The Mysterious Bell – Chapter 1408
बिल्कुल खाली। न चेन, न पानदान, न काग़ज़, न कुछ। उसकी कमीज़ पर धूल थी और उसका चेहरा पसीने से ऐसा भीगा था जैसे उसने मुँह धोया हो और पोंछा भूल गया हो।
वो मेरी तरफ़ देख रहा था।
और मैं उसकी तरफ़।
और उस पल, मुझे कुछ समझ आया — जैसे घंटी के बिना, किसी जादू के बिना, सिर्फ़ आदमी की शक्ल देखकर समझ आ जाता है। वो यहाँ था। वो उनके साथ आया था। पर उसने आग नहीं लगाई। आग लगाने वाले के हाथ में कैन था, माचिस थी, और जल्दी थी — भागते वक़्त आदमी का चेहरा ऐसा नहीं होता।
बबलू का चेहरा ऐसा था जैसे वो खुद जल रहा हो।
"बबलू," मैंने कहा।
वो कुछ नहीं बोला।
"बबलू," मैंने दोबारा कहा, और इस बार मेरी आवाज़ में वो सख़्ती नहीं थी जो थाने में थी। "तेरे हाथ खाली हैं।"
उसने अपने हाथ देखे, जैसे पहली बार देख रहा हो।
और फिर घंटी बोली।
बहुत छोटी आवाज़ में, बहुत धीमी, पर साफ़।
"इसके हाथ खाली हैं।"
बबलू की आँखें भर आईं।
वो धीरे-धीरे नीचे बैठा — पहले घुटनों के बल, फिर दोनों हाथ ज़मीन पर, और उसका सिर झुक गया। एक बड़ा, मोटा, चेन वाला, पान चबाने वाला, धमकाने वाला आदमी — राख और रेत में बैठा हुआ, और रो रहा था। ऐसे रो रहा था जैसे बरसों का हिसाब एक साथ टूट पड़ा हो।
मैंने उसे उठाने की कोशिश नहीं की।
कभी-कभी आदमी को बैठने देना चाहिए। अगर तुम उसे उस वक़्त उठा दो, तो वो फिर कभी नहीं बैठेगा — और जो आदमी कभी नहीं बैठा, वो कभी सच भी नहीं बोलेगा।
"उस्ताद," उसने कहा, और उसकी आवाज़ गला दबाकर निकली, "मैंने माचिस नहीं जलाई।"
मैं चुप रहा।
"मैंने माचिस नहीं जलाई, उस्ताद।" उसने सिर उठाया। उसकी आँखों में पानी था और उस पानी के पीछे वो डर था जो बच्चों की आँखों में होता है — वो डर जो इंसान बड़ा होकर भी नहीं उतार पाता। "पर मैं यहाँ उनके साथ आया था।"
हवा रुक गई।
सानिया ने अपनी कॉपी सीने से लगा ली। रफ़ीक़ ने बाल्टी नीचे रख दी। गुड्डू का बल्ला ढीला पड़ गया। चिंटू ने अपनी जली जैकेट की जेब में हाथ डाल दिया, जैसे वहाँ कुछ ऐसा मिल जाए जो इस वक़्त काम आए।
दुबे अंकल ने अपनी छड़ी ज़मीन पर टिकाई और अपना सिर झुका लिया।
और मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। घंटी अब भी गरम थी।
"कह," मैंने कहा। "पूरी बात कह। यहाँ से जाने के बाद कोई कुछ नहीं कहेगा। पहले कह।"
बबलू ने अपना चेहरा दोनों हाथों से ढका।
और फिर उसने वो कहा, जो आज रात के बाद इस गली का हिसाब बदल देगा।
"साहब ने मुझे कहा था — स्कूल जला दो।"
॥
"साहब ने मुझे कहा था — स्कूल जला दो।"
यह वाक्य हवा में लटक गया और हवा ने उसे नीचे नहीं गिरने दिया। राख की गंध, जली जैकेट की बू, और उस आदमी के पसीने की महक — तीनों मेरे मुँह में एक साथ भर गईं। मैंने कुछ नहीं कहा। कभी-कभी चुप रहना सबसे ज़ोर की आवाज़ होता है, और उस वक़्त मुझे लगा कि अगर मैंने एक भी शब्द बोला, तो ये आदमी जो अभी-अभी खुद से टूटकर बाहर आया है, वापस अपने खोल में घुस जाएगा।
बबलू के हाथ ज़मीन पर थे। राख उसकी उँगलियों से चिपक रही थी।
दुबे अंकल ने छड़ी पर अपना वज़न डाला और धीरे से कहा, "बेटा, यहाँ नहीं।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"यहाँ नहीं," उन्होंने दोहराया। "ये आदमी अभी बोलेगा, पर यहाँ बोलेगा तो सिर्फ़ राख सुनेगी। इसे अंदर ले चल। पानी दे। और हाँ — एक रोटी रख दे सामने। जो आदमी रोते-रोते बोलता है, उसका गला सूख जाता है।"
बबलू ने सुना, पर सिर नहीं उठाया।
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा। वो सख़्त था, जैसे पत्थर। मैंने ज़ोर नहीं लगाया। बस हल्का-सा दबाया और कहा, "उठ।"
वो उठा। धीरे-धीरे, जैसे कोई बहुत पुराना दरवाज़ा खुल रहा हो जिसकी कुंडी ज़ंग खा गई हो।
