The Mysterious Bell1425 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 1425

7 min read November 5, 2026

घंटी की आवाज़ गली में फैली, और मुझे लगा कि आज ये आवाज़ किसी और तरह से लौटेगी। पर वो लौटी — वैसी ही साफ़, वैसी ही तेज़, जैसे गली को याद दिला रही हो कि अभी सब खत्म नहीं हुआ।

काजल दरवाज़े पर खड़ी थी। ओढ़नी कंधों पर थी, बाल ठीक कर रही थी और हाथ में एक छोटा थैला था — जिसमें, मुझे बाद में पता चला, पानी की बोतल, दो रोटियाँ और माँ की दवा थी। उसने मेरी तरफ़ देखा, मेरे चेहरे पर पापा का चश्मा देखा, और एक पल को उसकी आँख भर आई। फिर उसने होंठ कसे और कहा —

"बड़ा दिख रहा है।"

"बड़ा हूँ," मैंने कहा। "आज और बड़ा हो जाऊँगा।"

वो हँसी नहीं। वो सिर्फ़ मेरे पास आई और उसने चश्मे का एक किनारा उँगली से ऊपर किया, जैसे पापा करते थे — कान पर टेप से बँधा हुआ, एक तरफ़ झुका हुआ। उसने कहा —

"पापा इसको दिन में दस बार सीधा करते हैं। उँगली से। बिना बोले।"

मैंने सिर हिलाया। गला भारी था, पर आवाज़ ठीक रखी।

पीछे आँगन से चारपाई की आवाज़ आई। मैं मुड़ा।

माँ उठ रही थीं। धीरे-धीरे। एक हाथ चारपाई पर, दूसरा दीवार पर। उनकी साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा हुआ था, माथे पर चंदन का टीका था — वही, जो वो हर सुबह लगाती हैं, चाहे बुखार हो या न हो। काजल दौड़कर गई, पर माँ ने हाथ उठाकर उसे रोक दिया।

"मैं गिर नहीं रही," उन्होंने कहा। "मैं उठ रही हूँ।"

"माँ —" मैंने कहा।

"सुन लिया मैंने सब।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "तेरे पापा चले गए। अकेले। उन्हें लगा कि अगर वो पहले चले जाएँगे तो हम पीछे नहीं रुकेंगे।"

"आप —"

"आज मैं भी चलूँगी।" उन्होंने बात काट दी। आवाज़ में वो कड़क थी जो बहुत साल से नहीं सुनी थी। "अब घर में बैठने का वक़्त नहीं है। बाईस साल बैठ गई। अब मेरी चारपाई मेरा घर नहीं है।"

काजल ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने सिर हिलाया।

माँ ने अपनी साड़ी ठीक की, पैरों में चप्पल पहनी, और चलने लगीं। पहला कदम लड़खड़ाया। दूसरा ठीक। तीसरा — पक्का।

फिर वो रुकीं और पीछे मुड़कर आँगन में देखा। चूल्हे की तरफ़, जो आज नहीं जला था। चूल्हे के पीछे वाले दरवाज़े की तरफ़, जिस पर वो ज़ंग लगा कुंडा अब भी था।

"एक मिनट," उन्होंने कहा।

वो वापस गईं, दरवाज़े के पास झुकीं, और कुछ उठाया — एक मिट्टी का छोटा दीया, जो कल से वहीं रखा था, बिना तेल, बिना बत्ती। उन्होंने उसे अपनी थैली में रखा और बिना कुछ कहे बाहर आ गईं।

हम तीनों दरवाज़े पर खड़े थे। और मैंने आख़िरी बार पीछे देखा।

पापा की चारपाई। उनका सिरहाना। एक तरफ़ उनकी रजाई सिकुड़ी हुई थी और तकिये पर एक गड्ढा था, जैसे किसी ने उसे बहुत देर तक दोनों हाथों से दबाया हो, फिर उठ गया हो।

मैंने दरवाज़ा बंद किया। कुंडा लगाया। अपनी कॉपी, पापा की मोटी कॉपी, बगल में दबाई और बाहर निकल आया।

गली में सन्नाटा था।

ऐसा सन्नाटा नहीं जो सुबह होता है — वो सन्नाटा जिसमें चिड़िया चहकती है, कुत्ते जम्हाई लेते हैं, और कोई दूर से बाल्टी पटकता है। ये सन्नाटा दूसरा था। इसमें सिर्फ़ एक आवाज़ थी — मेरी चप्पल। और उसके पीछे माँ की चप्पल, और उसके पीछे काजल की।

शबनम आपा की गुमटी का शटर आधा गिरा था। चूल्हा बंद। बाहर की बेंच खाली। बेंच पर सिर्फ़ एक कटोरी रखी थी, उलटी — जैसे किसी ने कह दिया हो, आज चाय नहीं।

आगे उस्ताद अली बक्श की दुकान का शटर भी आधा गिरा था, पर शटर के नीचे से पीली रोशनी की एक पतली लकीर आ रही थी। मैं रुका। झुका। शटर के नीचे से अंदर देखा।

उस्ताद अंदर बैठे थे। सिलाई मशीन पर सफ़ेद कपड़ा चढ़ा हुआ था, और वो नीले धागे से आख़िरी अक्षर सी रहे थे। मैंने देखा — बैनर का आख़िरी शब्द था — "चौपाल"। उन्होंने ऊपर देखा, मुझे देखा, और बिना रुके सिलाई करते रहे। बस एक बार उन्होंने कहा —

