The Mysterious Bell – Chapter 142
वो हाथ अंगूठे को स्याही में डुबाने ही वाला था कि उसके मालिक ने कुछ कहा।
"मैं अंगूठा लगा रहा हूँ," आवाज़ आई। "पर एक बात साफ़ कर लो। मेरा नाम इस काग़ज़ पर ऐसे नहीं आएगा कि मेरा बेटा इसे कभी पढ़े और मुझसे नज़र न मिला सके।"
मैं जम गया।
वो आवाज़।
वो आवाज़ मैंने पूरी ज़िंदगी सुनी थी — छोटे वाक्यों में, रसोई में, अँधेरे में, हमेशा से एक कदम पीछे खड़ी।
ये मेरे दादा थे। जगदीश यादव।
उनका चेहरा मैंने केवल तस्वीरों में नहीं, किसी ने बताया भी नहीं था। पर जब वो इस तरह बोले, मुझे कोई पहचान चाहिए ही नहीं थी। मुझे लगा जैसे पापा के चेहरे से बीस साल उतार दिए गए हों और सामने खड़ा कर दिया हो।
"लगाओ," तीसरे आदमी ने कहा, और इस बार उसकी आवाज़ में मिठास कम थी, जल्दी ज़्यादा।
दादा ने अंगूठा स्याही में डुबाया और काग़ज़ पर लगा दिया।
लाल निशान बन गया। उसने हाथ पीछे खींच लिया, और मैंने देखा कि उनकी उँगलियाँ काँप रही थीं, और वो काँपती उँगलियाँ उन्होंने जल्दी से कुर्ते में छिपा लीं, जैसे बच्चा कोई चोरी की चीज़ जेब में छिपाता है।
उस्ताद ने काग़ज़ उठाया। देखा। सिर हिलाया, और फिर बोले, "गवाह में मेरा नाम।"
"नहीं," तीसरे आदमी ने कहा। "गवाह मैं भरूँगा। तुम बैठो।"
इलियास ने आगे कदम बढ़ाया।
"नहीं," इलियास ने कहा, और इस बार उनकी आवाज़ में वो डर नहीं था जो पच्चीस साल बाद गुमटी की मेज़ पर था। कुछ और था। "गवाह तुम नहीं। गवाह वो जो यहाँ का है।"
और तब वही हुआ जो मुझे देखना था और जिसे देखने के लिए मैं तैयार नहीं था।
उस्ताद ने मेज़ से घंटी उठाई — वो पीतल की, फूल वाली घंटी। उसे अपनी हथेली में रखा, और उसे इलियास की तरफ़ बढ़ाया।
और तीसरे आदमी का हाथ आगे आया।
उसने घंटी उस्ताद के हाथ से नहीं छीनी।
उसने घंटी को उस्ताद के हाथ में ही ऐसे पकड़ा जैसे कोई डॉक्टर घाव को दबाता है — दो उँगलियाँ ऊपर, अंगूठा नीचे।
और एक ही झटके में घंटी का ऊपरी हिस्सा अलग हो गया।
चट।
ऐसी आवाज़ नहीं जैसे लोहा टूटता है। ऐसी आवाज़ जैसे किसी के दाँत अंदर से टूट रहे हों।
उस्ताद की हथेली में घंटी का आधा हिस्सा रह गया, और नीचे मेज़ पर एक चमकता टुकड़ा गिरा और लुढ़ककर रुक गया।
और उस टुकड़े से एक आवाज़ आई।
नहीं — आवाज़ नहीं। कुछ और। जैसे घंटी जो बजने से पहले हवा में एक झुरझुरी बनाती है, वो झुरझुरी टूट गई और मेज़ पर गिर गई।
मैंने अपने दोनों हाथ कानों पर रख लिए।
और तभी इलियास बीच में आ गए। वो सच में बीच में आ गए — मेज़ और उस्ताद के बीच, और उन्होंने अपनी दोनों हथेलियाँ उठा दीं, जैसे कोई गिरती हुई चीज़ को हवा में थामने की कोशिश करता है।
"बस," इलियास ने कहा। "अब नहीं। ये नहीं। ये आख़िरी चीज़ है, इसे मत तोड़ो।"
"ये कोई चीज़ नहीं है," तीसरे आदमी ने कहा। "ये एक औज़ार है। और औज़ार जिसका हो, वो अपनी मर्ज़ी से चलाएगा।"
"और जिसका नहीं हो?" उस्ताद ने कहा, बहुत धीमे से, बहुत सादगी से, जैसे कोई हिसाब में फ़र्क़ बता रहा हो।
"तो वो औज़ार नष्ट कर देता है," तीसरे आदमी ने कहा। "ताकि कोई और उठाकर उससे अपनी चीज़ न बना ले।"
"अपनी चीज़," उस्ताद ने दोहराया। "तुम्हारे मुँह से ये शब्द अच्छा नहीं लगता।"
तब रणवीर बोला।
वो अब तक चुप खड़ा था, सिर्फ़ देख रहा था, और उसकी मुस्कान बदल नहीं रही थी। वो आगे आया और उसने मेज़ पर गिरा पीतल का टुकड़ा उठा लिया। उसे उँगलियों में घुमाया, जैसे कोई सिक्का घुमाता है।
"उस्ताद," रणवीर ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो मिठास थी जो आज टीवी पर बोलते वक़्त भी आती है। "आप इस चीज़ को बहुत बड़ा मान रहे हैं। ये पीतल है। पाँच रुपये किलो।"
