The Mysterious Bell – Chapter 1420
वो हाथ मेरे कंधे से नीचे सरका और मेरी बाँह पकड़कर मुझे पीछे खींच लिया, इतनी ताक़त से कि मेरे पाँव धूल में घिसट गए, और मैं, उस्ताद और बबलू तीनों उस ईंट की चबूतरी के पीछे गिर गए, और वहाँ अंधेरा इतना घना था कि मेरी आँखें खुली होकर भी नहीं खुल रही थीं।
मैंने टॉर्च उठाई।
आदमी मेरे सामने झुका हुआ खड़ा था।
बूढ़ा। सत्तर से ऊपर। पुरानी धोती, फटा कुर्ता, और उसके सिर पर वो मैला पीला कपड़ा था जो पहले कभी पीला था, अब सिर्फ़ कपड़ा था।
और उसकी उँगली।
उसकी एक उँगली आधी थी।
मैंने उसे देखा और मेरी गर्दन के बाल खड़े हो गए। मुझे वो आधी उँगली याद थी। मुझे वो काग़ज़ याद था जिस पर हरिप्रसाद का नाम लिखा था और उस काग़ज़ पर कहीं उँगली का निशान भी था।
मैंने धीमे से कहा, "तुम?"
और वो हँसा।
बहुत धीमी हँसी। ऐसी हँसी जिसमें सिर्फ़ दाँत दिखते हैं और आँखें नहीं हँसतीं।
"हाँ," उसने कहा। "मैं। मैं इंतज़ार कर रहा था कि इस गली का लड़का अपने पैरों से उस जगह आए जहाँ उसे आना नहीं चाहिए था।"
उसने मेरी टॉर्च की रोशनी के बाहर एक कदम आगे रखा और उसकी आवाज़ और भी धीमी हो गई।
"अंकुश यादव," उसने कहा, "तू जो ताला खोलने निकला है, वो मेरा है। और मुझे अच्छी तरह याद है, उसे किसने बंद किया था।"
॥
मैंने अपनी टॉर्च की रोशनी उस आधी उँगली पर टिका दी थी, और मेरे भीतर का हर पुराना डर एक साथ जाग गया।
फिर मेरे कंधे पर दूसरा हाथ आया।
ये हाथ पहले वाले से बिल्कुल अलग था। इसमें रेती जैसी खुरदुराहट नहीं थी। इसमें वर्दी वाली सफ़ाई थी, थोड़ी साबुन की गंध थी, और उतनी ही चुप्पी थी जितनी पुराने थानेदारों की आँखों में होती है।
वो आवाज़ मैं पहचानता था।
"चुप।"
मैं पलटा।
और टॉर्च की पीली रोशनी में मेरे सामने दुबे अंकल खड़े थे।
नीली शर्ट। आस्तीन चढ़ी हुई। बाल वैसे ही बेतरतीब जैसे हमेशा। पर उनका चेहरा — जो दिन में हँसता रहता है, चबूतरी पर बैठकर बच्चों को कहानियाँ सुनाता है — वो चेहरा अब ऐसा था जैसे पत्थर पर बरसों की धूल जम गई हो।
उन्होंने एक हाथ ऊपर उठाया।
सीधा इशारा। पीछे। चुपचाप। अभी।
मैंने गर्दन घुमाई।
हरिप्रसाद उसी अंधेरे में एक कदम पीछे खिसक चुका था, जैसे वो कभी वहाँ था ही नहीं। सिर्फ़ उसकी आवाज़ बची थी, बहुत धीमी, बहुत दूर से आती हुई।
"कल," उसने कहा। "मैदान में। तेरे पापा से पहले मैं बोलूँगा।"
और फिर वो अंधेरे में घुल गया।
दुबे अंकल ने मेरी बाँह पकड़ी और मुझे उसी ईंटों की चबूतरी के पीछे खींच लिया। उस्ताद पहले ही वहाँ बैठे थे, साँस रोके हुए। बबलू घुटनों के बल गिरा था और उसका मुँह खुला रह गया था, जैसे वो चीखना चाहता था और आवाज़ नहीं निकल रही थी।
दुबे अंकल ने अपना मुँह मेरे कान के पास लाया।
"सुन," उन्होंने कहा। "वो दोनों अभी ग्यारह कदम पीछे हैं। उनके पास टॉर्च है, पर उन्हें अंधेरे में देखने की आदत नहीं है। मेरे पीछे-पीछे। ईंटों के ढेर तक। एक भी शब्द नहीं।"
मैंने सिर हिलाया।
हम चले।
मेरी जूतियाँ धूल में दब रही थीं और हर कदम पर मुझे लगता था कि कोई उसे सुन रहा है। पीछे से सफ़ेद कुर्ते वाले की आवाज़ आई, वही मिठास घोली हुई।
"साहब, चूहे तो हैं। पर मुझे लगता है आज एक चूहा अपनी मौत देखने आया है।"
रणवीर ने जवाब दिया, बहुत ठंडे ढंग से।
"मौत नहीं। मौत से काम नहीं चलता। मुझे चूहा ज़िंदा चाहिए। ज़िंदा चूहा रास्ता दिखाता है।"
मेरी रीढ़ के साथ ठंडी सुई सी चली।
हम ईंटों के ढेर के पीछे पहुँचे। दुबे अंकल ने हमें बैठा दिया और खुद घुटनों के बल बैठकर झाँका। उनके हाथ में जो छड़ी थी, उसे उन्होंने धूल में दबा दिया, ताकि खड़खड़ न हो।
