The Mysterious Bell – Chapter 1418
उसने मेरी आँखों में देखा। "अंकुश, तू अकेले—"
"मैं अकेले नहीं जा रहा।"
"मैं जानती हूँ," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो घुटन थी जो मुझे एहसास दिलाती है कि मेरे साथ चलने वाले हर आदमी को वो अपने हिसाब से जोड़े रखती है। "मेरा मतलब है, तू अंदर से अकेले जा रहा है।"
मैं मुस्कुरा दिया। "मीरा, अंदर से हम सब अकेले ही होते हैं। बाहर से ही गली बनती है।"
शबनम आपा ने आगे आकर मेरी कमीज़ का कॉलर सीधा किया, जैसे करीब तीस साल की माँ अपने बेटे को स्कूल भेजने से पहले करती है।
"पीछे के रास्ते से जाओ," उन्होंने कहा। "सूखी नाली वाला रास्ता सबसे अंधेरा है, पर वहाँ कोई खड़ा नहीं होता। बीस साल से उस रास्ते से सिर्फ़ कुत्ते जाते हैं।"
मैंने कहा, "और अगर आपको यहाँ कुछ गड़बड़ लगे?"
शबनम ने गुमटी की लोहे की चिमटी उठाई, जो अभी भी चूल्हे की गर्मी से तप रही थी। "मुझे कुछ नहीं लगेगा। मैं लगाऊँगी।"
रज़िया ने अपनी चादर कसकर ओढ़ी और माँ की चुनरी उठाकर अपने कंधे पर रख ली। "दीदी, मैं नहीं डरूँगी।"
शबनम ने उसकी तरफ़ देखा और कहा, "पंद्रह साल बाद अगर तू डरने लगी, तो मैं तुझे गुमटी में बंद कर दूँगी।"
रज़िया ने कहा, "यही डर तो है मुझे।"
और दोनों बहनें आधी हँसी, आधी रोई। यही गली है। कभी कभी रोने का सबसे सही तरीक़ा हँसी होती है।
मैं पीछे मुड़ा। बबलू दूर खड़ा था। उसकी सोने की चेन नहीं थी, गले में अब कुछ नहीं था, और वो खाली गले को बार-बार छू रहा था, ऐसे जैसे उसने तीस साल पहन कर रखी हो और अब नंगा लगे।
"बबलू भाई," मैंने कहा, "तुम जानते हो वहाँ का रास्ता।"
उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
"मैं… मैं तो सिर्फ़ बाहर से गया हूँ। उन्होंने मुझे दूर बाहर रुकने को कहा था।"
"तो बाहर का रास्ता काफ़ी है। चलो।"
"अंकुश," उसने कहा, और उसकी आवाज़ फटी। "मैं… मैंने आज तक किसी का साथ नहीं किया। साथ करने वालों का क्या होता है?"
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा।
"पता है, बबलू भाई? साथ करने वालों का क्या होता है? उनके पास एक आदमी कम होता है जिसे वो गिनकर रोते हैं। बस यही। और बाक़ी सब वैसा ही रहता है। मगर आज रात हमें सिर्फ़ सुनना है, कुछ करना नहीं। करने वाला कल होगा। सुनने वाले का काम सबसे मुश्किल है।"
बबलू ने सिर हिलाया, और उसके हाथ काँप रहे थे।
हम चल पड़े।
पीपल से निकलकर पीछे वाली गली, फिर अस्पताल की पिछली दीवार, फिर वो सूखी नाली जो सिर्फ़ बारिश में याद आती है। रास्ते में उस्ताद बिल्कुल नहीं बोले। और यही उनका सबसे ज़्यादा बोलना होता है।
रास्ता जितना आगे बढ़ता गया, उतना ही ठंडा होता गया।
और ठंडा भी अजीब तरह से। ऊपर से हवा नहीं थी, पर नीचे से ठंड आ रही थी, ज़मीन से, ईंटों से, दीवारों से, जैसे पूरी ज़मीन साँस ले रही हो और साँस में पुरानी राख घोल रही हो।
मेरे हाथ में छोटी टॉर्च थी। मैंने उसे कम रोशनी पर रखा। इतनी कम कि सिर्फ़ मेरे पाँव के अगले दो फुट दिखें।
फिर दीवार खत्म हुई और हम वो जगह पहुँचे जहाँ पुराने प्लॉट की कच्ची ज़मीन शुरू होती है। यहाँ से बिजलीघर की तरफ़ ढलान है। सामने पुरानी लोहे की बाउंड्री है, जिसके पाए पीले पड़ चुके हैं, और उसके पीछे कुछ सफ़ेद धुंध जैसी टिमटिमाती रोशनी।
टिमटिमाती नहीं, यह उसकी भनक भर थी।
पर एक चीज़ साफ़ थी। धुंध के उस पार खड़ी एक लंबी सफ़ेद गाड़ी।
जीप।
मैंने उस्ताद का कंधा दबाया और हम तीनों एक पुरानी ईंट की चबूतरी जैसी चीज़ के पीछे बैठ गए, जो यहाँ बीस साल से पड़ी है।
सफ़ेद जीप का पिछला दरवाज़ा आधा खुला था। अंदर हल्की नीली रोशनी जल रही थी। ड्राइवर सीट पर एक दुबला आदमी बैठा था, हाथ स्टीयरिंग पर, और उसकी कलाई पर सूखे खून जैसा एक लाल धागा बँधा था।
मैंने उस लाल धागे को देखा और मेरे भीतर कुछ ठंडा हुआ।
इस शहर में लाल धागा कोई पहनता है। मुझे पता है कौन।
बबलू मेरे कान के पास आया। उसकी साँस में पान और डर दोनों थे।
"अंकुश," उसने फुसफुसाकर कहा, "वो गाड़ी यहीं खड़ी रहती है। साहब गाड़ी से उतरते हैं, और फिर… फिर गाड़ी वाला आदमी उन्हीं गाड़ी में बैठा रहता है। कभी नीचे नहीं आता। कभी नहीं।"
"तुमने उसे कभी उतरते देखा?"
"नहीं।" उसने गला साफ़ किया। "और मुझे लगता है, वो बाहर आएगा तो कुछ बड़ा हो जाएगा।"
उस्ताद ने धीरे से कहा, "चुप।"
और हम चुप हो गए।
क्योंकि सामने काली दीवार के नीचे, धूल और अंधेरे के बीच, छह बड़े लोहे के बक्से थे।
छह। एक सीध में, उसी तरह जैसे मैंने उन्हें पहले कभी देखा था। दीवार के साथ, बराबर अंतर पर। पुराने, ऊँचे, ढक्कन वाले। जैसे छह बंद मुँह ज़मीन के अंदर से उग आए हों।
और उन छह में से एक — सबसे आख़िरी — वो बक्सा था जिसके आगे की ज़मीन पर धूल नहीं थी।
मैंने बबलू की तरफ़ देखा। उसने सिर हिलाया। वो बक्सा।
बक्से की तरफ़ से हल्की ठंड आ रही थी। मैं उसे दूर से महसूस कर सकता था, जैसे किसी ने दरवाज़ा खोलकर शीत घर की हवा बाहर छोड़ दी हो।
और बक्से से आवाज़ आ रही थी।
नहीं। आवाज़ नहीं।
गुनगुनाहट।
बहुत धीमी। बहुत अंदर से। जैसे कोई बूढ़ी औरत रोटी बेलते हुए बहुत पुराना गीत गुनगुना रही हो, और वो गीत इतना पुराना हो कि उसके शब्द खो गए हों और सिर्फ़ सुर बचा हो।
मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
क्योंकि माँ भी रोटी बेलते हुए ठीक इसी तरह गुनगुनाती है।
और तभी—
उस गुनगुनाहट के ऊपर एक आवाज़ बोली।
"नहीं। नहीं, ऐसा नहीं।"
आदमी की आवाज़। साफ़। ठंडी। बिना जल्दी की।
रणवीर भारद्वाज की।
वो उस बक्से के सामने खड़ा था।
मुझे उसका चेहरा नहीं दिख रहा था, सिर्फ़ कंधे और पीठ और उनकी सफ़ेद कमीज़ की एक चमक। पर मैं उसकी आवाज़ को बरसों से जानता हूँ — वो आवाज़ जो मंच पर हर बच्चे को “बेटा” कहती है और काग़ज़ पर हर बच्चे का नाम काटती है।
और वो अकेला नहीं था।
वहाँ कोई था। वो किसी से बात कर रहा था।
पर मुझे कोई दिख नहीं रहा था।
उसके सामने सिर्फ़ अंधेरा था, और बक्सा।
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा। उस्ताद ने बहुत धीरे, बहुत छोटे से सिर का इशारा किया। यानी — सुनो। बस सुनो।
"ये मैं जानता हूँ," रणवीर कह रहा था। "पर मुझे वो नहीं चाहिए। मुझे उसका इस तरह बोलना नहीं चाहिए। और तुम मुझे मजबूर मत करो।"
रुकावट।
और उस रुकावट में मुझे कुछ सुनाई दिया।
मुझे नहीं सुनाई दिया। महसूस हुआ। मेरी रीढ़ के नीचे से एक ठंडी सुई जैसी चीज़ ऊपर गई, सीधी सिर तक, और फिर जाकर रुक गई। जैसे किसी ने कान के अंदर बहुत पतली चीज़ से एक लकीर खींच दी हो।
बबलू की साँस रुक गई। उसने उस्ताद का आस्तीन पकड़ लिया।
"ये," उसने बिना आवाज़ के होंठ हिलाकर कहा। "ये… ये वहीं आवाज़ है।"
और मुझे समझ आ गया।
रणवीर किसी आवाज़ से बात कर रहा था जो सिर्फ़ उसके कान में थी। जो किसी और को नहीं सुनाई देती। जो सुई की तरह चुभती है और फिर कुछ नहीं कहती।
फूट।
मेरी मुट्ठी अपने आप भींच गई।
उसी पल रणवीर का सिर हल्का-सा हिला, जैसे उसने कुछ सुना और मान लिया। फिर उसने अपने सीने पर हाथ रखा, वहाँ जहाँ ताबीज़ लटकता है, और उसकी उँगलियाँ कुछ पल वहीं रुकीं।
"ठीक है," उसने कहा। "तुम्हारी बात। पर एक शर्त है। आज रात के बाद मुझे सिर्फ़ एक चीज़ चाहिए। और वो चीज़ काग़ज़ में नहीं आएगी।"
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