"पीतल पाँच रुपये किलो है," उस्ताद ने कहा। "और मेरा भाई पीतल से नहीं बनता।"
रणवीर हँसा।
हँसा, और उस हँसी में कुछ नहीं था — न मज़ाक, न शरारत, न कोई गरमी। कोई ज़रूरत न हो तो हँसते हैं न, इसलिए हँस देते हैं। यही बात उसकी हँसी में थी। और वो हँसी इस पूरे दृश्य की सबसे ठंडी चीज़ थी। दीवार से भी ठंडी। घंटी से भी ठंडी।
उसने पीतल का टुकड़ा जेब में डाला, फिर काग़ज़ की तरफ़ देखा, और बोला,
"चलो। अंगूठा हो गया। अब बाकी काग़ज़।"
"कौन से काग़ज़," दादा ने कहा। ये उनकी पहली बात थी जिसमें गुस्सा था, और मुझे लगा जैसे वो गुस्सा मेरे भीतर भी पुराना बैठा हुआ है, मुझे भी उसका इस्तेमाल करना है।
"वही जो तुम्हारे गले में लटकता है," रणवीर ने कहा। वो मुस्कुराया। "ताले वाली चाबी। कहो, वो ताला कहाँ है।"
मैंने अपनी गर्दन की तरफ़ बिना सोचे हाथ बढ़ा दिया, और उँगलियों में मेरी चाबी आई, जो आज भी उसी धागे से लटक रही है, जो उस दिन मेरे गले में थी नहीं, मेरे दादा के गले में थी।
दादा ने उत्तर नहीं दिया।
वो मेज़ पर रखे काग़ज़ों की तरफ़ देखते रहे, और देखते रहे, और फिर उन्होंने अपना हाथ उठाया और उसे मेज़ पर रख दिया, खुली हथेली से, जैसे कोई कह रहा हो — मेरे पास बस यही है।
और फिर धुंधलापन आया।
पहले कोनों से। पहले मेज़ के किनारे से, फिर दीवार से, फिर उस्ताद के कंधे से, और मैंने जाना कि परत बंद हो रही है। बाहर की ओर जानेवाली कोई घड़ी ऐसे घूम रही थी जैसे उसने सिर्फ़ एक लम्हा दिखाने का वादा किया था और अब हिसाब चुका रही हो।
पर मैं रुका रहा।
नहीं रुका — मैं जानबूझकर खड़ा रहा, जब तक सब कुछ white नहीं हो गया… नहीं, गलती हुई मुझसे। कोई अंग्रेज़ी शब्द नहीं। मैं कहता हूँ — सब कुछ सफ़ेद नहीं हुआ, सब कुछ उस पीले रंग में बदल गया जो अस्पताल की दीवार का है।
और मैं अपने कमरे के फ़र्श पर घुटनों पर गिर गया।
घुटने चुभे। हाथ फ़र्श से चिपके रहे। मेरे मुँह से निकला — कुछ नहीं निकला। सिर्फ़ साँस। साँस जो बाहर जाती थी पर अंदर नहीं आ रही थी।
दरवाज़ा खुला और टिंकू अंदर आया, और उसकी आवाज़ बहुत दूर से आई।
"उस्ताद!" उसने मेरे कंधे पकड़े। "उस्ताद, उठिए! सानिया, जल्दी आ!"
सानिया और गुड्डू और रफ़ीक़ तीनों अंदर आ गए। कोई पानी लाया। गुड्डू ने मेरे चेहरे पर हाथ फेरा, और उसकी हथेली में मिट्टी थी, और मुझे लगा मैं वहीं पड़ा हूँ, पीछे के प्लॉट में, गड्ढे के किनारे।
"मैं ठीक हूँ," मैंने कहा, और मेरी अपनी आवाज़ सुनकर मुझे लगा जैसे किसी और की आवाज़ सुन रहा हूँ। "पानी दे।"
पानी आया। पुराना स्टील का गिलास उसी हाथ ने पकड़ाया जिसे मैंने गिरधारी और मोहन को दिया था। मैंने पूरा पी लिया और गिलास फ़र्श पर रख दिया, और फिर पीछे झुककर अलमारी से पीठ टिका दी।
कमरे में चुप्पी थी। बल्ब का गुनगुनाना भारी लग रहा था, जैसे वो भी छुपकर सब सुन रहा हो।
"उस्ताद," टिंकू ने धीरे से कहा, और इस बार "उस्ताद" उसने ऐसे कहा जैसे किसी को नींद से उठा रहा हो। "आपने क्या देखा?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। बच्चा था, तेरह साल का, घुटने पर पट्टी बँधी, आँखों में वही तेज़ी जो हर वक़्त सवाल पूछती है। मुझे लगा अगर मैंने इससे झूठ बोला तो घंटी मेरे हाथ में ठंडी हो जाएगी।
"मैंने अपने दादा को देखा," मैंने कहा। "काग़ज़ पर अंगूठा लगाते हुए।"
टिंकू की आँखें बड़ी हो गईं।
"और?"
"और मैंने वो हाथ देखा जिसने घंटी तोड़ी," मैंने कहा। "वो हाथ मेरे दादा के हाथ नहीं थे, टिंकू।"
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