The Mysterious Bell143 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 143

7 min read November 5, 2026

मैंने साँस ली।

"वो किसी तीसरे आदमी के थे। चमकते जूतों वाला कोई आदमी, जिसके हाथ में एक काग़ज़ था जिसके कोने पर लाल निशान था। और वहाँ एक चौथा भी था — बहुत जवान, सफ़ेद कमीज़ में। रणवीर भारद्वाज।"

टिंकू ने कुछ नहीं कहा। वो बैठ गया, मेरे सामने, फ़र्श पर, और उसने अपने घुटने सीने से लगा लिए।

"और इलियास चाचा?" सानिया ने पूछा। "वो वहाँ थे?"

"थे," मैंने कहा। "और उन्होंने बीच में आकर रोका। उन्होंने कहा — बस, अब नहीं। ये आख़िरी चीज़ है, इसे मत तोड़ो।"

मैंने हथेली खोली, जिसमें पट्टी रखी थी।

अब वो ठंडी नहीं थी। गरम थी, हल्की गरम, जैसे थोड़ी देर पहले किसी की जेब में रही हो।

और तब घंटी बोली।

उसकी आवाज़ आज पहले बहुत कठोर नहीं थी। थोड़ी धीमी थी, थोड़ी… कुछ और।

"देख लिया," उसने कहा।

"देख लिया," मैंने कहा।

"तो अब सुन। और इस बार मैं सवाल नहीं पूछूँगी। ये बस कहूँगी।"

"कह।"

"तेरा दादा मुजरिम नहीं था। वो भी बचाने आया था।"

मैंने आँखें बंद कर लीं।

"बचाने?" मैंने कहा। "वो अंगूठा लगा रहा था। वो काग़ज़ पर अपना नाम डाल रहा था।"

"वो काग़ज़ पर अपना नाम डाल रहा था," घंटी बोली, "क्योंकि उस काग़ज़ पर तुम्हारा नाम न आए, यही वो चाहता था। वो आया था दुकान बचाने, और जानता था कि उससे दुकान नहीं बचेगी। इसलिए उसने सिर्फ़ एक चीज़ बचाई — तुम्हें।"

कमरा शांत था। गुड्डू ने खाँसी रोक ली।

"और वो हाथ," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ फटी। "जिसने घंटी तोड़ी?"

घंटी कुछ देर चुप रही। फिर बोली, इतने धीमे स्वर में कि मुझे लगा वो मेरी हथेली से नहीं, मेरी हड्डी से बोल रही है।

"वो हाथ आज भी ज़िंदा हैं।"

और मैं उस फ़र्श पर बैठा रह गया, हाथ में पीतल की पट्टी लिए, और पीछे के प्लॉट की तरफ़ से किसी ट्रक का हॉर्न बजा — लंबा, दूर से आता, अस्पताल की दीवार को छूकर लौट जाने वाला हॉर्न।

टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा और कहा, "उस्ताद, वो तीसरा आदमी कौन था?"

मैंने पट्टी अपनी जेब में रखी, और उठकर खड़ा हो गया, और अपने घुटने झाड़े, और उसका जवाब देने से पहले घंटी की तरफ़ देखा।

घंटी ने कुछ नहीं कहा। वो चुप थी, पर उस चुप्पी में वो बात थी जो मुझे अभी अंदर से खुद ढूँढनी थी।

"पता नहीं," मैंने कहा। "पर एक बात पता है। वो आज भी ज़िंदा है, और आज भी उसके जूते चमकते होंगे।"

॥

मैं सीधे घर की तरफ़ चला। पीछे के प्लॉट से गुज़रते वक़्त मैंने एक बार पीछे मुड़कर नहीं देखा, क्योंकि मुझे पता था अगर देखा तो वहीं बैठ जाऊँगा। गड्ढा, फावड़ी, मिट्टी का ढेर, और उसके पीछे अस्पताल की पीली दीवार — ये सब मुझे बुला रहे थे, जैसे कोई कहे, आ जा, और थोड़ा खोद ले, और थोड़ा सच निकाल ले। पर आज नहीं। आज मुझे घर जाना था।

गली में शाम का वक़्त था। शबनम आपा की गुमटी पर कोयले की गरमी और समोसे की महक हवा में तैर रही थी। उस्ताद की दुकान से आज सिलाई मशीन की आवाज़ नहीं आ रही थी, सिर्फ़ दरवाज़े की कुंडी चुपचाप लटक रही थी। पीपल के नीचे चबूतरी खाली थी — बुज़ुर्ग अपने-अपने घर चले गए थे, और चबूतरी पर सिर्फ़ एक बूढ़ा रूमाल पड़ा था, जिसे किसी ने भूलकर छोड़ दिया था। गुड्डू और रफ़ीक़ दूर खड़े मुझे देख रहे थे, पर आज किसी ने कुछ नहीं पूछा। बच्चे भी समझ गए थे कि आज उस्ताद के पास वक़्त नहीं है।

घर का दरवाज़ा खुला था। अंदर से पंखे की धीमी खड़खड़ाहट आ रही थी। पापा फ़र्श पर बैठे थे, उसी पुराने पंखे के पास, जिसका तार टूटा हुआ था और जिसे वो पिछले तीन दिन से ठीक करने के बहाने बस छूते रहते थे। उनके सामने औज़ार बिखरे थे — पेचकस, प्लायर, तार का एक टुकड़ा, और एक छोटा टेप। कुछ भी जुड़ा नहीं था। मुझे लगा वो पंखा नहीं, कुछ और ठीक करने की कोशिश कर रहे थे, जो उनके हाथ में नहीं आ रहा था।

