The Mysterious Bell – Chapter 1409
धातु का टुकड़ा फ़र्श पर गिरा। मैंने उसे देखा। पीतल की परत पीली थी, पर किनारे पर जहाँ रगड़ लगी थी, वहाँ से सस्ता लोहा झाँक रहा था। मैंने बारीक चीज़ देखकर कभी नहीं कहा, पर आज देखा।
"नकली है," बबलू ने कहा, और उसकी आवाज़ में जो था वो कड़वाहट भी नहीं थी, बस थकान थी। "दो सौ साठ रुपये की है। जब मैं साहब के साथ पहली बार बाहर गया था — एक शादी में — तो उन्होंने खुद अपनी जेब से खरीदकर मेरे गले में डाल दी थी। कहा था, बबलू, तुझे देखकर लोगों को पता चलना चाहिए कि तू किसका आदमी है।"
उसने रोटी की तरफ़ देखा।
"मैं बारह साल उस चेन को सोने की तरह पहनकर घूमा, उस्ताद। और जिस दिन साहब ने कहा कि स्कूल जला दे — उस दिन मुझे लगा ये चेन उतार दूँ, तो मेरी कलाई, गला, सब नंगा दिखेगा।"
वो रुका।
"असली सिर्फ़ साहब की मुस्कान है।"
कमरे में एक पल के लिए सिर्फ़ बल्ब की गुनगुनाहट बची।
और फिर मैं हँसा।
नहीं, ऐसे नहीं जैसे किसी का मज़ाक उड़ा रहा हूँ। मैं हँसा इसलिए कि उस वाक्य में इतनी सच्चाई थी कि उसे सहने के लिए एक हँसी की ज़रूरत पड़ी। मैंने सिर पीछे किया और कंधे हिलाकर हँसा, और टिंकू पहले चौंका, फिर उसके होंठ भी हिले, और फिर बबलू — बबलू के मुँह से वो आवाज़ निकली जो पिछले कई दिनों से बंद थी। वो हँसी नहीं थी, वो उस हँसी का पुराना निशान था, पर वो निकली।
और उसके बाद उस आदमी का शरीर ढीला पड़ गया, जैसे किसी ने उसकी पीठ से बोरी उतार दी हो।
मैंने रोटी उसकी तरफ़ सरका दी। "खा।"
इस बार उसने रोटी उठाई। छोटा टुकड़ा तोड़ा, मुँह में रखा, और चबाने लगा। धीरे-धीरे। घूँट भरने की तरह।
और फिर मैं गंभीर हो गया।
"बबलू," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ में वो सख़्ती नहीं थी जो थाने में थी, "एक बात सुन। आदमी गलती कर सकता है। बड़ी गलती। ऐसी गलती जिससे दूसरों का घर जल जाए।"
उसका हाथ रुक गया।
"पर सुधारने का मौक़ा हर बार मिलना चाहिए। हर बार नहीं मिलता — ये मैं जानता हूँ। बहुत लोगों को नहीं मिलता। पर जब मिले, तब उसे पकड़ना पड़ता है। दोनों हाथों से।"
मैंने उसकी तरफ़ झुककर देखा।
"तुझे मिला है। आज रात। ये मौक़ा है। इसे मत गँवा।"
उसने रोटी नीचे रख दी।
और फिर वो बोला — और इस बार आवाज़ काँप नहीं रही थी। बस धीमी थी। बहुत धीमी, जैसे कोई आदमी खुद से बात कर रहा हो।
"उस्ताद, साहब ने मुझे बुलाया था। दोपहर को। भवन की दूसरी मंज़िल पर। मैं गया, तो वो खिड़की के पास खड़े थे। मुस्कुरा रहे थे — वैसे ही, जैसे हर तस्वीर में मुस्कुराते हैं।"
वो रुका। उसका गला सूखा था। मैंने गिलास फिर भर दिया और उसके आगे रख दिया। उसने पिया।
"कहने लगे — बबलू, तेरे बच्चे हैं न?"
मेरे कान खड़े हो गए।
"मैंने कहा — जी साहब, दो हैं। बेटा और बेटी। बेटी की शादी अगले साल सोच रहा हूँ।"
"तो उन्होंने मुस्कुराकर कहा — अच्छा। फिर शादी भी हो जाएगी, और तेरी नौकरी भी रहेगी। बस एक काम करना है।"
बबलू की आवाज़ टूटी।
"मैंने पूछा — क्या काम, साहब? तो उन्होंने काग़ज़ की तरफ़ इशारा किया और कहा — स्कूल। उसकी छत। जला दो।"
टिंकू ने दरवाज़े की चौखट पर अपना हाथ रख लिया। उसकी उँगलियाँ सफ़ेद पड़ गईं।
"मैंने कहा — साहब, वहाँ बच्चे पढ़ते हैं। तो उन्होंने कहा — अभी बच्चे नहीं हैं। रात है। काग़ज़ जलेंगे, बच्चे नहीं। और अगर काग़ज़ जल गए, तो कल वहाँ पढ़ने वाले बच्चे भी नहीं रहेंगे — वो नई इमारत में जाएँगे। साफ़-सुथरी इमारत। क्या बुरा है इसमें?"
