The Mysterious Bell – Chapter 1423
काजल ने मुझे देखा, फिर पापा को। वो कुछ कहने को हुई, पर मैंने सिर हिला दिया — रुक जा।
"पर तुम गए नहीं," मैंने कहा। "तुम गए नहीं।"
"नहीं," पापा ने कहा। "क्योंकि उसी रात… साइकिल गायब होने से ठीक पहले… मैंने तुझे देखा था। तू उस वक़्त नौ साल का था। तू सो रहा था, और तेरा हाथ काजल के सिर पर था। जैसे तू उसे बचा रहा हो। और तेरी माँ दरवाज़े पर खड़ी थी, और उसकी आँखों में वो सवाल था जो उसने कभी ज़ोर से नहीं पूछा — कि मैं जाऊँ या रुकूँ?"
वो रुके। उनका गला भर आया।
"मैं रुक गया," उन्होंने कहा। "पर पूरा नहीं रुका। जिस आदमी ने तेरे बाप को डरा दिया था, उसने मुझे रुकने नहीं दिया। मैं रोज़ उस अंगूठे के नीचे जाता रहा। रोज़ उस काग़ज़ में एक और लाइन जुड़ती गई। और तू देखता रहा कि तेरा बाप चुप है। तूने सोचा कि मैं कमज़ोर हूँ।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"मुझे मालूम है तूने सोचा। मैं तेरी आँखों में देखता था, रोज़।"
मुझे कुछ कहने की ज़रूरत नहीं थी। मैं उठा। कुर्सी पीछे खिसकी, और उसकी आवाज़ इस छोटे कमरे में चीख जैसी लगी।
"नौ साल का," मैंने कहा। और मेरी आवाज़ मेरे कान में ही अजनबी लगी। "मैं नौ साल का था, पापा। मैंने तुम्हें हर रविवार देखा — चश्मा पोंछते, औज़ार साफ़ करते, और कभी कुछ नहीं कहते। मैंने सोचा कि तुम्हारे पास कहने को कुछ नहीं है।"
"मेरे पास बहुत कुछ था," पापा ने कहा।
"तो क्यों नहीं बोले?" मेरी आवाज़ तेज़ हो गई। "मैं तेरा बेटा हूँ। मैं तेरा दुश्मन नहीं था। काजल तेरी बेटी है, तूने उसे क्या सिखाया? चुप रहना? हम दोनों यही सीखते रहे — कि घर में बड़ी बात हो तो बोलना नहीं।"
काजल ने मेरा हाथ पकड़ लिया।
"अंकुश," वो धीरे बोली।
"नहीं," मैंने कहा। "छोड़।"
मैंने हाथ खींच लिया। फिर दरवाज़े की तरफ़ चलने लगा। बाहर रात थी, गली में हल्की चहल थी — शबनम आपा की गुमटी से आती खड़खड़ाहट, किसी के पैरों की आवाज़।
मैंने दरवाज़ा नहीं खोला।
मैं रुक गया।
क्योंकि मेरे भीतर कुछ था जो मुझसे कह रहा था — रुक जा, अंकुश। ये वही चीज़ है जिसका तू बाईस साल इंतज़ार कर रहा था। अब मिल रही है तो भाग क्यों रहा है?
मैं धीरे से मुड़ा।
पापा वहीं बैठे थे। हिले नहीं। उनकी आँखों में उस वक़्त कुछ ऐसा था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा — डर नहीं, शर्म नहीं। वो कुछ और था। वो देख रहे थे कि उनका बेटा उनसे दूर जा रहा है और इस बार उनके पास छिपने की जगह नहीं थी।
मैं वापस आया। उनके सामने कुर्सी खींची। धीरे से बैठा।
मेरी आवाज़ धीमी हो गई। बहुत धीमी।
"पापा," मैंने कहा। "मुझे तेरे उस अंगूठे से शिकायत नहीं है।"
वो चौंके।
"मुझे मालूम है तू डरा हुआ था। माँ बीमार थी। रणवीर तेरे पीछे था। तूने अंगूठा लगाया, ठीक है, गलती थी, पर वो डर था। डर से ऐसा हो जाता है।"
मैंने साँस ली।
"मुझे तेरी चुप्पी से शिकायत है," मैंने कहा। "बाईस साल की चुप्पी। इतनी लंबी कि मुझे लगा कि तेरे पास मेरे लिए वक़्त नहीं है। कि मैं तेरे लिए बोझ हूँ। कि तेरा चेहरा इसलिए ऐसा है जैसे कुछ टूट गया हो मुझे देखकर।"
मेरी आवाज़ टूटी।
"मैंने सोचा था कि तूने मुझे अफ़सोस से देखा है।"
पापा ने अपना चश्मा उतारा। धीरे से मेज़ पर रखा। फिर अपना सिर झुकाया और दोनों हाथों से अपना चेहरा छिपा लिया।
"अंकुश," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ किसी और की लग रही थी — पुरानी, टूटी, बच्चों जैसी। "तू मेरे लिए बोझ नहीं था। तू मेरा सबूत था। मैं जब भी उस काग़ज़ के पास जाता, मुझे तेरा चेहरा दिखता और मुझे लगता — शंकर, तू झूठ नहीं बोल सकता, पर सच भी नहीं बोल सकता। इसलिए मैं चुप रहा। और यही सबसे बड़ी ग़लती थी।"
माँ उठीं। वो हमारे बीच आईं और उन्होंने अपनी दोनों हथेलियाँ मेज़ पर रख दी, जैसे कोई ताक़त चाहती हों।
"बहुत हुआ," उन्होंने कहा।
हम दोनों ने उनकी तरफ़ देखा।
"बाईस साल के आँसू एक रात में नहीं सूखते," माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ साफ़ थी, वैसी ही जैसे सुबह पाँच बजे चूल्हे के पास होती है। "पर कल सुबह सूरज निकलने से पहले हमें मैदान में खड़ा होना है। तुम दोनों अब रोने, छिपने, पुरानी बातें खुरचने के चक्कर में रहोगे, तो सुबह क्या होगा? रणवीर क्या एक रात हमें इजाज़त देगा सोने की?"
