The Mysterious Bell – Chapter 1415
मैंने पीछे हटकर अपनी घंटी उठाई।
वो अब भी गरम थी।
और फिर उसने फुसफुसाया, इतना धीमे कि सिर्फ़ मैंने सुना — "अब अगला हाथ नीचे है।"
मैंने गर्दन उठाई।
दूर, पुराने बिजलीघर की तरफ़, वो गुनगुनाहट अब और तेज़ थी। आधी आवाज़ मेरी ओर, आधी नीचे की ओर — जैसे ज़मीन के भीतर कोई चीज़ जाग रही हो।
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।
उन्होंने मेरी ओर देखा और धीरे से कहा, "अंकुश। अब सवाल चूड़ी का नहीं। अब सवाल हाथ का है।"
"कौन सा हाथ?" मैंने पूछा।
उस्ताद ने अपनी मशीन की तरफ़ देखा, जो उनके पीछे पीपल के नीचे रखी थी। उन्होंने कहा, "जो अभी तक नहीं खुला।"
मैंने घंटी अपनी जेब में रखी।
मैंने शबनम आपा की तरफ़ देखा — वो रज़िया के कंधे पर सिर रखे बैठी थीं, और उनके चेहरे पर कुछ ऐसा था जो पंद्रह साल में मैंने कभी नहीं देखा था। सुकून नहीं। सिर्फ़… खुलापन। जैसे कोई पुराना बंद कमरा चल दिया हो।
मैंने कहा, "आपा।"
उन्होंने सिर उठाया।
"आज रात बारह बजे," मैंने कहा, "मुझे आपकी ज़रूरत है। भूमि पर, असली सभा में, जहाँ बक्सा खुलेगा।"
उन्होंने एक पल सोचा।
फिर उन्होंने कहा, "चूल्हा अब बंद कर दूँगी।"
और रज़िया ने कहा, "मैं चूल्हा जलाऊँगी। तू बोलना।"
शबनम आपा ने अपनी बहन की तरफ़ ऐसे देखा जैसे पहली बार देख रही हों।
और फिर — मैंने पीपल के नीचे पहली बार देखा — वो हँसीं।
बहुत छोटी हँसी। पर हँसी।
और उस हँसी में चूल्हे की आवाज़ थी, और तेज़ ज़ुबान की आवाज़ थी, और माँ की आवाज़ भी थी — बहुत दूर से आती हुई, जैसे कोई छत से नीचे बुला रहा हो।
मैंने कॉपी में लिखा — अड़तीस से अठहत्तर।
फिर मैंने उसके नीचे लिखा — "शबनम आपा — चूल्हा, ज़ुबान, और बहन।"
और तभी — दूर, पुराने बिजलीघर से — वो गुनगुनाहट अचानक रुक गई।
पूरी तरह। चुप।
पीपल के पत्तों में भी हवा रुकी।
और मेरी जेब में घंटी ठंडी हो गई।
मैंने घंटी निकाली। वो ठंडी थी। सपाट। जैसे कोई पुरानी लकड़ी की टुकड़ी।
मैंने अपनी आँखें सिकोड़कर उसे देखा।
और उस पर वो नई पतली लकीर — जो अभी थोड़ी देर पहले उभरी थी — वो अब गहरी हो गई थी। बल्कि मैं कहूँगा कि उस लकीर के बगल में एक और लकीर शुरू हो गई थी।
छोटी। आधी। अधूरी।
जैसे कोई लिखने लगा हो और रुक गया हो।
मैंने सिर उठाकर दुबे अंकल की तरफ़ देखा।
वो पहले से मेरी तरफ़ देख रहे थे।
उन्होंने कहा, "क्या हुआ?"
मैंने कहा, "कुछ नहीं।"
पर मैं झूठ नहीं बोल सकता था उस वक़्त। मैंने कहा, "कुछ शुरू हो रहा है।"
और मैंने उस पल फैसला किया — कि चाहे जो हो, आज रात बारह बजे, जब वो बक्सा खुलेगा, वहाँ पर सिर्फ़ मैं और पापा नहीं होंगे। वहाँ पूरी गली होगी। शबनम आपा होंगी, रज़िया होगी, टिंकू होगा, सानिया होगी, गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू होंगे, माँ होंगी, दुबे अंकल होंगे, उस्ताद होंगे, मीरा होगी, शालिनी होगी, भोला भाई होंगे, नसीमा बाई होंगी, बूढ़े काका होंगे, बबलू होगा।
उस रात जो भी होगा, अकेले नहीं होगा।
मैंने घंटी को जेब में वापस रखी।
फिर मैंने पीपल के नीचे बैठी दोनों बहनों की तरफ़ देखा।
और मैंने धीरे से कहा, "आपा, आपका चूल्हा आज रात गुमटी में नहीं जलेगा।"
शबनम आपा ने सिर उठाया।
"क्यों?" उन्होंने पूछा।
"क्योंकि आज रात," मैंने कहा, "वो चूल्हा गली के बीच जलेगा। सबके सामने।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। फिर रज़िया की तरफ़।
और फिर उन्होंने कहा, "ठीक है।"
रज़िया ने कहा, "मैं लकड़ी लाऊँगी।"
टिंकू ने ऊँची आवाज़ में कहा, "मैं माचिस लाऊँगा।"
पीपल के नीचे कई लोग हँसे।
पर ये हँसी पुरानी नहीं थी।
ये हँसी वो थी जो आदमी तब हँसता है जब उसे पता हो कि कुछ बड़ा आने वाला है और वो अकेला नहीं है।
मैंने कॉपी बंद की।
और मेरी जेब में, ठंडी पड़ी घंटी ने बहुत धीमे से कहा, इतना धीमे कि सिर्फ़ मैंने सुना — "अब सुबह तक खेल ख़त्म नहीं होगा।"
मैंने आसमान की तरफ़ देखा।
पीपल की डालियों के बीच से आधा चाँद दिख रहा था। पूरा नहीं। आधा।
और मुझे लगा कि आज रात के बाद, ये गली पहले जैसी नहीं रहेगी।
क्योंकि शबनम आपा ने अपना चूल्हा बंद करने का फैसला किया था — और जिस औरत का चूल्हा बंद हो जाए, उसके बाद वो औरत जो बोलती है, वो पूरी गली सुनती है।
दूर, बिजलीघर की तरफ़, गुनगुनाहट एक बार फिर उठी।
छोटी। फुसफुसाती। जैसे कोई किसी का नाम ले रहा हो।
और मैंने पीपल के नीचे खड़े होकर, अपनी जेब में हाथ डालकर, उस घंटी को छुआ जो अब ठंडी थी, पर जिसकी लकीरें गहरी हो रही थीं।
और मैंने धीरे से कहा, "अब जो भी होगा, सबके सामने होगा।"
॥
तालियाँ पहले धीमी शुरू हुईं।
जैसे किसी को यक़ीन नहीं हो रहा हो कि ये सच में हो गया। फिर धीरे-धीरे हाथ खुलने लगे, और फिर पूरा पीपल गूँज उठा। कोई सीटी बजा रहा था। कोई "हो गया, हो गया" कह रहा था। बच्चे चबूतरी पर चढ़कर कूदने लगे, और दुबे अंकल अपनी छड़ी से ज़मीन पर ताल ठोंक रहे थे, जैसे ढोल बजा रहे हों।
रज़िया खड़ी थी, और उसका चेहरा ऐसा था जैसे किसी ने उसके सिर से कोई बहुत भारी पत्थर उतार दिया हो।
शबनम आपा ने उसका हाथ पकड़ा।
"चल," उन्होंने कहा, "अंदर चल।"
"क्यों?" रज़िया ने पूछा।
"क्योंकि पंद्रह साल से तेरे हाथ में मेरी गुमटी की चाय का कप नहीं आया है।"
रज़िया हँसी — और वो हँसी टूटी हुई थी, किसी पुराने रोने के आख़िरी किनारे से निकली हुई।
शबनम आपा उसे गुमटी के अंदर ले गईं। गुमटी के अंदर का बल्ब आज बहुत तेज़ जल रहा था। मैंने देखा — उन्होंने चूल्हे पर रखी केतली उठाई, कप में चाय डाली, और वो कप रज़िया के हाथों में पकड़ा दिया।
पहला कप।
रज़िया ने कप दोनों हाथों से पकड़ा। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं। उसने चाय पी। फिर उसने कप को सीने से लगा लिया, जैसे कोई बच्चा खिलौना लगा लेता है।
"गरम है," शबनम आपा ने कहा।
"हाँ," रज़िया ने कहा।
"फूँक मारकर पी।"
"हाँ।"
और बस। दोनों के बीच पंद्रह साल की कोई बात नहीं थी। सिर्फ़ "गरम है" और "हाँ"।
मुझे यही चीज़ हमेशा अजीब लगती है। हम सोचते हैं कि बड़ी बातें, बड़े शब्द, बड़े समझौते रिश्ते जोड़ते हैं। पर नहीं। चाय का एक कप जोड़ता है। "गरम है" — दो शब्द जोड़ते हैं।
गुमटी के बाहर टिंकू की आवाज़ आई।
"आपा!" वो चिल्लाया। "अब समोसे भी दो हिस्सों में बँटेंगे क्या?"
शबनम आपा ने बाहर आकर उसे ऐसा घूरा कि टिंकू एक कदम पीछे हट गया।
"क्यों?" उन्होंने पूछा। "समोसा क्यों बँटेगा?"
"क्योंकि—" टिंकू ने आँखें बड़ी करके कहा, "—क्योंकि अब एक हिस्सा बहन का भी होगा न!"
पीपल के नीचे सब हँसने लगे। सानिया की हँसी सबसे ऊँची थी। गुड्डू हँसते-हँसते पीपल के तने से टिक गया। चिंटू ने अपना समोसा हवा में उठाकर दिखाया और कहा, "देखो, ये आधा मेरा, आधा—" और फिर वो रुक गया, क्योंकि उसे समझ नहीं आ रहा था कि आधा किसका होगा।
रफ़ीक़ ने कहा, "भूखे का।"
और सब फिर हँस पड़े।
शबनम आपा ने गुमटी से बाहर आकर, दोनों हाथों में समोसे की थाली उठाकर कहा, "आज सब खाओ। पैसा मेरा।" फिर उन्होंने एक पल रुककर जोड़ा, "और हिसाब मेरा, कोई और नहीं।"
भोला भाई ने ताली बजाई। नसीमा बाई ने कहा, "आपा, आज तो आपके मुँह से निकल रहा है।"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno