The Mysterious Bell – Chapter 1424
"और ये," उसने कहा, "सारी गवाहियाँ हैं जो हमने अब तक इकट्ठी कीं — डॉक्टर इसरानी की, रेहाना की, भोला भाई की, रमेश भाई की, नसीमा बाई की, बूढ़े काका की, और…" — उसने मेरी तरफ़ देखा — "गोविंद भाई की। वो आज शाम लौट आए थे। मैंने उनका बयान दर्ज कर लिया।"
मैं चौंक गया।
"गोविंद भाई लौट आए?"
"लौट आए," शालिनी ने कहा। "और मैंने उन्हें कहीं जाने नहीं दिया। अभी स्कूल की कोठरी में बैठे हैं, चाय पी रहे हैं।"
उस्ताद ने काग़ज़ फैलाए।
"अब सुनो," उन्होंने कहा। "अभी से सुबह सात बजे तक हमें व्यवस्था करनी है। रणवीर की योजना बड़ी है, पर हमारी योजना साफ़ होनी चाहिए। हर काग़ज़ का एक नाम होगा। हर नाम का एक बोलने वाला। और हर बोलने वाले के पीछे एक गवाह।"
मैंने आगे झुककर देखा। उस रात उस्ताद ने ऐसी सूची बनाई जो मैंने कभी नहीं सोची थी।
पहली लाइन पर लिखा था — सात अंगूठों वाला शर्तनामा, और उसके नीचे नामों की सूची।
फिर — भारद्वाज ट्रस्ट का झूठा दस्तावेज़।
फिर — स्कूल की छत की झूठी रिपोर्ट और शालिनी के पापा की कंपनी।
फिर — गिरवी साइकिल, जिस पर कल मंच पर बोला जाना था।
फिर — पुराने बिजलीघर के बक्से और उसकी राख।
फिर — तीन काग़ज़ जो कटे, जिनमें से एक सातवाँ काग़ज़ था।
फिर — और फिर आठवाँ नाम।
"उस्ताद," मैंने कहा। "इतना सब एक दिन में?"
"इतना सब एक दिन में नहीं," उस्ताद ने कहा और उन्होंने चश्मा ऊपर किया। "हर काग़ज़ किसी का हिस्सा है, अंकुश। जब एक बोलेगा, दूसरा खुद आगे आएगा। सच ऐसा होता है — वो शर्मिंदा करता है, पर अकेले में। सबके सामने वो सबको साहस देता है।"
शालिनी ने एक और पन्ना निकाला।
"मेरे पास एक और बात है," उसने कहा। "मेरे पापा की गोदाम वाली रसीद — जिसमें मरम्मत का झूठ बताया गया था। मैंने उसे कल सुबह पेश करने का मन बना लिया है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"तुम्हारे पापा?"
"उनसे बात कर ली," शालिनी ने कहा, और उसकी आवाज़ साफ़ थी, पर उसमें दर्द छुपा था। "उन्होंने कहा कि वो कल बोलेंगे। और मैंने कहा कि मैं उनके साथ बैठूँगी।"
मैंने सिर हिलाया।
तभी टिंकू दौड़ता हुआ आया। उसके हाथ में एक मोटी रस्सी थी और कंधे पर एक बड़ा थैला।
"दीये तैयार हैं," वो हाँफते हुए बोला। "सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू ने पानी की बोतलें भर लीं। शबनम आपा ने कहा — रोटियाँ तैयार हैं, गुड़ और अचार भी है।"
"कितने लोग?" मैंने पूछा।
"अभी तक गिनती है — बयालीस।"
मैं रुक गया।
"बयालीस?"
"और बढ़ रहे हैं," टिंकू ने कहा। "बच्चों ने घर-घर खबर भेजी है कि कल सुबह सूरज निकलने से पहले पीपल पर कोई नहीं सोएगा। जो आना चाहे आए। चाय शबनम आपा की।"
मैंने काजल की तरफ़ देखा। वो मुस्कुरा रही थी, पहली बार उस रात।
"अंकुश भैया," टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ ज़रा धीमी हो गई। "एक बात है।"
"क्या?"
