The Mysterious Bell – Chapter 1422
बहुत गहरी, बहुत पुरानी शर्म।
"तुमने देखा नहीं दिया," मैंने कहा। "तुम सिर्फ़ बैठे रहे?"
मेरी आवाज़ तेज़ हो गई और मैं उसे रोक नहीं पाया।
"तुम्हारे सामने से हमारी साइकिल उठा ले गए और तुम—"
"अंकुश।"
माँ की आवाज़।
मैं चुप हो गया।
माँ ने कुर्सी से उठकर मेरी तरफ़ दो कदम चले और फिर मेरे सामने खड़ी हो गईं। उनका चेहरा सख़्त था, पर उनकी आवाज़ में जो था वो स्वर में नहीं, साँस में था।
"जो आदमी बाईस साल से अपने डर के अंदर बंद है," उन्होंने कहा, "उसे तू एक रात में मत तोलना। तूने वो बाईस साल देखे हैं? तूने देखा है कि रात को वो उठकर क्या सोचता है, कितनी बार उठता है, कितनी बार दरवाज़ा देखता है?"
मैंने आँखें नीची कर लीं।
"मुझे माफ़ करो," मैंने कहा।
माँ ने मेरा सिर अपनी छाती से लगा लिया।
"मुझे माफ़ी मत दे," उन्होंने कहा। "मुझे तेरा गुस्सा चाहिए। गुस्सा अच्छा है। गुस्से में आदमी उठता है। पर वो गुस्सा उस पर मत निकाल जो अब भी उठने की कोशिश कर रहा है।"
मैं उठा।
और मैंने कमरे में चारों तरफ़ देखा।
संदूक खुला। साइकिल गायब। दीवार पर लाल लिखाई। दरवाज़े पर धूल में पैरों के निशान। और उस धूल में एक जगह ऐसी थी जहाँ किसी ने साइकिल रखी थी — पहिये की लकीर बाहर तक जाती हुई।
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला।
घंटी वहाँ थी। ठंडी।
"कुछ बोल," मैंने धीरे से कहा। "कुछ तो बोल।"
घंटी चुप रही।
और फिर, बहुत धीमे, बहुत दूर से, जैसे किसी पुराने कमरे में कोई बंद दरवाज़े के पीछे से बोल रहा हो, घंटी में एक आवाज़ आई।
"अब वो साइकिल नहीं, गवाही है।"
मेरी साँस रुक गई।
"मतलब?"
घंटी ने कहा, "जो चीज़ मंच पर बोलेगी, वो साइकिल नहीं।"
और चुप हो गई।
मैंने उसे जेब में वापस रखा।
फिर मैंने काजल की तरफ़ देखा।
"अस्पताल कैसा है?"
"मरीज़ अंदर हैं," उसने कहा। "डॉक्टर इसरानी जाग रहे हैं। शबीना का बच्चा सो गया है। दवा दस दिन की है।"
"और वो अजनबी जो पाँचवें बेड के पास बैठा था?"
काजल ने एक पल सोचा।
"वो चला गया," उसने कहा। "जब मैं लौटी तो वहाँ कोई नहीं था। पर बेड पर एक काग़ज़ छोड़ गया था।"
"क्या लिखा था?"
काजल ने जेब से एक मुड़ा काग़ज़ निकाला और मुझे दिया।
मैंने उसे खोला।
उस पर सिर्फ़ एक लाइन थी, बहुत साफ़ अक्षरों में —
"जो काग़ज़ कल बोलेगा, उसका पहला नाम मैं हूँ।"
मैंने वो काग़ज़ मोड़कर अपनी कॉपी में रख लिया।
फिर मैं पापा के सामने दोबारा बैठा।
इस बार मेरी आवाज़ धीमी थी।
"पापा," मैंने कहा। "मुझे साइकिल नहीं चाहिए। मुझे जानना है — तुमने उस आवाज़ को पहचाना?"
पापा ने अपना चश्मा पोंछना बंद किया।
उन्होंने बहुत देर तक मेरी तरफ़ देखा।
और फिर उन्होंने वो कहा जो मैंने उनसे कभी नहीं सुना था।
"मैंने पहचाना," उन्होंने कहा। "मैं उसे बत्तीस साल से पहचानता हूँ। वो आवाज़ मुझे बचाने आई थी, अंकुश। उस रात। जब मैं उस प्लॉट पर मरा पड़ा था।"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
"उसने मुझे उठाया," पापा ने कहा, और उनकी आवाज़ काँप रही थी। "उसने मेरे मुँह पर अपना कपड़ा रखा, क्योंकि धुआँ अंदर जा रहा था। उसने मुझे कंधे पर उठाया और बाहर लाया। और मैं उसका चेहरा नहीं देख पाया, क्योंकि मेरी आँखें जल रही थीं।"
उन्होंने साँस ली।
"मैंने उससे सिर्फ़ इतना पूछा — तुम कौन हो? और उसने कहा — जो तेरा हिसाब रखता है।"
मैंने कहा, "और आज?"
"आज भी वही," पापा ने कहा। "वो आज भी मेरा हिसाब रखता है। पर आज मैं उठ नहीं पाया।"
उनकी आवाज़ टूट गई।
"मैंने सुना। मैंने साफ़ सुना — शंकर, शंकर आ जा। मेरे पैर थे, मेरे हाथ थे, मेरे अंदर सब था। पर मैं उठ नहीं पाया। क्योंकि मुझे लगा — अगर मैं उठा, तो जो मैंने बाईस साल छिपाया है, वो सब दरवाज़े के सामने खड़ा मिलेगा।"
वो रुके।
"और मैं उससे मिलना नहीं चाहता था।"
मैंने उनका हाथ पकड़ा।
"पापा, वो साइकिल कोई साधारण साइकिल नहीं है। वो दादा की है। और जब वो मंच पर बोलेगी—"
"मुझे पता है," पापा ने कहा। "वो साइकिल बोलेगी और मुझे उसके सामने खड़ा होना पड़ेगा।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"और मैं खड़ा होऊँगा, अंकुश। मैं कल खड़ा होऊँगा।"
माँ ने कुर्सी पकड़ ली।
काजल ने होंठ भींच लिए।
मैंने कहा, "मैं तुम्हारे साथ रहूँगा।"
पापा ने सिर हिलाया।
"हाँ," उन्होंने कहा। "पर पहले…"
वो उठे।
बड़ी मुश्किल से उठे। उनके घुटने सुन्न हो गए थे और वो दीवार का सहारा लेकर खड़े हुए। फिर वो पीछे वाले कमरे की तरफ़ गए, जहाँ चूल्हे के पीछे वाला दरवाज़ा खुला था, और भीतर से एक पुराना लकड़ी का डिब्बा उठाकर लाए।
वो डिब्बा मैंने पहले नहीं देखा था।
उस पर धूल की मोटी परत थी और एक कोने से ज़ंग लगी कील बाहर निकली हुई थी।
पापा उसे मेज़ पर रखकर मेरे सामने बैठे।
और उन्होंने काँपते हाथों से मेरा हाथ पकड़ लिया।
उनकी हथेली बर्फ जैसी ठंडी थी।
"कल मैं बोलूँगा," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ पहली बार साफ़ थी। "पर पहले एक बात तुझे बतानी है जो मैंने आज तक नहीं बताई।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
और मेरे भीतर कुछ ऐसा हिला जो मैं नहीं जानता था कि वो अब तक बचा हुआ था।
॥
पापा की हथेली मेरे हाथ पर बर्फ जैसी ठंडी थी, और उनकी आवाज़ में जो काँप रहा था, वो डर नहीं था। वो कुछ और था। शायद शर्म। शायद वो चीज़ जो बाईस साल से उनके सीने में बैठी थी और आज पहली बार बाहर निकलने को मचल रही थी।
"पहले ये खोल," उन्होंने डिब्बे की तरफ़ इशारा किया।
मैंने डिब्बे का ढक्कन उठाया। ज़ंग लगी कील चरचराई, और भीतर से एक गंध उठी — पुराने कपड़े की, नैप्थलीन की, और उससे भी पुरानी किसी चीज़ की जो मुझे नहीं पहचानी।
डिब्बे में एक कपड़े का पोटला था। मैला, मोटा, रस्सी से दो बार बँधा हुआ।
"ये क्या है?" मैंने पूछा।
पापा ने कुछ नहीं कहा। बस देखते रहे।
मैंने रस्सी खोली। कपड़ा खिसका।
भीतर से निकला — एक जोड़ी बच्चों के जूते। बहुत छोटे। जैसे किसी चार साल के बच्चे के हों। एक चूड़ी का जोड़ा। और एक पुरानी मोटी कॉपी, जिसके ऊपर मेरा नाम लिखा था — मेरी पापा के हाथ की लिखाई में।
मैंने कॉपी उठाई। पहला पन्ना खोला।
उस पर सिर्फ़ एक लाइन थी, और उस लाइन ने मेरे भीतर कुछ ऐसा हिला दिया जो मैंने सोचा था कि बहुत पहले मर चुका है।
"अंकुश, तेरे पापा ने आज घर छोड़ने का मन बना लिया है।"
मैंने कॉपी बंद कर दी। मेरे हाथ काँप रहे थे।
"पापा," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ वो नहीं थी जो मैं चाहता था कि हो। "ये क्या है?"
पापा ने साँस ली। लंबी, धीमी, जैसे कोई बहुत गहरे पानी से ऊपर आ रहा हो।
"वो रात," उन्होंने कहा। "जिस रात संदूक से साइकिल गायब हुई, उससे एक हफ़्ता पहले। मैंने तेरे लिए ये कॉपी लिखी थी। ताकि अगर मैं लौटूँ ना, तो तुझे पता हो कि मैं भागा नहीं था। मैं मजबूर था।"
कमरे में सन्नाटा था। इतना कि मुझे अपने ही दिल की धड़कन सुनाई दे रही थी।
"तुम भागने वाले थे?" मैंने पूछा।
"मैं भागने वाला था," पापा ने कहा। "और तेरी माँ को पता था। तू सोचता है वो बाईस साल चुप क्यों रही? क्योंकि उसने मेरा बोरिया-बिस्तर उस रात देखा था।"
माँ ने नज़र नीची कर ली।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno