The Mysterious Bell – Chapter 1421
दुकान के पीछे पहुँचकर दुबे अंकल रुके।
"मैं यहीं से लौटता हूँ," उन्होंने कहा। "आज रात मुझे थाने में रहना है। मेरी कुर्सी खाली मिली तो शक होगा।"
मैंने उनका हाथ पकड़ा।
"अंकल, वो हरिप्रसाद—"
उन्होंने मेरा हाथ हल्के से दबाया।
"मैं उसे जानता हूँ," उन्होंने कहा। "बत्तीस साल पहले मैंने एक काग़ज़ पर उसका नाम लिखा था। उसके बाद वो कभी मिला नहीं। आज पहली बार देखा।"
वो एक पल चुप रहे।
"वो तुमसे बात करेगा," उन्होंने कहा। "पर उसकी बात सुनने से पहले अपनी बात याद रखना। और अंकुश —"
उनकी आवाज़ धीमी हुई।
"कल मैदान में सबसे ज़्यादा खतरा उस आदमी से नहीं है जो चिल्लाएगा। खतरा उस आदमी से है जो बीच में उठकर कहेगा — भाई, अब बहुत हो गया, हम समझौता कर लें।"
वो गए।
हम दुकान के पीछे से गली में आए।
गली में दीये अब भी जल रहे थे। पीपल के नीचे लोग बैठे थे, और जैसे ही मैं दिखा, सब उठ खड़े हुए। टिंकू सबसे आगे दौड़ा आया।
"उस्ताद! क्या हुआ? हमने सीटी बजाई थी, फिर रुक गए क्योंकि पता नहीं—"
मैंने हाथ उठाया।
"सब ठीक है," मैंने कहा। "कुछ नहीं हुआ। कोई नहीं मारा गया, कोई नहीं पकड़ा गया।"
मैंने चारों तरफ़ देखा। शबनम आपा गुमटी के दरवाज़े पर खड़ी थीं, हाथ में चिमटी। रज़िया उनके पीछे। भोला भाई, नसीमा बाई, बूढ़े काका, सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू — सब के सब।
और सबकी आँखों में वही सवाल था।
मैंने गला साफ़ किया।
"आज रात सब घर जाओ," मैंने कहा। "कोई बहस नहीं। कल सुबह से पहले सबको पीपल पर होना है।"
भोला भाई ने कहा, "और रात बारह बजे वाला बक्सा?"
"वो आज नहीं," मैंने कहा। "उसने अपना वक़्त खुद चुना है और वो वक़्त कल का है। आज रात हमें सिर्फ़ एक काम करना है — ज़िंदा रहना।"
शबनम आपा ने चिमटी मेज़ पर रखी।
"चूल्हा बंद कर रही हूँ," उन्होंने कहा। "कल सुबह जो सबसे पहले आएगा, उसके हाथ की चाय से शुरुआत होगी।"
टिंकू ने मेरा हाथ खींचा।
"उस्ताद, मैंने देखा," उसने धीरे से कहा। "सफ़ेद गाड़ी में एक बूढ़ा बैठा था। लकड़ी के जूते पहने हुए। उसने खिड़की से मेरी तरफ़ देखा और मुस्कुराया।"
मेरे हाथ में घंटी ठंडी से और ठंडी हो गई।
"तू ठीक है?" मैंने पूछा।
"हाँ," टिंकू ने कहा। "पर उस्ताद, वो मुस्कुराया ऐसे जैसे मुझे पहले से जानता हो।"
मैंने उसका सिर पकड़ा।
"घर जा," मैंने कहा। "माँ को कुछ मत बता। और कल सुबह सबसे पहले मेरे पास आ।"
वो गया।
मैं घर की तरफ़ बढ़ा।
और घर की तरफ़ बढ़ते हुए मुझे लगा कि मेरे पैर मुझसे कह रहे हैं — मत जा। आज रात कुछ और हो गया है।
मैंने दरवाज़ा धकेला।
वो खुला था।
घर के भीतर बत्ती जल रही थी, पर वो रोशनी पहले जैसी नहीं थी। वो रोशनी ऐसी थी जैसे किसी ने कमरे में आँखें खुली छोड़ दी हों और फिर चला गया हो।
कमरे के बीच में पापा का पुराना संदूक खुला पड़ा था।
और वो खाली था।
मैंने एक कदम आगे रखा।
संदूक के अंदर सिर्फ़ कपड़े की गंध बची थी और धूल में एक लंबा साफ़ निशान — जहाँ साइकिल रखी थी।
साइकिल नहीं थी।
मेरे हाथ से टॉर्च गिर गई।
माँ कुर्सी पर बैठी थीं। सीधी बैठी थीं। हाथ गोद में। साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा हुआ, पर उन्होंने उसे संभाला नहीं था। उनका चेहरा ऐसा था जैसे कोई बहुत देर से रो रहा हो और अब आँसू सूख गए हों।
काजल दीवार के सहारे खड़ी थी। उसकी आँखें लाल थीं। वो मुझे देखकर कुछ कहना चाहती थी, पर होंठ हिले और आवाज़ नहीं निकली।
और पापा।
पापा कमरे के कोने में बैठे थे।
फ़र्श पर। ठंडे फ़र्श पर। घुटने सीने से लगाए। हाथ जमीन पर रखे हुए। चश्मा उनके हाथ में था और वो उसे बार-बार पोंछ रहे थे, हालाँकि उसमें कोई धूल नहीं थी।
मैंने दीवार की तरफ़ देखा।
और मेरे भीतर कुछ टूट गया।
दीवार पर लाल रंग से, मोटे अक्षरों में लिखा हुआ था —
कल मैदान में शंकर यादव बोलेंगे।
और उसके नीचे, छोटे अक्षरों में —
बेटा सुनने आएगा?
लाल रंग अभी गीला था। उसकी कुछ बूँदें नीचे दीवार पर टपककर सूख गई थीं, और उन दाग़ों से लाल रंग की गंध आ रही थी — तेज़, धातु जैसी, जैसे किसी ने पेंट की जगह लाल स्याही उठाकर दीवार पर फेंक दी हो।
मैंने कमरे में घूमकर देखा।
पीछे वाले कमरे का दरवाज़ा खुला था। चूल्हे के पीछे वाला दरवाज़ा — जो बाईस साल से बंद था और जिसे माँ ने खोलने से मना किया था — वो भी खुला था, और उसके भीतर अंधेरा एक अलग तरह का अंधेरा था।
मैंने काजल की तरफ़ देखा।
"कब?" मैंने पूछा।
मेरी आवाज़ मुझे अपनी नहीं लगी। वो किसी और की आवाज़ थी, किसी ऐसे आदमी की जिसने बहुत देर से साँस नहीं ली हो।
"कब गई, काजल?"
काजल ने होंठ भींचे।
"तुम गए उसके बाद," उसने कहा, और उसकी आवाज़ टूटी। "दस बजे के आसपास। मैं अस्पताल से लौटी थी। माँ रसोई में थी। पापा आँगन में बैठे थे।"
उसने साँस ली।
"फिर बाहर से आवाज़ आई।"
मैं स्थिर हो गया।
"कैसी आवाज़?"
काजल ने पापा की तरफ़ देखा।
"वही आवाज़," उसने कहा। "जो पीपल पर आई थी। जो पापा का नाम ले रही थी। 'शंकर' — तीन बार। और फिर 'शंकर आ जा'।"
मेरे भीतर ठंडी लहर गई।
"मैं दौड़कर बाहर आई," काजल ने कहा। "गली सूनी थी। पीपल के नीचे कोई नहीं था। मैंने चारों तरफ़ देखा।"
उसकी आवाज़ और धीमी हुई।
"और जब मैं लौटी, पापा वैसे ही आँगन में बैठे थे। आँखें खुली हुईं। हाथ जमीन पर। मैंने उन्हें हिलाया, पुकारा, चिल्लाई — पापा, पापा उठिए — पर वो उठे नहीं। वो बस देख रहे थे। जैसे कोई उनको जकड़कर रखा हो।"
माँ ने तब पहली बार बोला।
"वो डरा हुआ था, बेटा," उन्होंने कहा। आवाज़ शांत थी, और यही शांति सबसे ज़्यादा चुभ रही थी। "बाईस साल का डर एक आवाज़ से नहीं जाता।"
मैंने कहा, "तो साइकिल किसने निकाली?"
काजल ने कहा, "दो आदमी आए। सफ़ेद कुर्ते में। एक बूढ़ा और एक जवान। बूढ़े के पैरों में लकड़ी के जूते थे — मैंने आवाज़ सुनी, कट-कट, कट-कट। उन्होंने दरवाज़ा खटखटाया भी नहीं। वो सीधे पीछे वाले कमरे में चले गए, जैसे उन्हें घर पता हो।"
"और तूने कुछ किया नहीं?" मेरी आवाज़ ऊँची हो गई। "तू वहाँ थी, काजल—"
काजल ने मेरी तरफ़ देखा और उसकी आँखों में आँसू और गुस्सा दोनों थे।
"मैंने चिल्लाया," उसने कहा। "मैंने कहा — छोड़ो उसे। और तब वो बूढ़ा मेरी तरफ़ मुड़ा।"
वो रुकी।
"उसने मुझे देखा। और उसने कहा — बेटी, तेरे पापा ने आज तक जो किया, वो सब बस इसलिए किया ताकि तू बची रहे। तू चुप रह, तेरे पापा के पास एक ही चीज़ बची है, वो भी आज मुझे दे देना।"
मेरे हाथ की मुट्ठी कस गई।
"और वो बूढ़ा…" मैंने कहा, "उसके पैरों में लकड़ी के जूते थे?"
काजल ने सिर हिलाया।
"हाँ। और उसने दीवार पर लिखा। अपने हाथ से। जब वो जा रहा था, तब लिखा। माँ ने रोका, मैंने रोका, पर उसने हमारी तरफ़ देखा भी नहीं। लिखकर वो मुड़ा और बोला — बेटा सुनने आएगा?"
कमरा चुप हो गया।
मैं उस कोने की तरफ़ बढ़ा जहाँ पापा बैठे थे।
मैं उनके सामने घुटनों के बल बैठ गया।
"पापा।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
और मैंने पहली बार उनकी आँखों में वो देखा जो मैंने उन्नीस साल की उम्र से नहीं देखा था — शर्म।
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