उसने थैला नीचे रखा और भीतर से एक मुड़ा काग़ज़ निकाला। वो मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"ये मुझे स्कूल के पीछे मिला," उसने कहा। "पत्थर के नीचे दबा था।"
मैंने उसे खोला। नीली स्याही में लिखा था, यही दो लकीर-बिंदु निशान, और नीचे एक लाइन —
"जो औरत घंटी लौटाने आई थी, वो अब भी उसी वार्ड में है। उसका नाम किसी काग़ज़ पर नहीं है।"
मैंने घंटी जेब से निकाली। ठंडी थी।
"कौन?" मैंने पूछा।
घंटी चुप रही। एक सेकंड, दो सेकंड।
फिर उसने धीमे से कहा —
"जो नाम नहीं, निशान है।"
मैंने काग़ज़ पापा को दिया। उन्होंने पढ़ा और उनका चेहरा पीला पड़ गया।
"ये…" उन्होंने धीमे से कहा। "ये वो औरत है, अंकुश। उस रात वार्ड में जो खड़ी थी। जिसने मुझे घंटी दी और कहा था कि तेरे बेटे को दे देना। पर तब मैं तुझे ये देने लायक नहीं था।"
"अब कहाँ है वो?"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
"कल जो बोलेगा," उन्होंने कहा, "उसका पहला नाम मैं हूँ। पर शायद — शायद दूसरा नाम वो है।"
माँ ने तभी हमारे बीच थाली रख दी। रोटियाँ, गुड़, प्याज़, और एक छोटा कटोरा अचार का।
"पहले खाओ," उन्होंने कहा। "कल बहस करना।"
उस रात पूरी गली नहीं सोई। पर सोने की देर सबको एक जैसी लगी।
टिंकू और बच्चों ने पीपल के नीचे दीये जलाए — बयालीस दीये, एक-एक करके। मीरा ने कैमरों की बैटरी चेक की। शालिनी करीब दो बजे तक फाइलों के पन्नों पर नंबर डालती रही। उस्ताद ने अपनी मशीन के पास बैठकर कुछ सीला — मुझे बाद में पता चला कि वो एक बैनर था, सफ़ेद कपड़े पर नीले धागे से लिखा — "सच की चौपाल"। शबनम आपा ने रात भर के लिए एक बड़ी देगची में खिचड़ी बनाई और कहा कि आज कोई भूखा नहीं सोएगा।
मैं अपने कमरे में आया। कुर्सी पर बैठा। कॉपी — पापा वाली कॉपी — खोली।
वही पहला पन्ना। वही लाइन। फिर आगे पलटा।
दूसरे पन्ने पर लिखा था — "अगर मैं लौटा, तो तुझे साइकिल सिखाऊँगा। अगर नहीं लौटा, तो याद रख — तेरा बाप डरा हुआ था, पर तेरे लिए रुका।"
मैंने कॉपी बंद कर दी। फिर मैंने घंटी जेब से निकाली और उसे अपने माथे से लगाया।
"कल," मैंने कहा। "कल हम दोनों को साथ खड़ा होना है।"
घंटी सिर्फ़ एक बार हल्की गुनगुनाई। कुछ कहा नहीं।
मैं चारपाई पर लेटा। आँख बंद की। नींद आई, पर वो गहरी नहीं थी — वो हल्की, डरती हुई नींद थी जिसमें हर आवाज़ आपको जगा देती है।
फिर सुबह।
आँख खुली — बाहर अभी रोशनी भी नहीं थी। सिर्फ़ एक धुँधला नीला आसमान खिड़की से दिख रहा था। मुर्गे की आवाज़ भी नहीं आई थी।
मैं उठा। चारपाई से पैर नीचे रखे। कमरे में ठंड थी।
फिर मैंने बगल में देखा।
पापा का बिस्तर खाली था।
चादर बिछी थी, तकिया ठीक जगह था — पर उस पर कोई नहीं था।
मैंने जल्दी से कमरा देखा। दूसरे कोने में काजल सो रही थी। माँ की चारपाई भी खाली थी।
मेरा दिल एक झटके में तेज़ धड़का।
मैं दौड़कर बाहर आया। आँगन खाली था। चूल्हे के पास कोई नहीं था। दरवाज़े का कुंडा — बाहर से।
मैंने दरवाज़ा खोला।
और मैं वहीं रुक गया।
दरवाज़े के बाहर लोहे के कुंडे से एक काग़ज़ टेप से बँधा था।
और टेप से ही — काँपते हाथ से — पापा का चश्मा उस काग़ज़ के साथ चिपका हुआ था। वही चश्मा जिसे कल रात उन्होंने अपने सामने मेज़ पर रखा था।
काग़ज़ पीला था। उस पर पेंसिल से लिखा था —
"मैं पहले मैदान जा रहा हूँ। तू अपनी घंटी लेकर आ।"
मैंने चश्मा निकाला। मेरे हाथ काँप रहे थे। मैंने चश्मा पहना — मेरे चेहरे पर बहुत बड़ा था, पर मैंने उतारा नहीं।
और ठीक उसी पल, मेरी जेब से घंटी बजी।
कुछ नहीं कहा।
बस बजी।
और मैं समझ गया कि पापा ने वही किया जो वो करना चाहते थे।
वो बाईस साल चुप रहे। अब वो चुप नहीं रहना चाहते थे।
मैंने साँस ली। फिर मैंने पीछे मुड़कर देखा — काजल दरवाज़े पर खड़ी थी, उसके हाथ में ओढ़नी थी।
"वो गए?" उसने पूछा।
"गए," मैंने कहा।
वो एक पल को रुकी। फिर उसने अपनी ओढ़नी कंधों पर ठीक की।
"तो चल," उसने कहा। "हमें भी पहुँचना है।"
मैंने पीछे आँगन में देखा। माँ वहीं चारपाई पर बैठी थीं — चुप, पर उनके चेहरे पर डर नहीं था। उन्होंने मुझे देखा और कहा —
"मैंने कहा था ना। अब रोने का वक़्त नहीं।"
मैंने सिर हिलाया।
फिर मैंने आसमान की तरफ़ देखा — पहली लकीर लाल निकल रही थी।
और मैंने घंटी को जेब से निकाला और उसे एक बार ज़ोर से बजाया।
साफ़, तेज़, पूरी गली की आवाज़।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno