The Mysterious Bell1410 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 1410

6 min read November 5, 2026

टिंकू ने दरवाज़े से कहा, "उस्ताद, अगर वो अकेले जा रहा है, तो हम भी जा सकते हैं।"

"नहीं," मैंने कहा। "पहले बात पूरी सुन।"

मैं बबलू की तरफ़ मुड़ा।

"एक बात साफ़ कर। सफ़ेद कुर्ते वाला — वो असल में कौन है? नाम?"

उसने सिर हिलाया। "नाम नहीं पता। पर उसकी उँगली पर काली अंगूठी है। और जब वो बोलता है, तो साहब की आवाज़ भी धीमी हो जाती है।"

"कब से?"

"मैं जब से साहब के साथ हूँ — दस-बारह साल। वो आता रहा है। महीने में एक बार। कभी दो बार। कभी रात को, कभी सुबह। साहब उसके लिए दरवाज़ा खुद खोलते हैं।"

मैंने पूछा, "और वो क्या करता है?"

बबलू ने अपना निचला होंठ काटा। "उस्ताद, मैंने उसके साथ कभी काम नहीं किया। पर इतना पता है — साहब जो भी बड़ा काम करते हैं, उससे पहले वो आता है। और उसके जाने के बाद साहब का चेहरा थोड़ा और… ठंडा हो जाता है।"

टिंकू ने धीरे से कहा, "जैसे कोई बैटरी लगाकर जाता हो।"

बबलू ने उसकी तरफ़ देखा और कुछ नहीं कहा।

मैंने कुर्सी पीछे सरकाई और खिड़की की तरफ़ देखा। बाहर गली में अंधेरा था और दूर कहीं पीपल की तरफ़ एक लालटेन जल रही थी, जिसकी रोशनी में कोई आदमी धीरे-धीरे चल रहा था।

मैंने कहा, "बबलू, तुझे एक बात पूछनी है। और अगर तू झूठ बोलेगा, तो मैं जान जाऊँगा।"

उसने गिलास मज़बूती से पकड़ा। "पूछ।"

"तूने बारह साल साहब के साथ काम किया। तूने उनके हर काग़ज़ को, हर दरवाज़े को, हर आदमी को देखा। अब बता — क्या साहब के पास ऐसी कोई चीज़ है जो उनके हाथ में नहीं, पर उन्हें लगता है कि उनके हाथ में है?"

बबलू की आँखें सिकुड़ीं। वो सोचने लगा।

"मतलब?"

"मतलब — कोई ऐसी चीज़ जो उन्हें ताक़त देती है, जो उनके काबू में नहीं है, पर वो समझते हैं कि है।"

वो एक पल चुप रहा। फिर उसने धीरे से कहा, "बिजलीघर का बक्सा।"

मैंने सिर हिलाया। "बता।"

"वहाँ वो अकेले जाते हैं। महीने में एक-दो बार। रात को। कभी-कभी तो ऐसे ही — बीच में — जैसे किसी से मिलने जा रहे हों। मैंने एक बार पूछा, तो उन्होंने मुस्कुराकर कहा — बबलू, वहाँ मेरा हिसाब रखा है।"

"कैसा हिसाब?"

"मैंने भी पूछा था," बबलू ने कहा। "तो उन्होंने कहा — जो आदमी अपना हिसाब नहीं देखता, वो दूसरों का हिसाब हमेशा गलत लिखता है।"

मैंने देखा कि टिंकू के चेहरे पर वो भाव आया है जो उसे तब आता है जब उसे कुछ समझ आता है। मैंने उसे इशारा नहीं किया। कभी-कभी लड़के को अपने दिमाग़ की आवाज़ खुद सुननी चाहिए।

"बबलू," मैंने कहा, "आज रात तू साहब के साथ जाएगा?"

उसने सिर नहीं हिलाया। "उन्होंने मना किया है।"

"पर तू जाना चाहता है?"

उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो आदमी के अंदर सिर्फ़ एक बार आती है — जब वो पहली बार समझता है कि उसने अपनी ज़िंदगी किसी और के हाथ में रखी थी।

"मैं जाना चाहता हूँ," उसने कहा। "पर डरता हूँ।"

"डर किस बात का?"

"इस बात का कि कहीं वो मुझे देखकर मुस्कुरा न दे।" उसकी आवाज़ भर्राई। "उस्ताद, उस आदमी की मुस्कान से मैं बारह साल से डरता आया हूँ। और मैं खुद नहीं जानता क्यों।"

मैं हँसा।

वो चौंका।

"बबलू," मैंने कहा, "मुस्कान से डरना सही है। पर मुस्कान में ताक़त नहीं होती। ताक़त उस चीज़ में होती है जो मुस्कान के पीछे छिपी होती है। और तूने अभी-अभी वो चीज़ मुझे बता दी है।"

उसने पूछा, "क्या?"