हम स्कूल की पिछली बाउंड्री से निकले। सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू पीछे-पीछे आने लगे, पर दुबे अंकल ने हाथ उठाकर उन्हें रोक दिया।
"तुम लोग यहीं रुको," उन्होंने कहा। "आग बुझी है, पर अंगारे अभी ज़िंदा हैं। कोई पानी का बर्तन भरकर रखो। और ख़ासकर तुम, गुड्डू — वो जीप का नंबर वाली कॉपी कहीं गिरा मत देना।"
गुड्डू ने अपनी जेब को दोनों हाथों से थाम लिया, जैसे उसमें हीरा हो।
टिंकू रुका नहीं। वो मेरे पीछे चुपचाप चलने लगा, और मैंने उसे मना भी नहीं किया। कभी-कभी लड़के को उस जगह खड़ा रहने देना चाहिए जहाँ से वो बड़ा होता है।
गली की धूल में हम तीनों के पैरों के निशान बनते गए — मेरे, बबलू के और टिंकू के। पीपल के नीचे से गुज़रते वक़्त मैंने देखा कि चबूतरी खाली है। दरोगा ने मेज़, कुर्सी, बोर्ड — सब हटा दिया था। ज़मीन पर एक चौकोर जगह बची थी जहाँ धूल अभी भी साफ़ थी, जैसे उसे याद हो कि वहाँ क्या रखा था।
उस्ताद की दुकान बंद थी। शटर पर वो भारी ताला लटक रहा था जो रात में लगा था, और उसके ऊपर नीलामी का काग़ज़ झूल रहा था। मैंने उसे देखकर अपनी नज़र फेर ली। आज रात के बाद उन सब चीज़ों का हिसाब होना था, पर पहले एक आदमी से बात करनी थी जिसके हाथ अभी खाली थे।
दुकान का शटर मैंने आधा ही उठाया — इतना कि हम झुककर अंदर जा सकें। पीछे वाले कमरे में बल्ब अब भी धीरे-धीरे गुनगुना रहा था, जैसे उसे भी पता हो कि आज रात किसी को अंधेरे की ज़रूरत है।
कमरे में चारपाई थी, लोहे की अलमारी थी, औज़ारों का ट्रंक था, और दीवार पर वो पुरानी झाड़ू टँगी थी जिससे मैं महीने में एक बार कमरा झाड़ता हूँ और बारहों महीने याद रखता हूँ कि झाड़ू भी अपनी जगह माँगती है।
मैंने बबलू को चारपाई के किनारे बैठाया।
टिंकू दरवाज़े के पास खड़ा रहा। उसके हाथ में अब भी वो आधा जला माचिस का डिब्बा था जो मैंने उसके हाथ से लेकर जेब में रखा था — नहीं, उसने वो तो मुझे दे दिया था, पर उसकी मुट्ठी अभी भी उसी आकार में बंद थी जैसे माचिस पकड़ी हो।
मैंने लोहे की अलमारी के ऊपर से स्टील का गिलास उठाया, पानी का मटका खोला, और भरकर बबलू के हाथ में रखा।
उसने गिलास नहीं पकड़ा। उसके हाथ काँप रहे थे।
मैंने गिलास उसकी उँगलियों पर टिका दिया। "पकड़।"
उसने पकड़ा।
"पी।"
उसने पिया। पहला घूँट गले से नीचे उतरते वक़्त उसकी आँखें बंद हो गईं, जैसे पानी उसके अंदर कहीं जाकर किसी सूखी ज़मीन पर गिरा हो। फिर उसने पूरा गिलास खत्म कर दिया और गिलास अपने घुटनों पर रख लिया।
मैंने ट्रंक के पास रखी थाली से रोटी उठाई — माँ ने शाम को जो रोटियाँ सभा के लिए बनाई थीं, उनमें से दो बची थीं — और उसके आगे रख दी। साथ में गुड़ का एक टुकड़ा। बिना ज़्यादा सोचे।
बबलू ने रोटी की तरफ़ देखा और फिर वैसे ही देखता रहा जैसे वो कोई चीज़ नहीं, कोई सवाल हो।
टिंकू ने एक लंबी साँस ली और फिर वो बोला जो वो बोलता है जब हिम्मत से ज़्यादा मुँह बोलता है।
"उस्ताद," उसकी आवाज़ में वो हल्की बेरुख़ी थी जो तेरह साल का लड़का अपनाता है जब वो किसी बड़े आदमी को टूटा देखता है, "इतनी बड़ी सोने की चेन वाला आदमी रोटी पर रो रहा है।"
बबलू ने सिर उठाया।
और उसकी आँखों में वो चीज़ आई जो उस वक़्त नहीं आनी चाहिए थी — गुस्सा।
"चेन?" उसकी आवाज़ फटी, जैसे पुराने ताले की जीभ। "ये चेन नकली है, टिंकू।"
उसने गले में हाथ डाला। वो चेन जिसे पूरी गली सोने की समझती थी, जिसे रणवीर के आदमी देखकर झुक जाते थे, जिसे देखकर बबलू खुद ऐसे चलता था जैसे उसके गले में सूरज लटक रहा हो — उसने खींचकर तोड़ दी।
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