काजल ने मुश्किल से हँसा।
"माँ," वो बोली। "तू बात सही कह रही है, पर तेरी बात में भी मसाला है।"
"मसाला मेरा काम है," माँ ने कहा। "बेटा, मेरी बात सुनो। ये आँसू इसलिए नहीं बह रहे कि ये चीज़ें हुईं। ये इसलिए बह रहे हैं कि अब हम एक-दूसरे को देख पा रहे हैं। ये अच्छी निशानी है। पर अब इनके सूखने का वक़्त है। कल सुबह सच को खड़ा होना है। और सच खड़ा तभी होगा जब तुम दोनों खड़े होंगे।"
पापा ने अपना चेहरा छोड़ा। उन्होंने माँ की तरफ़ देखा।
"सुशीला," उन्होंने कहा, बहुत धीरे। "मैं तुझसे कुछ नहीं कहा बाईस साल।"
"मुझे पता है," माँ ने कहा। और उनकी आवाज़ में पहली बार कुछ नरमी थी। "पर तूने भी मेरा इंतज़ार किया। तूने बेटे-बेटी को नहीं छोड़ा, उस रात। मैंने भी तुझे नहीं छोड़ा। क्योंकि मुझे पता था तू कमज़ोर नहीं है। तू बस रास्ता नहीं देख पा रहा था।"
वो कुछ देर रुकीं।
"अब दिख रहा है," माँ ने कहा।
पापा ने सिर हिलाया।
और फिर उन्होंने सीधे मेरी तरफ़ देखा — सच में सीधे। पहली बार ऐसा लगा जैसे उन्होंने मुझे देखा है।
"अंकुश," उन्होंने कहा। "कल मैं तेरे सामने बोलूँगा। मैं उस काग़ज़ की हर लाइन का हिसाब दूँगा। पर आज रात…" — उन्होंने डिब्बे की तरफ़ इशारा किया — "ये कॉपी तेरे पास रहने दे। मैंने इसे लिखा था तेरे लिए। बाईस साल पहले। अगर कल कुछ हो जाए तो ये कॉपी तुझे बता देगी कि तेरा बाप भागने के लिए पोटला नहीं बाँध रहा था। वो रुक रहा था।"
मैंने कॉपी उठाई। हल्की थी। पर हाथ में ऐसे लग रही थी जैसे कोई बच्चा गोद में लिया हो।
"कुछ नहीं होगा," मैंने कहा।
पापा हँसे। पहली बार हँसे, पूरे बाईस साल में।
"तुझे तो पता है," उन्होंने कहा, "कुछ न हो, ये मेरे बस में नहीं है। पर हाँ — अब होगा तो हम साथ होंगे।"
मैंने कॉपी उठाई और माँ की कुर्सी के पीछे रख दी।
तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई।
काजल ने खोला। बाहर उस्ताद अली बक्श खड़े थे — अपने मोटे चश्मे के पीछे थके हुए, पर पूरी तरह जागते हुए। उनके पीछे शालिनी खड़ी थी, हाथ में एक मोटी काली फाइल। और उनके पीछे मीरा, जिसके कंधे पर कैमरा था और हाथ में एक छोटी डायरी।
"सो नहीं रहे?" उस्ताद ने पूछा।
"नहीं," मैंने कहा।
"अच्छा किया," उस्ताद ने कहा। "क्योंकि आज रात नींद की नहीं, काग़ज़ की ज़रूरत है।"
वो भीतर आए। उनके हाथ में एक मोटी लाल जिल्द वाली कॉपी थी, जिसके किनारे से काग़ज़ निकले हुए थे। उन्होंने उसे मेज़ पर रखा — एक ज़ोर की आवाज़ के साथ।
"ये क्या है?" पापा ने पूछा।
"हिसाब," उस्ताद ने कहा। "पचास साल का। मैंने इसे रात भर खोला। पचास साल पहले जो काग़ज़ भंडार में जला, वो पूरा नहीं जला था। इसमें एक कॉपी बची थी — मैंने बनाई थी, किसी को बताया नहीं।"
शालिनी ने फाइल खोली।
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