"जाओ। मैं पीछे से आता हूँ। मशीन को अकेला नहीं छोड़ सकता, वरना ये बैनर अधूरा रह जाएगा।"

"उस्ताद —"

"अंकुश।" उन्होंने सुई रोकी। "पचास साल में मैंने बहुत कुछ अधूरा छोड़ा है। आज नहीं छोड़ूँगा। तुम जाओ।"

मैं उठा। आगे बढ़ा।

गली के दोनों तरफ़ खिड़कियाँ थीं, और हर खिड़की के पीछे कोई था। मैंने देखा — भोला भाई की बीवी परदे के पीछे से झाँक रही थी, फिर परदा खिसका दिया। नसीमा बाई की राशन दुकान का शटर आधा था और उसके नीचे से एक बच्चे की आँख दिख रही थी — साजिद। वो मुझे देख रहा था, और जैसे ही मेरी नज़र पड़ी, वो पीछे हट गया।

कोई बाहर नहीं आ रहा था। कोई गले नहीं लगा रहा था। कोई "अंकुश बेटा, चाय पी ले" नहीं कह रहा था।

यही सबसे डरावना था।

काजल ने धीरे से कहा, "भाई, सब —"

"सब डरे हुए हैं," मैंने कहा। "और डरना गलत भी नहीं है। कल रात कोई भी सो नहीं पाया होगा। हर घर में कोई न कोई काग़ज़ पढ़ रहा होगा, जिस पर उनका नाम है।"

"तो फिर —"

"तो फिर हमें चलना है। डर का इलाज चलना है, बैठना नहीं।"

माँ कुछ नहीं बोलीं। वो बस चल रही थीं — धीरे, पर सीधी।

चौक पर पहुँचे तो दुबे अंकल मिले।

वो थाने के बाहर नहीं, थाने के सामने सड़क के बीच खड़े थे। नीली शर्ट, आस्तीन चढ़ी हुई, हाथ पीछे बँधे। उनकी कुर्सी उनके पीछे खाली पड़ी थी, और कुर्सी के पैर के नीचे वो पुरानी ईंट अब भी रखी थी।

उन्होंने हमें आते देखा। कोई हैरानी नहीं दिखाई। कोई सवाल नहीं पूछा। बस इतना कहा —

"सीधे मैदान की तरफ़ जाओ।"

"अंकल —"

"मोड़ से आगे जो नुक्कड़ आता है, वहाँ से दिख जाएगा।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और उनकी आँख मेरे चेहरे पर पड़े चश्मे पर रुकी। वो एक पल चुप रहे। फिर उन्होंने धीरे से कहा — "ये उन्हीं का है।"

"हाँ।"

"तो ठीक है।" उन्होंने सिर हिलाया। "जिस आदमी का चश्मा बेटे ने पहन लिया, वो आदमी आज बोलेगा। मैं जानता हूँ।" फिर उन्होंने आवाज़ धीमी की। "दरोगा से आज मत उलझना। वो सुबह से दफ़्तर में बैठा है और काग़ज़ों में उलझा है, क्योंकि उसके ऊपर से भी किसी ने काग़ज़ भिजवाया है।"

"किसने?"

"मैं नहीं जानता। पर मैं इतना जानता हूँ कि जब ऊपर वाले अपने ही आदमियों को काग़ज़ भेजने लगें, तो नीचे वाले को सच बोलने का मौक़ा मिल जाता है।" उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा — मज़बूत, भारी — और कहा, "जाओ।"

हम आगे बढ़े।

नुक्कड़ के पास पहुँचे ही थे कि सानिया दौड़ी आई।

वो हाँफ रही थी। चप्पल एक पैर में थी, दूसरी हाथ में। बाल खुले। उसने सीधे मेरा हाथ पकड़ा और कहा —

"भैया — भैया, सुबह — सुबह छह बजे —"

"साँस ले, सानिया।"

"दो सफ़ेद कुर्ते वाले!" उसने कहा। "अस्पताल की छत पर। दोनों चढ़े थे। मैं नल पर पानी लेने गई थी, तो छत पर हिलता कुछ दिखा। फिर मैंने गुड्डू को बुलाया। दोनों ने तार काटे। लंबे तार। बिजली के।"

मेरा पेट ठंडा हो गया।

"कौन से तार?"

"पीछे वाले। जो अस्पताल के पीछे वाले खंभे से जाते हैं। उन्होंने काटकर —" वो रुकी, साँस ली, "— काटकर तार को मोड़ दिया। और फिर वो उतरे और सीधे जीप में बैठकर चले गए।"

"तार क्यों काटे?" काजल ने पूछा।

मैंने जवाब दिया, और जवाब देते वक़्त मेरी आवाज़ अपनी नहीं लगी — "क्योंकि आज सभा में बिजली जानी है। और बिजली जाने पर माइक बंद हो जाएगा। और माइक बंद होने पर —"

"पापा की आवाज़ नहीं आएगी," काजल ने पूरा किया।

माँ ने पहली बार कुछ कहा। "तो घंटी किसलिए है?"

हम सब उनकी तरफ़ देखने लगे।

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