उसने अपना सिर हिलाया, जैसे खुद को झटका दे रहा हो।
"और मैंने कहा — साहब, ये ठीक नहीं है। तो उन्होंने मुस्कान नहीं छोड़ी। बस आवाज़ बदल दी। कहा, बबलू, बारह साल से तू मेरी छाया में चल रहा है। तेरा किराया, तेरे बच्चों का स्कूल, तेरी बीवी का इलाज — सब इसी छाया से है। और अब जब एक छोटा-सा काम है, तो तू ठीक नहीं है बोल रहा है?"
बबलू ने अपने घुटनों को देखा।
"फिर उन्होंने कहा — अगर नहीं करेगा, तो ठीक है। कल सुबह से तेरे काग़ज़ दफ़्तार से हटा दिए जाएँगे। तेरी चाबी मुझे दे दे। और उसके बाद जो तू करे, तेरी मर्ज़ी।"
मैं चुप रहा।
"मैंने बहुत सोचा, उस्ताद," उसकी आवाज़ भर्राई। "बहुत सोचा। मैंने सोचा — आग अगर मैं नहीं लगाऊँगा, तो कोई और लगाएगा। साहब ने कह दिया है, तो लगेगी। फिर मेरा क्या नुक़सान? मैं तो सिर्फ़ साथ जाऊँगा। मैं सिर्फ़ साथ खड़ा रहूँगा।"
वो रुका। उसका हाथ काँपा।
"बारह साल से मैं साथ ही खड़ा हूँ, उस्ताद। साथ खड़े रहने को ही मैं नौकरी समझ बैठा था।"
तब मैंने कुछ कहा — बहुत धीमे। "और तूने आग नहीं लगाई।"
उसने सिर हिलाया। "जब मोटा आदमी कैन लेकर बाउंड्री की तरफ़ गया, तब मुझे लगा — ऐसे तो नहीं होगा। मैंने उसे रोका भी। कहा, स्कूल के पीछे ज़्यादा सूखी घास है, वहाँ से शुरू कर।" वो रोया। "मैंने रास्ता बताया, उस्ताद। मैंने आग नहीं लगाई, पर रास्ता मैंने ही बताया।"
कमरे में सन्नाटा था।
फिर मैंने कहा, "कौन था वो मोटा? नीली शर्ट वाला।"
"साहब का नया आदमी। नाम नहीं बताया। बस कहता है — मुझे बुलाओ मत, मैं काम करके चला जाऊँगा।"
"और जीप वाला दुबला? लाल धागा बाँधे हुए?"
बबलू ने पहली बार हैरानी से देखा। "तुमने देखा?"
"गुड्डू ने देखा।"
उसने धीरे से कहा, "वो सफ़ेद कुर्ते वाले का आदमी है। उसका नाम भी नहीं जानता। बस इतना पता है कि जब वो आता है, तो साहब खुद दरवाज़े तक छोड़ने आते हैं।"
मेरे हाथ रुक गए।
मैंने टिंकू की तरफ़ नहीं देखा, पर मुझे पता था वो भी अब सीधा खड़ा हो गया है।
"बबलू," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ धीमी हो गई, "सफ़ेद कुर्ते वाला आज आया था? मिलने?"
उसने सिर हिलाया।
"कब?"
"शाम को। जब बत्तियाँ बुझी थीं। वो भवन के पिछले दरवाज़े से आया। साहब उसके सामने खड़े थे और उसकी आवाज़ ऐसी थी जैसे… जैसे कोई मास्टर बच्चे से पूछ रहा हो कि होमवर्क किया या नहीं।"
"क्या कहा उसने?"
बबलू ने अपना गला साफ़ किया। जैसे वो शब्द मुँह में रखे हुए हैं और निगलना नहीं चाहता।
"उसने कहा — आज रात बक्से के पास खुद जाना। साहब ने कहा — जी सर। मैंने सुना — सर।"
वो रुका।
"मैं बारह साल साहब के साथ हूँ, उस्ताद। मैंने उन्हें कभी किसी के सामने झुकते नहीं देखा। पर उस आदमी के सामने वो झुके।"
मैंने कुर्सी खींची और बैठ गया।
सच कहूँ, तो उस पल मेरे हाथ ठंडे पड़ गए थे। मैंने अपनी जेब में हाथ डाला और घंटी को छुआ। वो न गरम थी, न ठंडी। बस वैसी थी जैसे कोई साँस रोककर सुन रहा हो।
"आज रात?" मैंने पूछा। "कितने बजे?"
"बत्तियाँ बुझने के बाद। साहब ने कहा — बारह बजे। बक्से के पास। अकेले।"
"और तू?"
"मुझे बाहर रुकने को कहा। दूर। कहा — तेरी ज़रूरत नहीं।"
मैंने उसकी आँखों में देखा। "बबलू, तू सच बोल रहा है?"
उसने अपना सिर उठाया और सीधा मेरी तरफ़ देखा। "उस्ताद, मैं बारह साल से भाग रहा हूँ। आज पहली बार मुझे कोई जगह ऐसी मिली है जहाँ खड़े होकर मुझे भागना नहीं पड़ेगा। तू मुझे मार सकता है, गली से निकाल सकता है — पर आज मैं झूठ नहीं बोलूँगा।"
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