"पापा।"

उन्होंने सिर उठाया। चश्मा कान पर टेप से बँधा था, और उसकी एक डंडी कुछ दिनों से ढीली थी। उन्होंने मुझे देखा और फिर मेरे हाथ देखे। मेरी जेब से पीतल की पट्टी का कोना बाहर झाँक रहा था, जैसे कोई चोर दरवाज़े से आधा मुँह निकालकर देख रहा हो।

"क्या लाया?" उन्होंने पूछा।

मैंने जूते उतारे, फ़र्श पर बैठ गया, और पट्टी जेब से निकालकर उनके सामने रख दी। रसोई की लाइट कम थी, पर पीतल ने अपनी चमक नहीं छोड़ी थी। पट्टी पर दो लाइनें खुदी थीं। ऊपर — जगदीश यादव। नीचे — साइकिल। और बीच में छेद, जिसमें मेरी गले की चाबी तीन चौथाई तक फिट हुई थी।

पापा ने पट्टी को नहीं उठाया।

वो बस देखते रहे, बहुत देर तक, जैसे कोई पुराना नाम पढ़ रहे हों जिसे पढ़ना उन्होंने बंद कर दिया था।

"ये पीछे के प्लॉट से निकली," मैंने कहा। "उसी जगह से, जहाँ अस्पताल की दीवार के नीचे आज सुबह से गड्ढा खोदा जा रहा है। बच्चों ने देखा। सानिया ने पहले देखा।"

पापा की उँगली धीरे से पट्टी के किनारे पर गई और फिर रुक गई।

"और पापा," मैंने कहा, "मैंने घंटी की पुरानी परत खोली।"

तब उनका सिर उठा।

"क्या?"

"सत्तर अंक लगे," मैंने कहा। "मेरा हिसाब दो सौ अठाईस था। अब एक सौ अठ्ठावन बचा है। मैंने पच्चीस साल पहले का एक पल देखा, अपनी आँखों से। वही दुकान, वही गली, वही बिजलीघर का मोड़। और उसमें दादा थे।"

पापा ने औज़ार रख दिए।

"दादा काग़ज़ पर अंगूठा लगा रहे थे," मैंने कहा। "उनके सामने कोई सफ़ेद काग़ज़ था। और उस काग़ज़ के पास एक आदमी खड़ा था जिसके जूते चमकते थे और जिसके हाथ में एक और काग़ज़ था जिसके कोने पर लाल निशान था। इलियास चाचा वहाँ थे। जवान उस्ताद वहाँ थे। और एक चौथा आदमी भी था — जवान, सफ़ेद कमीज़ में। रणवीर भारद्वाज।"

पापा की साँस छोटी हो गई। वो कुछ देर चुप रहे और उनकी गर्दन की नस दबी रही, जैसे कोई रस्सी खींच रहा हो।

"और उस चमकते जूतों वाले आदमी ने घंटी तोड़ी," मैंने कहा। "इलियास चाचा ने हाथ उठाकर रोका — बस, अब नहीं। ये आख़िरी चीज़ है। पर वो नहीं रुका। उसने घंटी मेज़ पर पटकी, और घंटी टूट गई। और रणवीर ने टूटा पीतल का टुकड़ा उठाकर जेब में डाल लिया। फिर उसने दादा से पूछा — ताले की चाबी कहाँ है।"

मैंने एक पल रुककर अपनी साँस सँभाली।

"दादा चुप रहे। उन्होंने कुछ नहीं कहा। उन्होंने बस अपनी हथेली मेज़ पर खोलकर रख दी, जैसे कह रहे हों, मेरे पास बस यही है।"

कमरे में पंखे की खड़खड़ाहट भी अचानक शर्मिंदा लगने लगी।

पापा ने बहुत धीरे से, बिल्कुल सपाट आवाज़ में, वो शब्द कहे जो मैंने कभी उनके मुँह से नहीं सुने थे।

"मैं बताता हूँ।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा। वो सीधे बैठ गए। उनकी कमर आज झुकी नहीं थी। चश्मा वही टेप वाला था, पर आँखें आज किसी और आदमी की थीं।

"तेरे दादा ज़मीन नहीं बेच रहे थे," पापा ने कहा। "वो उस काग़ज़ पर अंगूठा अपने बेटे को बचाने के लिए लगा रहे थे।"

मैं कुछ नहीं बोला।

"उन दिनों मेरे ऊपर एक इल्ज़ाम था," पापा ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो झिझक नहीं थी जो पिछले पाँच साल से थी। "बिजलीघर के पीछे वाली गली में उस वक़्त एक पुरानी साइकिल की दुकान थी। किसी ने कहा कि मैंने उस दुकान से चीज़ें उठाईं। चोरी का इल्ज़ाम नहीं था, उससे भी बुरा था — कहा गया कि मैंने किसी बंधक रखी साइकिल को बेच दिया। बात झूठी थी, पर उस वक़्त उस बात को सच बनाने वाले दो गवाह मिल गए थे।"

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