सामने से रोशनी आई।
टॉर्च की पीली लकीर ईंटों पर, धूल पर, और उस पुराने प्लॉट के सूखे पत्तों पर फिरी। फिर रुकी।
मैंने साँस रोकी।
बबलू के घुटने के नीचे एक सूखी डाली थी। उसने हल्का सा हिलकर आवाज़ की — चट।
रोशनी उसी तरफ़ मुड़ी।
दुबे अंकल ने बिना देखे मेरा हाथ पकड़ा और दबाया, जैसे कह रहे हों — मत हिलो।
सफ़ेद कुर्ते वाले ने कहा, "यहाँ कोई है साहब। मुझे यक़ीन है।"
और रणवीर ने जो कहा, वो सबसे डरावनी बात थी।
"होने दो," उसने कहा। "जो यहाँ छिपा है, वो कल मैदान में खुद खड़ा होगा। आज उसे छिपने दो। छिपा हुआ आदमी कल सबसे पहले बोलता है।"
फिर उसकी आवाज़ में वही मुस्कान आई जो मुझे अंधेरे में भी दिख रही थी।
"और मुझे वही चाहिए। मुझे उसकी आवाज़ चाहिए, गली के सबसे बड़े माइक पर।"
टॉर्च की रोशनी हट गई।
कदमों की आवाज़ दूर गई। जीप का दरवाज़ा खुला, बंद हुआ, और इंजन की आवाज़ उस पुराने प्लॉट से निकलकर सड़क पर मिल गई।
दुबे अंकल ने लंबी साँस छोड़ी।
और फिर मेरी तरफ़ मुड़कर उन्होंने वो कहा जो मुझे अंदर तक झकझोर गया।
"आज रात तुम सीधी टक्कर नहीं लड़ सकते।"
मैंने कहा, "अंकल, वो साइकिल—"
"सुन पहले," उन्होंने काटा। "थाने में दो-तीन आदमी उसके पक्ष में हैं। राठौर का नाम तो तुम सुन चुके हो। उसका फोन रणवीर के दफ़्तर से आता है, दिन में तीन बार। मेरे पास कोई सबूत नहीं, सिर्फ़ बत्तीस साल की नौकरी और आँखें हैं। और ये आँखें अब भी कुछ देख लेती हैं।"
उन्होंने बबलू की तरफ़ देखा, जो अब भी घुटनों के बल था।
"अगर आज रात यहाँ हाथापाई हो गई, तो कल सुबह थाने में एक काग़ज़ बनेगा। उस काग़ज़ में लिखा होगा कि शंकर यादव का बेटा रात में ज़मीन पर कब्ज़ा करने आया था। और फिर कल की सभा पर रोक लग जाएगी। तुम्हारी गली कल बोल नहीं पाएगी। समझ रहे हो?"
मैंने कुछ नहीं कहा।
क्योंकि वो सही कह रहे थे। और सच्ची बात सबसे ज़्यादा चुभती है।
उस्ताद ने धीरे से कहा, "दुबे जी, उसने साइकिल मँगवाई है। शंकर की पुरानी साइकिल। वो कल मंच पर बोलेगी।"
दुबे अंकल ने आँखें बंद कीं।
"तो कल मंच पर साइकिल होगी," उन्होंने कहा। "पर आज रात हमें ये साइकिल नहीं, अपने लोगों को बचाना है। आओ। सूखी नाली वाले रास्ते से चलो। वो रास्ता उसके आदमियों को नहीं पता।"
हम उठे।
और तभी बबलू ने अपनी गर्दन से हाथ फेरा, उस मोटी सोने की चेन को उँगली में उलझाया और एक झटके में उतार दिया।
उसने उसे देखा। फिर मेरी तरफ़ देखा।
"अंकुश भाई," उसने कहा, आवाज़ भारी थी, "पंद्रह साल इस गले में रही। सबको लगता था बबलू पांडे सोना पहनता है। और आज पता चला ये दो सौ साठ रुपये की है।"
उसने चेन जेब में डाली।
"अब गला हल्का लग रहा है," उसने कहा। "और अजीब बात है — मुझे अच्छा लग रहा है।"
दुबे अंकल ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
"ये तो शुरुआत है, बबलू," उन्होंने कहा। "असली वज़न गले में नहीं होता। असली वज़न उस बात में होता है जो आदमी ने बोली नहीं, और जो उसके अंदर बैठी रहती है।"
हम सूखी नाली के रास्ते चले।
वो रास्ता पुराने प्लॉट के पीछे से शुरू होता था और उस्ताद की दुकान के पीछे निकलता था। सूखी नाली के पत्थर पैरों के नीचे धँसते थे और ऊपर से लोहे की एक टूटी चादर लटकी थी, जो हवा में हिलकर ऐसी आवाज़ करती थी जैसे कोई बूढ़ा कराह रहा हो।
रास्ते में कोई नहीं बोला।
मैं बस अपनी जेब में हाथ डाले चल रहा था। घंटी उसी जेब में थी — ठंडी, चुप, और उस चुप्पी में भी कुछ कहती हुई। मेरी उँगली उस पर टिकी थी और मुझे लग रहा था कि वो ठंडी नहीं, बस थकी हुई है।
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