The Mysterious Bell – Chapter 1419
फिर वो बोला, और उसकी आवाज़ में एक अजीब-सी कोमलता आ गई। वैसी कोमलता जो आदमी तब दिखाता है जब वो किसी को नीचा दिखाने की तैयारी कर रहा हो।
"कल के मैदान में," उसने कहा, "शंकर यादव को उसी पुरानी साइकिल पर बैठाकर लाना है। उसी पर। जिस पर आज से पच्चीस साल पहले उसके बाप ने दस्तख़त छोड़े थे। मंच पर सिर्फ़ साइकिल रखी होगी, साइकिल का हैंडल माइक के सामने, और शंकर बगल में खड़ा। पूरी गली को लगेगा कि साइकिल बोल रही है और वो चुप खड़े सुन रहे हैं।"
रुकावट।
"नहीं, वो नहीं बोलेगा," रणवीर ने कहा, और हल्की हँसी जैसी आवाज़ निकली, पर हँसी नहीं थी। "वो जो बोलेगा, वो मैंने पहले से तय कर रखा है। उसके हाथ काँपेंगे, आवाज़ भर्राएगी, और लोग समझेंगे कि ये अपनी ही करनी का सच कह रहा है। सच कहने वाले की आवाज़ भी ऐसी ही होती है ना?"
मुझे अपनी जीभ पर कुछ कड़वा-सा लगा।
मैंने एक कदम आगे बढ़ाया, धीरे, बहुत धीरे।
उस्ताद ने मेरा आस्तीन पकड़ा और ना में सिर हिलाया। वो ठीक कहते थे। मैं जानता था वो ठीक कहते थे। पर मेरे भीतर कुछ ऐसा था जो अंधेरे में उस आवाज़ की तरफ़ खिंच रहा था।
रणवीर फिर बोला, "और अगर बेटा बीच में आए—"
रुकावट। लंबी।
फिर वो बहुत साफ़, बहुत ठंडी आवाज़ में बोला।
"ताला तोड़ देना।"
मेरी साँस रुक गई।
ताला।
मंसूर का ताला। वो ताला जिसमें माँ की हँसी बंद है, पापा का डर बंद है, और मेरा बचपन बंद है। वो ताला जो एक बार खुला, तो फिर कभी बंद नहीं होगा, और एक बार टूटा तो फिर कभी खुलेगा नहीं?
"और उसके बाद," रणवीर ने कहा, "उस बेटे को अपनी माँ के बिस्तर तक पहुँचने के लिए रास्ता खोजना पड़ेगा।"
मेरे कानों में खून भर आया।
उस्ताद का हाथ मेरे हाथ पर था, और उनकी उँगलियाँ मेरी उँगलियों को दबा रही थीं। मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनके चेहरे पर अब डर नहीं था, एक अजीब-सी परचम जैसी चुप्पी थी।
और तभी—
छाया से एक आदमी बाहर आया।
धीरे। बिना आवाज़। सफ़ेद कुर्ता, सफ़ेद जूते, और उसकी उँगली में कुछ काला चमका।
मेरी साँस अंदर ही रुक गई।
मैंने उसका चेहरा नहीं देखा। मुझे देखने की ज़रूरत नहीं थी। मैंने उसकी चाल पहचान ली। मैंने उसका हाथ देखा, और मैंने वो काली अंगूठी देखी जो मुझे आज से बाईस साल पहले के एक काग़ज़ पर बने निशान से जोड़ती है।
"साहब," उसने कहा। उसकी आवाज़ में वो मिठास थी जिससे दाँत खट्टे हो जाते हैं। "साहब, मैंने एक बात सोची है।"
रणवीर ने उसकी तरफ़ बिना मुड़े कहा, "बोलो।"
"कल मैदान में लोग सच बोलेंगे।"
"बोलने दो।"
"साहब, मेरा मतलब है, वो सच बोलेंगे, और हम उनका सच सुनेंगे।"
रणवीर रुका। फिर वो मुड़ा, और उसका चेहरा अब कुछ ज़्यादा दिख रहा था — आधा अंधेरे में, आधा उस बक्से की ठंडी चमक में।
"तो?"
"तो साहब, सच अगर बोला गया है, तो उसे लिखा भी जाएगा।" उसने बहुत धीरे कहा। "हमारे हिसाब से। उनकी ज़ुबान से निकला सच, उसी रात हमारे रजिस्टर में चढ़ जाएगा। जो बोलेगा, वो अपने सच की गवाही खुद देगा। और सच्ची गवाही के बाद… काग़ज़ वापस नहीं होता।"
बक्से के पास ठंडी हवा तेज़ हुई।
मुझे उस आदमी से नफ़रत नहीं हुई। मुझे उससे जलन हुई। क्योंकि वो मेरे ही हथियार से मुझ पर वार कर रहा था। सच। वही चीज़ जिसे मैं जोड़ने के लिए इस्तेमाल करता हूँ, वो उसे बाँधने के लिए इस्तेमाल करना चाहता था।
रणवीर ने कुछ पल सोचा। फिर उसने कहा, "और अगर कोई अपना सच वापस ले?"
