The Mysterious Bell – Chapter 1416
"निकलना चाहिए," शबनम आपा ने कहा, "पंद्रह साल का ज़ंग लगा हुआ है।"
मैं उस भीड़ में खड़ा था, और मेरे पास शब्द नहीं थे।
पर मेरे पास घंटी थी।
और मैंने उसे जेब से निकालकर देखा।
वो अभी भी ठंडी थी। पर उस पर वो लकीरें — जो अभी थोड़ी देर पहले अधूरी थीं — वो अब ज़्यादा गहरी दिख रही थीं। पीतल पर लकीरें ऐसे बैठ गई थीं जैसे किसी बूढ़े हाथ की नसें चमड़ी पर बैठ जाती हैं।
और उसके भीतर, बहुत धीमी, बहुत दूर, एक हल्की-सी गर्माहट बची थी। जैसे अंगीठी बुझने के बाद भी राख के नीचे एक कोयला ज़िंदा होता है।
मैंने अपनी कॉपी खोली।
अठहत्तर।
पर कुछ अजीब था। अंक बढ़े थे — ये तो ठीक है — पर मुझे ऐसा लग रहा था कि जब घंटी गरम हुई थी और जब उसने "चालीस अंक, आधे तुम्हारे, आधे उधर" कहा था, तो उसके साथ ही कहीं दूर कुछ और भी हिला था।
कुछ और भी बढ़ा था।
और ये एहसास ऐसा था जैसे आप अपनी जेब में पैसा गिनते हैं और पता चलता है कि आपकी जेब में भी कुछ बढ़ा है, पर उसी वक़्त कोई और आपकी दूसरी जेब में हाथ डालकर मुस्कुरा रहा हो।
उस्ताद अली बक्श मेरे पास आए।
उनकी चश्मे की डंडी कान पर टेप से बँधी थी, और उनके कंधे पर वो पुराना कपड़ा पड़ा था, जो वो अक्सर पहले मशीन के ऊपर डालते थे।
उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा।
"अंकुश," उन्होंने कहा। आवाज़ धीमी थी।
"जी, उस्ताद।"
"अंक बढ़े?"
"बढ़े।" मैंने कॉपी दिखाई। "अठहत्तर।"
उन्होंने कॉपी की तरफ़ देखा, फिर नीचे ज़मीन की तरफ़। फिर उन्होंने एक लंबी साँस ली, जैसे कोई बहुत पुरानी दुकान का शटर उठा रहा हो।
"हर सच्चा जोड़," उन्होंने कहा, "उधर वाले को भी खुराक देता है।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"इसका मतलब?"
"इसका मतलब," उन्होंने कहा, "कि जितनी बड़ी मरम्मत, उतनी बड़ी खुराक। तुम जोड़ते हो, तो उधर वो मज़बूत होता है। हमने पचास साल पहले यही ग़लती की थी — हमने सोचा था कि हम जोड़ेंगे, तो सब ठीक हो जाएगा। पर उधर वाले को जश्न में भी खाना मिलता रहा।"
मैंने कहा, "तो फिर मैं जोड़ूँ या न जोड़ूँ?"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें पुरानी थीं, पर उस वक़्त उनमें वो चीज़ थी जो बूढ़े लोगों की आँखों में तभी आती है जब वो किसी जवान को अपनी पुरानी गलती करते देखते हैं।
"जोड़ो," उन्होंने कहा। "पर जश्न में भी अपनी जेब को मत भूलना।"
मैंने हल्की हँसी में कहा, "उस्ताद, पहले इस रात को बचा लें। हिसाब कल देखेंगे।"
मैंने ये हँसते हुए कहा। पर मेरी आँखें हँस नहीं रही थीं, और उस्ताद ने ये देख लिया। वो कुछ नहीं बोले। उन्होंने बस मेरे कंधे पर हाथ दबाया और पीछे हट गए।
मैंने कॉपी बंद की और घंटी जेब में डाली।
तभी पापा मेरे पास आए।
वो सफ़ेद कमीज़ में थे, और उनकी कमीज़ की जेब पर मैंने हाथ देखा — वो बार-बार उस जेब को छू रहे थे, जैसे जेब में कोई चीज़ हो ही न, पर उँगली को यक़ीन दिला रहे हों कि वो वहाँ है।
"क्या हुआ?" मैंने पूछा।
"कुछ नहीं," उन्होंने कहा। फिर, कुछ देर बाद, "अंकुश, तुम्हारी माँ से कह देना कि मैंने आज रात सब बोलने का सोच लिया है।"
मैंने कहा, "आप खुद कहिए।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"मैं कहूँगा," उन्होंने कहा। "पर ज़ुबान कभी-कभी रास्ते में रुक जाती है। तुम कह देना तो सहारा रहेगा।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
क्योंकि सच ये था कि पापा ने बाईस साल में पहली बार मुझे कुछ ऐसा दिया था जो औज़ार नहीं था, जो पैसा नहीं था — एक छोटी-सी ज़िम्मेदारी थी। और मुझे वो ज़िम्मेदारी अच्छी लगी।
मीरा पीपल के दूसरी तरफ़ खड़ी थी। उसका कैमरा अब भी चालू था, लाल बत्ती जल रही थी। वो शबनम आपा की तरफ़ कैमरा करके कह रही थी, "आपा, एक बात बोलिए—"
"नहीं," शबनम आपा ने कहा।
"सिर्फ़ एक लाइन—"
"मीरा," शबनम आपा ने कहा, "आज मेरी बहन आई है। कैमरा कल आना।"
मीरा ने कैमरा नीचे किया और हँस पड़ी।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो हँस रही थी, पर उसकी आँखों के नीचे वो दाग़ थे जो रात भर जागने से आते हैं, और उसके हाथ में वो मोड़ा काग़ज़ था जो उसने पाँच साल से संभाला हुआ था।
मुझे उस पल लगा — आज रात हर किसी के पास जोड़ने के लिए कुछ है। शबनम आपा के पास बहन है। मीरा के पास रमा मैडम का लिफ़ाफ़ा है। पापा के पास बाईस साल की चुप्पी है। माँ के पास वो हँसी है जो ताले में बंद है।
और मेरे पास क्या है?
मेरे पास एक घंटी है जो ठंडी है, एक कॉपी है जिसमें अठहत्तर लिखा है, और एक पूरी गली है जो आज रात बारह बजे बिजलीघर के पीछे खड़ी होगी।
काफ़ी है, मैंने सोचा।
पर तभी—
तभी दूर से आवाज़ आई।
बिजलीघर से।
वो गुनगुनाहट जो थोड़ी देर पहले रुक गई थी — वो लौट आई थी।
पर इस बार वो पहले जैसी नहीं थी।
पहले वो गुनगुनाती थी। जैसे कोई बंद मुँह से कोई पुरानी धुन गा रहा हो।
इस बार वो तेज़ थी। और साफ़। और—मुझे ये कहने में डर लग रहा है—इस बार उसमें जैसे कोई शब्द था। जैसे कोई बहुत दूर से कोई नाम बोल रहा हो, पर इतनी धीमी आवाज़ में कि कान को यक़ीन न हो।
पीपल के नीचे हँसी धीरे-धीरे कम होने लगी।
सानिया ने कहा, "ये क्या आवाज़ है?"
गुड्डू ने कहा, "आसमान में कोई गाड़ी है क्या?"
रफ़ीक़ ने कहा, "गाड़ी आसमान में क्यों होगी?"
"तो फिर आवाज़ कहाँ से आ रही है?"
और तभी मुझे एहसास हुआ — बबलू।
वो पीपल के उस कोने में बैठा था जहाँ कम रोशनी थी। उसके हाथ में वो पानदान नहीं था, चेन नहीं थी, पीली थैली नहीं थी। उसके हाथ खाली थे और वो उन्हें घुटनों पर रखे हुए बैठा था, और उसका पूरा चेहरा एक ही भाव में जम गया था।
डर।
वो सच में डर रहा था। मैंने बबलू को बहुत बार डरते देखा है — साहब के सामने, हम लोगों के सामने, पकड़े जाने के वक़्त। पर ये डर कुछ और था। ये वो डर था जो आदमी के अंदर बैठा रहता है, जिसे वो भूल जाना चाहता है, पर जो हर उस आवाज़ पर लौट आता है।
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"बबलू।" मैंने कहा।
उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें डबडबा रही थीं।
"ये वही आवाज़ है," उसने कहा।
"कौन-सी?"
"ये वही आवाज़ है," उसने कहा, और उसकी आवाज़ फटने लगी, "जो मैंने बक्से के पास सुनी थी।"
पीपल के नीचे सन्नाटा छा गया।
शबनम आपा गुमटी से बाहर आईं। रज़िया उनके पीछे थी, कप अब भी हाथ में। उन्होंने घूरकर बिजलीघर की तरफ़ देखा, जो पीपल से दूर था, और रात में सिर्फ़ एक काला टीला लग रहा था।
"कितनी दूर है?" उन्होंने पूछा।
"आधा किलोमीटर," दुबे अंकल ने कहा। उन्होंने छड़ी से ज़मीन को टोहा, जैसे हिसाब लगा रहे हों। "से कम। ज़्यादा नहीं।"
"और यहाँ तक सुनाई दे रही है?" मीरा ने कहा।
"हाँ," उस्ताद ने कहा। उन्होंने अपना चश्मा ठीक किया। "पर ये आवाज़ ऐसे नहीं आती जैसे मशीन की आवाज़ आती है। ये आवाज़ ऐसे आती है जैसे—"
वो रुक गए।
"जैसे क्या, उस्ताद?" मैंने पूछा।
"जैसे किसी बंद कमरे में कोई बच्चा गा रहा हो," उन्होंने कहा। "और आवाज़ दीवार के पार सुनाई दे रही हो।"
मैं उस वक़्त खुद को समझा रहा था। हवा, मैंने सोचा। शायद कहीं से ट्रक की आवाज़ है। शायद बिजली का सामान है। शायद किसी के घर में पुराना पंखा चल रहा है और उसकी घरघराहट दूर तक जा रही है।
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