन था?" काजल ने पूछा।
"पता नहीं," मैंने कहा। और मैंने झूठ नहीं बोला — मुझे सच में पता नहीं था। पर मुझे यह भी पता था कि वो कौन नहीं था। वो सफ़ेद कुर्ते-काली अंगूठी वाला नहीं था। उसकी चाल जवान थी।
मैं उठा। अपने घुटनों से धूल झाड़ी।
"पापा।" मैंने हाथ बढ़ाया। "अब अंदर। चलिए।"
उन्होंने मेरा हाथ नहीं पकड़ा। उन्होंने कहा, "डिब्बा।"
"क्या?"
"ये डिब्बा मैंने आज सुबह नहीं खोला।" उन्होंने कहा। "इसे मैंने कल रात खोलकर बंद कर दिया था। पर अब लगता है अंदर कुछ बदल गया है।"
मैंने डिब्बे की तरफ़ देखा।
पुराना लकड़ी का डिब्बा। धूल भरी परत। ज़ंग लगी कीलें। बस।
"कैसे पता?" मैंने पूछा।
"वज़न," उन्होंने कहा। "कल रात भारी था। आज सुबह हल्का है।"
मैं एक पल रुक गया। फिर मैंने झुककर डिब्बा उठाया — हल्का था, सच में हल्का, जैसे अंदर सिर्फ़ हवा हो।
मेरी जेब से घंटी बजी। एक बार।
"न खोलो। नहीं तो सब खुल जाएगा।"
मैंने डिब्बा वापस पापा की गोद में रख दिया।
"अभी नहीं," मैंने कहा। "सभा में।"
पापा ने सिर हिलाया।
तभी मैदान के मुँह से आवाज़ आई — पैरों की, तेज़, हाँफती हुई। मैं मुड़ा।
टिंकू था।
वो भागता हुआ आ रहा था, और मैंने देखा कि उसके चेहरे पर सिर्फ़ पसीना नहीं था — डर था। वो सीधे मेरे पास आया और उसने मेरी कमीज़ पकड़ ली, जैसे अगर उसने नहीं पकड़ा तो वो गिर पड़ेगा।
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