"साहब, सच बोलने के बाद वापस नहीं लिया जाता। दुनिया में सबसे मुश्किल काम है ये। आपने कभी किसी को सच बोलकर मुकरते देखा है? नहीं देखा होगा। लोग झूठ से मुकरते हैं। सच से नहीं।"
और रणवीर हँसा।
वो हँसी मैंने पहले भी सुनी थी — जब उसने मंच पर मुझे “बेटा” कहकर अपने पास बैठाया था। उस हँसी में न मज़ाक होता है, न शरारत। उसमें सिर्फ़ ज़रूरत होती है।
"ठीक है," रणवीर ने कहा। "कल शाम तक हर सच हमारे हिसाब की किताब में होगा। और उसके बाद—"
वो रुका।
फिर उसने वो बात कही जो मुझे आज तक नींद में जगाती है।
"उसके बाद उस गली में एक भी आदमी ऐसा नहीं बचेगा जिसके पास अपना कुछ हो। सब के सब काग़ज़ी हो जाएँगे। और जिसके पास अपना कुछ न हो, वो मेरा होता है।"
मेरी मुट्ठी इतनी कस गई कि नाखून हथेली में चुभने लगे।
उस्ताद ने मेरा हाथ पकड़ा।
उनका हाथ ठंडा था, पर मज़बूत।
और उन्होंने मेरे कान में सिर्फ़ एक शब्द कहा।
"अभी।"
मैंने आँखें बंद कीं।
वो शब्द उन्होंने गुस्से से नहीं कहा था। उन्होंने वो शब्द उस तरह कहा जैसे कोई छत पर चढ़े आदमी से कहे — अभी नहीं देखो, नीचे देखो। पाँव जगह पर रखो।
और मैंने पाँव जगह पर रखे।
मेरी साँस धीमी हुई।
मैंने अपने भीतर की उस आवाज़ को, जो कह रही थी — अब जाकर इसकी खोपड़ी फोड़ दे — उसे धक्का देकर बैठा दिया।
मैं जानता था उस्ताद सही कहते हैं। जो आदमी सब कुछ सुन लेता है, वो कल सब कुछ बोल सकता है। और जो अभी कूद पड़ेगा, वो कल कुछ नहीं बोलेगा, क्योंकि कल वो यहाँ नहीं होगा।
फिर बबलू ने हिलना शुरू किया।
उसका शरीर काँप रहा था, धीरे-धीरे, जैसे ठंड लगी हो। और उसके पैर के नीचे एक पुरानी ईंट थी जो उस वक़्त अपनी जगह से खिसक गई।
खड़खड़।
बहुत छोटी आवाज़। बहुत छोटी।
पर उस रात वो आवाज़ तोप जैसी लगी।
रणवीर की बात रुक गई।
मैंने अपनी साँस रोकी। बबलू ने भी। उस्ताद ने भी।
मैंने देखा कि रणवीर का सिर बक्से के ऊपर से हमारी तरफ़ घूमा।
बहुत धीरे।
उसने हमारी तरफ़ देखा। पूरे अंधेरे में देखा, जहाँ उसे कुछ दिखना नहीं चाहिए था।
और फिर उसने वो किया जो सबसे डरावना था।
उसने मुस्कुरा दिया।
नहीं। मुस्कुराया नहीं।
उसके होंठ हिले।
"इस कोने में कोई है," उसने कहा। "बहुत पुराना कोना है। पुराने कोनों में चूहे बहुत होते हैं।"
सफ़ेद कुर्ते वाले आदमी ने भी उसी तरफ़ देखा।
और फिर उसने अपनी आवाज़ में वो मिठास घोली और कहा, "साहब, चूहे तो हैं। पर मुझे लगता है, यहाँ आज एक चूहा ऐसा है जो अपनी मौत देखने आया है।"
बक्से के पास ठंडी हवा फिर चली, और इस बार उसमें राख की गंध साफ़ थी।
मैंने उस्ताद का आस्तीन पकड़ा और पीछे खिसका।
एक इंच।
दो इंच।
मेरे पीछे बबलू था, और बबलू के पीछे पुरानी ईंट की चबूतरी जैसी चीज़, और उसके बाद अंधेरा।
मेरे दिल की धड़कन मेरे कानों में इतनी तेज़ थी कि मुझे लगा पूरा प्लॉट सुन रहा है।
एक कदम। दूसरा कदम।
फिर—
फिर मेरे कंधे पर किसी का हाथ आया।
नर्म नहीं। सख़्त नहीं। ऐसा हाथ जिसमें बहुत सालों की मेहनत थी और बहुत सालों की चुप्पी। उँगलियाँ रेती जैसी खुरदुरी।
मेरा पूरा शरीर एक पल के लिए जम गया।
मैंने उस हाथ को देखना चाहा, पर मैं उल्टा नहीं हुआ।
और उस हाथ वाले ने मेरे कान के बहुत पास अपना मुँह लाकर धीमी आवाज़ में कहा।
"अब तुमने खुद को पकड़वा दिया।"
वो आवाज़ बूढ़ी थी।
और उसमें अंधेरे की वो खुरदुराहट थी जो मैं कहीं सुन चुका था। बहुत पहले। बहुत दिन पहले। किसी तहखाने में। किसी दरवाज़े के नीचे से। किसी काग़ज़ के कोने से।
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