The Mysterious Bell – Chapter 1417
पर मेरी जेब में घंटी ने हरकत की।
छोटी-सी।
जैसे कोई सोता हुआ आदमी करवट ले।
मैंने घंटी निकाली और हाथ में रखी। वो ठंडी थी। पर उस पर अब तीन लकीरें थीं — एक गहरी, एक आधी, और एक नई, जो बहुत पतली थी, और जो अभी बन रही थी।
जैसे कोई लिख रहा हो।
धीरे-धीरे।
रफ़ीक़ ने मेरी तरफ़ देखकर कहा, "उस्ताद, घंटी क्या कह रही है?"
"कुछ नहीं," मैंने कहा।
"पर वो हिली—"
"कुछ नहीं," मैंने फिर कहा। और इस बार मेरी आवाज़ थोड़ी सख़्त थी, और रफ़ीक़ चुप हो गया।
मुझे सच बोलने की आदत है, पर आज रात मुझे लगा कि अगर मैं ये बोलूँ कि घंटी पर लकीरें बन रही हैं, तो पीपल के नीचे खड़े कुछ लोग डरकर घर भाग जाएँगे। और आज रात मुझे किसी को भगाना नहीं था।
आज रात मुझे सबको बाँधना था।
तभी गुनगुनाहट तेज़ हुई।
एकदम तेज़। जैसे किसी ने पुराने रेडियो का वॉल्यूम घुमा दिया हो।
और उस गुनगुनाहट में अब एक और आवाज़ आ गई थी। बहुत धीमी। बहुत दूर। पर साफ़।
किसी के पैरों की आवाज़।
लकड़ी के जूतों की।
टक। टक। टक।
पीपल के नीचे कुछ लोग पीछे हटे। काजल ने मेरा हाथ पकड़ लिया। माँ ने अपनी साड़ी का पल्लू कस लिया। पापा की तरफ़ देखा तो वो सीधे खड़े हो गए थे और उनकी आँखें उसी काली तरफ़ थीं।
और फिर—
फिर वो तेज़ हुई।
ग़ज़ब की तेज़।
जैसे कोई पुरानी चीज़ जाग रही हो, और जागते वक़्त उसने आवाज़ नहीं रोकी हो।
मैंने अपनी जेब में घंटी को कसकर पकड़ लिया।
और मैंने देखा कि उस्ताद मेरी तरफ़ देख रहे थे, और उनके होंठ हिल रहे थे — बिना आवाज़ के, जैसे किसी पुरानी दुआ के शब्द याद कर रहे हों।
शबनम आपा ने कहा, "अंकुश, ये क्या है?"
मैंने कहा, "आपा, आप अंदर चली जाइए—"
"मैं अंदर नहीं जाऊँगी," उन्होंने कहा। "मैंने पंद्रह साल अंदर रहकर गुज़ार दिए। अब नहीं।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा। और मैं मुस्कुरा दिया, क्योंकि उनका ये गुस्सा मुझे अच्छा लगा।
"ठीक है," मैंने कहा।
तभी गुनगुनाहट अचानक बढ़ी और फिर—
रुक गई।
पूरी तरह रुक गई।
जैसे किसी ने आवाज़ को मुट्ठी में दबा दिया हो।
और उस सन्नाटे में, उस सन्नाटे के बीच, जो हँसी थी, जो मिठाई थी, जो टिंकू का मज़ाक था, जो रज़िया के हाथ में पहला कप था — वो सब उस सन्नाटे में डूब गए।
और फिर उस सन्नाटे में से एक आवाज़ आई।
धीमी।
रूखी।
थकी हुई।
पर साफ़।
जैसे कोई बहुत दूर से, बहुत पुरानी चीज़ से, बहुत पुराने आदमी की आवाज़ में बोल रहा हो।
"शंकर…"
पापा के कंधे काँपे।
"शंकर…"
दूसरी बार।
ये नाम था। पापा का नाम।
पीपल के नीचे हर आदमी ने पापा की तरफ़ देखा। माँ ने उनका हाथ पकड़ लिया। काजल ने मेरी कलाई पकड़ ली, इतनी ज़ोर से कि नाखून चुभे।
और पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
उनकी आँखों में वो डर था जो बाईस साल से उनके सीने में बैठा था। और उस डर के पीछे, बहुत पीछे, कुछ और भी था।
कुछ ऐसा जो मुझे पहचानना था।
मैंने उनकी तरफ़ एक कदम बढ़ाया।
"पापा," मैंने कहा, "आप इसे जानते हैं?"
उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया।
"पापा—"
"हाँ," उन्होंने कहा। और उनकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि मुझे उनके होंठों को पढ़ना पड़ा। "मैं इसे जानता हूँ।"
मैंने पूछा, "ये कौन है?"
पापा ने आसमान की तरफ़ देखा। फिर ज़मीन की तरफ़। फिर उन्होंने अपनी कमीज़ की जेब पर हाथ रखा — वो जेब जिसे वो पूरी शाम छू रहे थे — और उन्होंने कहा, "ये वो है जिसने मुझे बचाया था।"
और उसी पल, दूर, उस काले टीले की तरफ़ से — बिजलीघर की तरफ़ से — वो आवाज़ फिर आई।
"शंकर…"
तीसरी बार।
पर इस बार वो रुकी नहीं।
इस बार उसके आगे कुछ और आया।
"शंकर… आ जा।"
पीपल के नीचे हवा रुक गई।
और मेरी जेब में घंटी — ठंडी, सपाट, चुप — अचानक एक बार हिली, और उसने बहुत धीमे, बहुत सूखे स्वर में सिर्फ़ दो शब्द कहे।
"अब नहीं।"
॥
पीपल के नीचे जो सन्नाटा था, वो किसी चीज़ का नहीं, किसी आदमी का नाम था।
पापा का।
और वो नाम हवा में लटका रहा, जैसे पेड़ से कोई सूखा पत्ता टूटकर गिरने से पहले एक पल हवा में रुक जाता है।
पापा ने एक कदम आगे बढ़ाया।
मैंने उनका हाथ पकड़ लिया।
"पापा, नहीं।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो बाईस साल से उनके सीने में बैठी थी, और उसके पीछे कुछ और भी था, जो मुझे पहले कभी नहीं दिखा था। जैसे कोई बूढ़ा आदमी अपने बचपन के दरवाज़े पर खड़ा हो और अंदर जाने से डरे भी और न डरे भी।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "वो मुझे बुला रहा है।"
"मैं जानता हूँ," मैंने कहा। "इसीलिए तुम नहीं जाओगे।"
"बेटा—"
"पापा, सुनो।" मैंने उनका हाथ नहीं छोड़ा। उनकी उँगलियाँ ठंडी थीं, और हथेली पर वो पुरानी गर्मी नहीं थी जो काम करते वक़्त आती है। "आज रात तुम मेरे पास रहोगे। कल मैदान में तुम बोलोगे। जब सारी गली सुन रही होगी, तब बोलोगे। हवा से नहीं। हवा से बोलने वाले की बात कौन सुनता है?"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा और उनका जबड़ा कसा।
माँ ने उनका दूसरा हाथ पकड़ा और कहा, "शंकर, बेटा ठीक कह रहा है। तुम मेरे साथ रहोगे। और अगर तुम्हें जाना ही है, तो मैं भी साथ जाऊँगी।"
पापा ने कहा, "सुशीला—"
"मैंने बाईस साल चुप रहकर तुम्हारी चुप्पी को पाला है," माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो तेज़ी थी जो सुबह पाँच बजे चूल्हे के साथ जागती है। "अब मैं तुम्हें अकेले हवा के मुँह में नहीं छोड़ूँगी।"
उस्ताद आगे आए। उनके हाथ में मशीन की वो पुरानी चाबी थी जो उन्होंने आज सुबह छत से उतारी थी, और उन्होंने उसे धीरे से पापा के कंधे पर रखा।
"शंकर भाई," उस्ताद ने कहा, "जो आवाज़ बुला रही है, वो बुलाने का हक़ रखती है। पर हक़ और हिसाब दोनों एक ही दरवाज़े से नहीं आते। आज रात हम जीतने नहीं जा रहे। आज रात हम सिर्फ़ देखने जा रहे हैं। जो देख लेता है, वो कल बोल सकता है।"
मैंने कहा, "मैं पीछे के रास्ते से जाऊँगा। उस्ताद साथ चलेंगे।"
काजल ने मेरी कलाई नहीं छोड़ी। "मैं भी चलूँगी।"
"नहीं।"
"अंकुश—"
"काजल, सुन।" मैंने उसकी तरफ़ मुड़कर कहा, और मैंने अपनी आवाज़ जितनी सख़्त कर सकता था, उतनी सख़्त की। "मरीज़ अंदर हैं। पीला वार्ड सील है। माँ यहाँ है। अगर आज रात कुछ भी गड़बड़ हुआ और मैं वापस न आया, तो अस्पताल में एक भी आदमी को अकेला नहीं छोड़ना है। समझी?"
काजल की आँखें भर आईं, पर उसने सिर हिला दिया।
टिंकू मेरे सामने आ गया। उसकी आँखों में वो चमक थी जो मुझे बहुत अच्छी लगती है और आज बहुत डरावनी भी।
"उस्ताद, मैं साथ चलूँगा," उसने कहा।
"तू यहाँ राजा है," मैंने कहा।
"राजा युद्ध में नहीं जाते?"
"राजा किले में रहते हैं," मैंने कहा और उसके सिर पर हाथ रखा। "देख टिंकू, मुझे ऊपर से पूरी गली दिखनी चाहिए। मुझे यह जानना है कि इस वक़्त कौन कहाँ है, कौन उठा, कौन बैठा, कौन ग़ायब हुआ। तू, सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू—तुम पाँच पीपल पर रहोगे। कोई उठकर गया तो मुझे पता चलेगा। पाँच जोड़ी आँखें मेरी जेब में। समझा?"
टिंकू ने सीना फुला लिया। "समझा।"
मीरा ने कैमरा मेरी तरफ़ बढ़ाया। "ये ले।"
मैंने मना कर दिया। "नहीं। तू इसे यहीं रख। मैं अंधेरे में जा रहा हूँ, मेरे हाथ में कुछ और होना चाहिए।"
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