The Mysterious Bell – Chapter 1411
"आज रात बारह बजे से पहले मुझे पीपल के नीचे पूरी गली चाहिए। हर वो आदमी जो बाईस साल से डरकर चुप बैठा है। हर वो औरत जो अपना नाम किसी काग़ज़ पर नहीं लिखवाना चाहती थी। हर वो बच्चा जो जानता है कि उसके अब्बा साइट पर कितनी मज़दूरी लेते हैं और घर में क्या बताते हैं।"
बबलू ने कहा, "इतनी रात को कोई नहीं आएगा। लोग डरते हैं।"
"तो हम डर का इलाज करेंगे," मैंने कहा। "और इलाज आज चाय से शुरू होगा।"
बबलू ने मुझे देखा, जैसे मैंने कुछ ऐसा कहा हो जो उसे समझ नहीं आया। फिर वो धीरे से हँसा — पहली बार उस शाम। उसकी हँसी खुरदुरी थी, जैसे बरसों से बंद कमरे का दरवाज़ा खुला हो।
"तू अजीब लड़का है, उस्ताद," उसने कहा। "तेरे पास जवाब नहीं होते। तेरे पास सिर्फ़ काम होते हैं।"
"जवाब भी हैं," मैंने कहा। "पर जवाब देने से पहले मैं लोगों को एक जगह बैठाना चाहता हूँ। जवाब अकेले में सोचे जाते हैं, पर सच सिर्फ़ भीड़ में बोला जाता है।"
बाहर निकलते वक़्त आसमान में तारे निकल आए थे।
गली में वो अजीब सी खुशबू थी जो आग बुझने के बाद रात में आती है — गीली राख, जली घास और ठंडी मिट्टी की। स्कूल की पिछली बाउंड्री से अभी भी धुआँ उठ रहा था, पतला, जैसे कोई सिगरेट बुझा कर चला गया हो।
दुबे अंकल बच्चों के साथ वहीं खड़े थे। उन्होंने मुझे देखा और सिर हिलाया।
"कुछ और नहीं जला," उन्होंने कहा। "रजिस्टर बच गए। पर अगर ये लोग एक बार और आए, तो मैं अपनी छड़ी से नहीं, अपनी किताब से लड़ूँगा।"
"आज रात कोई नहीं आएगा, अंकल," मैंने कहा।
"कैसे पता?"
"क्योंकि आज रात उनका आदमी बक्से के पास होगा। और जो आदमी बक्से के पास होता है, वो आग जलाने के लिए आदमी नहीं भेज सकता। उसे अपने आस-पास सब चाहिए होता है।"
दुबे अंकल ने मुझे देखा। उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो बूढ़े सिपाही की आँखों में तब आती है जब कोई लड़का उन्हें ऐसी बात बता दे जो उन्हें खुद सोचनी चाहिए थी।
"तू ठीक कहता है," उन्होंने कहा। "पर फिर भी मैं यहीं बैठूँगा। मेरी कुर्सी यहीं रहेगी।"
फिर शाम ढल गई — नहीं, शाम नहीं, रात ढल रही थी, ऊपर की तरफ़।
पीपल के नीचे पहले सिर्फ़ दो दीये जले। फिर चार। फिर आठ। फिर मैंने गिनना छोड़ दिया।
बच्चों ने मिट्टी के दीये बनाए थे, असली वाले, जो मेले में मिलते हैं — छोटे, टेढ़े, किसी के किनारे पर अँगूठे का निशान। तेल शबनम आपा की रसोई से आया, और बत्तियाँ पुराने कपड़े को फाड़कर बनाई गईं।
सानिया दीये जलाने में उस्ताद थी। उसने हर दीये को तीन बार फूँका, दो बार बुझाया, और फिर जब जला तो चिल्लाकर सबको बुलाया, जैसे उसने आग नहीं, कोई खज़ाना खोजा हो।
गुड्डू ने दीयों को पीपल की जड़ के पास एक गोल घेरे में रखा।
रफ़ीक़ ने हर दीये के पीछे एक पत्थर रखा, ताकि हवा से न गिरें।
चिंटू ने पूरे चौक का चक्कर लगाकर बताया कि कहाँ-कहाँ अंधेरा है और कहाँ रोशनी पहुँच रही है — जैसे वो कोई सरकारी अफ़सर हो।
और धीरे-धीरे लोग आने लगे।
पहले वो आए जो रोज़ आते हैं — भोला भाई, अपनी पतलून पहने, हाथ में कुछ नहीं, पर आँखों में वो चीज़ जो कह रही थी कि वो आज कुछ माँगने नहीं, कुछ देने आया है।
फिर नसीमा बाई आईं, अपनी राशन की दुकान का ताला जेब में डालकर।
फिर वो किराने वाले बूढ़े काका आए जिन्होंने पीले काग़ज़ पर अंगूठा लगाने से साफ़ मना कर दिया था। वो लाठी टेककर आए और पीपल की जड़ के पास बैठ गए, और उन्होंने किसी से कुछ नहीं कहा।
फिर सात-आठ औरतें आईं। फिर दो-तीन आदमी जो अब तक मुझसे आँख नहीं मिलाते थे, आज आँख मिलाकर सिर हिला गए।
मैं किसी से कुछ नहीं कह रहा था।
यही तो सीखा था मैंने — कभी-कभी जोड़ने का पहला काम यह होता है कि तुम कुछ न करो। बस खड़े रहो। बस जगह बनाओ। लोग खुद आ जाते हैं। बस उन्हें एक जगह दिखनी चाहिए जहाँ बैठने पर उनसे काग़ज़ न माँगा जाए।
तभी गुमटी की तरफ़ से खड़खड़ाहट आई।
शबनम आपा आ रही थीं — एक हाथ में बड़ी केतली, दूसरे में कपों की ट्रे, और सिर पर समोसों का थाल रखा हुआ, जैसे कोई पहाड़ पर चढ़ रहा हो।
उन्होंने थाल पीपल की चबूतरी पर रखा और एक लंबी साँस ली।
"मैंने कल चूल्हा बंद कर दिया था," उन्होंने कहा, बिना किसी से पूछे। "सबके सामने कह दिया था कि सच खुलने तक चाय नहीं बनेगी।"
किसी ने कुछ नहीं कहा।
"और आज शाम मैंने चूल्हा जलाया," उन्होंने आगे कहा। "क्योंकि मुझे लगा कि अगर सच खुलने के दिन भी चाय न बने, तो सच का क्या फ़ायदा?"