"बक्सा।"

कमरे में एक पल के लिए बल्ब फीका पड़ा, फिर वापस चमका। जैसे उसे भी हामी देनी हो।

मैंने जेब से घंटी निकाली।

वो गरम थी। बहुत गरम नहीं, बस उतनी, जितनी कोई हाथ पकड़कर कहे कि वो सुन रहा है।

मैंने उसे धीरे से बजाया।

आवाज़ बहुत छोटी निकली, जैसे किसी दूसरे कमरे से आई हो।

"बक्सा जाग रहा है," घंटी ने कहा।

मैंने उसे जेब में रख लिया।

टिंकू ने पूछा, "उस्ताद, तो हम जाते हैं न?"

"हाँ," मैंने कहा। "पर सिर्फ़ हम नहीं जाएँगे। पूरी गली जाएगी।"

मैं उठा। मेरी कुर्सी पीछे सरकी और उसकी टाँग फ़र्श पर खुरच खाकर रुकी।

बबलू भी उठा। उसने अपनी टूटी चेन उठाकर जेब में डाली — फेंकी नहीं। मैंने देखा और कुछ नहीं कहा। कभी-कभी आदमी को अपनी गलती का सबूत जेब में रखना चाहिए, ताकि वो फिर उसी गलती पर न लौटे।

वो दरवाज़े तक आया, फिर रुक गया।

"उस्ताद," उसकी आवाज़ बदल गई। धीमी। बहुत धीमी। जैसे वो आख़िरी बात बोलने से पहले खुद से लड़ रहा हो।

मैं रुका।

"एक और बात है," उसने कहा। "मैं इसे बोलना भूल गया था। या शायद बोलना नहीं चाहता था।"

"बोल।"

उसने एक लंबी साँस ली।

"साहब ने आज दोपहर को ही कहा था — साइकिल मँगवा लो।"

मैंने पलटकर देखा। "कौन-सी साइकिल?"

वो मेरी तरफ़ देख रहा था, और उसकी आँखों में वो डर था जो अब तक नहीं था — ये डर अपने लिए नहीं था।

"तुम्हारे पापा की पुरानी साइकिल। वही जो उन्होंने पच्चीस साल पहले गिरवी रखी थी।"

मेरे हाथ ठंडे पड़ गए।

"मैंने पूछा — क्यों, साहब? तो उन्होंने मुस्कुराकर कहा — साइकिल पर बैठकर कोई बोलेगा। मंच पर। कल शाम।"

कमरे में सन्नाटा था।

और फिर घंटी बजी।

इस बार उसकी आवाज़ साफ़ थी। बिल्कुल साफ़। जैसे कोई बहुत दूर से नहीं, ठीक मेरे कान के पास से बोल रहा हो।

"अब साइकिल बोलेगी।"

॥

"अब साइकिल बोलेगी।"

ये शब्द कमरे में इस तरह लटके रहे जैसे छत से कोई पुरानी चीज़ झूल रही हो और किसी को छूने की हिम्मत न हो।

बबलू ने अपनी गर्दन धीरे से घुमाई। उसका मुँह खुला रह गया था।

टिंकू ने पहले मेरी तरफ़ देखा, फिर बबलू की तरफ़, फिर दोबारा मेरी तरफ़। उसकी आँखों में वो सवाल था जो उसे रोज़ पूछना होता है, पर आज उसने ज़ुबान से नहीं पूछा। वो उठा, ट्रंक के पास गया, और मेरे औज़ारों को इस तरह छूने लगा जैसे उनमें जवाब छिपा हो।

"उस्ताद," बबलू ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो रूखापन लौट आया था जो सच बोलने के बाद थोड़ी देर के लिए चला जाता है, "तुम्हें समझ आ रहा है या मुझे समझाऊँ?"

"समझ आ रहा है," मैंने कहा। "पर पसंद नहीं आ रहा।"

"क्या?"

"ये कि वो साइकिल पर किसी और को बिठाएगा।" मैंने घंटी जेब में रखी। "साइकिल मेरे पापा की है, बबलू। वो खड़ी थी पच्चीस साल से। किसी ने उसे छुआ नहीं। और आज अचानक साहब को याद आ गई। इसका मतलब है कि वो उस साइकिल पर सिर्फ़ एक आदमी नहीं बिठाना चाहता। वो उस साइकिल से एक बात कहलवाना चाहता है।"

बबलू ने धीरे से कहा, "वो हमेशा से ऐसा ही करता है। वो खुद कुछ नहीं बोलता। वो चीज़ों से बुलवाता है। काग़ज़ से, चाबी से, कुर्सी से, और अब साइकिल से।"

टिंकू ने पलटकर कहा, "तो हम साइकिल को उससे पहले उठा लें।"

मैं हँस पड़ा। सच में हँसा। उसकी बात इतनी सीधी थी कि मेरे सारे सोच के जाले एक झटके में टूट गए।

"टिंकू," मैंने कहा, "तू एक दिन बहुत बड़ा आदमी बनेगा। या बहुत बड़ा मुसीबत। दोनों में फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि उसे कौन साथ लेकर चलता है।"

उसने गर्व से छाती फुलाई। "तो हम साइकिल उठा लेते हैं?"

"नहीं," मैंने कहा। "आज नहीं। आज हम साइकिल नहीं उठाएँगे। आज हम गली को उठाएँगे।"

मैंने उन दोनों को देखा।

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