फिर उन्होंने कटोरियाँ बाँटनी शुरू कीं।
चाय गरम थी। सच में गरम। और उसमें अदरक उतनी थी कि गले से नीचे उतरते हुए लगा कि कोई अंदर से सफ़ाई कर रहा है।
मैंने कटोरी पकड़ी और पीपल की जड़ पर बैठ गया।
टिंकू मेरे पास आया और धीरे से बोला, "उस्ताद, बच्चे तैनात हैं।"
"कहाँ?"
"गली के मोड़ पर गुड्डू और रफ़ीक़ हैं। स्कूल के गेट पर चिंटू है। और सानिया पीछे वाली गली में है। सबके पास सीटी है।"
"सीटी कहाँ से आई?"
उसने थोड़ा शर्माते हुए कहा, "भोला भाई की दुकान से। उन्होंने पूछा नहीं, हमने बताया नहीं।"
"ठीक है," मैंने कहा। "पर एक बात याद रखना — सीटी सिर्फ़ तब बजेगी जब सच में कुछ हो। मज़े के लिए नहीं।"
"उस्ताद," उसने कहा, बहुत गंभीर होकर, "आज मज़े का दिन नहीं है।"
मैंने उसके सिर पर हाथ रखा। उसका सिर छोटा था और उसमें इतनी बातें भरी थीं कि मुझे अक्सर डर लगता था कि कहीं वो फट न जाए।
पापा पीपल के दूसरी तरफ़ बैठे थे। उन्होंने आज वो पुरानी नीली शर्ट नहीं पहनी थी। आज उन्होंने सादी सफ़ेद कमीज़ पहनी थी, और उसकी जेब में कुछ था जिस पर उनका हाथ बार-बार जाता था।
मैंने पूछा नहीं।
कभी-कभी बाप के पास बैठकर भी कुछ नहीं पूछना चाहिए।
उस्ताद अली बक्श अपनी दुकान से एक कुर्सी उठाकर लाए थे — वही कुर्सी जिस पर वो रोज़ बैठते हैं। उन्होंने उसे पीपल के नीचे रखा और खुद उस पर बैठ गए, और फिर किसी से कुछ नहीं कहा।
मीरा अपना कैमरा लेकर आई थी, पर उसने आज उसे तिपाई पर नहीं रखा। उसने उसे नीचे रख दिया, बंद कर दिया, और मेरे पास आकर बैठ गई।
"आज रिकॉर्ड नहीं करोगी?" मैंने पूछा।
"आज नहीं," उसने कहा। "आज मैं सिर्फ़ देखना चाहती हूँ। और सुनना। कुछ चीज़ें कैमरे के सामने नहीं होतीं। वो सिर्फ़ उन लोगों के लिए होती हैं जो वहाँ मौजूद थे।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा और मुझे लगा कि ये वही मीरा नहीं है जो कुछ महीने पहले मेले में मेरे मुँह पर माइक थमा कर खड़ी थी। ये मीरा अब कुछ और है। या शायद वो हमेशा से यही थी, और उसने खुद को दिखाया नहीं था।
चाय के बाद शबनम आपा ने समोसे बाँटे।
फिर वो चुप हो गईं।
और उनका चुप होना अजीब था, क्योंकि शबनम आपा का चुप होना उतना ही अजीब है जितना पीपल का हिलना।
मैंने उनकी तरफ़ देखा। वो गुमटी की तरफ़ देख रही थीं, नहीं — गुमटी से भी आगे, गली के मुँह की तरफ़। जहाँ अंधेरा था।
और फिर मैंने भी उस अंधेरे में देखा।
कोई आ रहा था।
एक औरत। सिर पर पुरानी चादर, जिसके किनारे से पीले पड़ चुके थे। हाथ में एक पुराना सूटकेस, जिसकी पकड़ टेप से बँधी थी। चलने में वो हिचकिचा रही थी, जैसे हर कदम पर सोच रही हो कि लौट जाऊँ या आगे बढ़ूँ।
वो पीपल के घेरे के बाहर रुकी।
और उसी वक़्त शबनम आपा के हाथ से चम्मच छूट गया।
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