The Mysterious Bell – Chapter 1407
उस वक़्त मेरे कॉमन सेंस ने हुक्म दिया। "पहले आग।" मैंने कहा। "ये सब बाद में। पानी कहाँ है?"
"टंकी में पानी नहीं है," रफ़ीक़ ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो गुस्सा था जो बच्चे बड़ों की बेवकूफ़ी पर होते हैं। "पर मैंने बाल्टी भर ली — स्कूल के हैंडपंप से। पानी आ रहा है, उस्ताद! पंप चल रहा है!"
मैंने एक पल को उसे देखा। रफ़ीक़, जो अब तक सिर्फ़ खबरें लाता था, ने बाल्टी में पानी भरा था। खुद भरा था। पता भी नहीं कब।
"चल," मैंने कहा।
उस आग को बुझाना मुश्किल नहीं था। आग छोटी थी, सूखी घास में। मुश्किल ये थी कि घास के नीचे लकड़ी के तख़्ते पड़े थे, और तख़्तों के ऊपर बोरियाँ, और उन बोरियों के पीछे स्कूल के स्टोर की खिड़की — वो खिड़की जिसके अंदर रजिस्टर रखे थे। अगर वो लकड़ी पकड़ लेती, तो फिर पानी की नहीं, आग के और लोगों की ज़रूरत पड़ती।
मैंने अपनी कमीज़ से अपना मुँह ढका और उस तक़रीब से गया जितना कर सकता था। रेत थी वहाँ — स्कूल के किनारे रेत का ढेर पड़ा था, जो बारिश में बहकर जम गया था। रेत आग पर डालते ही आग मरती नहीं, दबती है। और मरना और दबना अलग-अलग चीज़ें हैं। मैंने रेत डाली, रफ़ीक़ ने पानी, गुड्डू ने अपना बल्ला दे दिया ताकि मैं दूर से जलती घास खींच सकूँ, और चिंटू ने — शाबाश चिंटू — अपनी गंदी जैकेट उतारकर गीली कर ली और उससे बोरियों की आग बुझाई।
दुबे अंकल ने कुछ नहीं कहा। वो बस अपनी छड़ी से जलती हुई लकड़ियों को रास्ते से हटाते रहे, ताकि आग कूड़े की तरफ़ न जाए। आग कूड़े की तरफ़ गई तो वो और भड़कती — कूड़े में पुराने केमिकल वाले डिब्बे पड़े थे, और रसोई की पुरानी टिन। स्कूल की सफ़ाई वाली दीदी कहती हैं कि कूड़े में जान डालो तो वो जवाब देता है।
आठ-दस मिनट में आग बुझ गई। पूरी तरह नहीं — कुछ जगह से धुआँ उठता रहा, और गीली रेत में लाल राख बनी रही जो पानी में भाप बनकर उठती थी।
मैं घुटनों के बल बैठ गया।
तभी मेरी नज़र पड़ी।
पत्थर के नीचे, आधा जला हुआ, एक माचिस का डिब्बा पड़ा था।
मैंने उसे उठाया। आधा जल चुका था। पीछे की तरफ़ छपाई थी — नीली लकीर और उस पर कुछ लिखा। मैंने आँख सिकोड़कर देखा। नीचे छोटे अक्षरों में कंपनी का नाम। और उससे ऊपर — एक जानी-पहचानी छाप।
मैंने उसे टिंकू को दिया। "पढ़।"
टिंकू ने पढ़ा। वो पढ़ता रहा और उसका चेहरा बदलता रहा।
"उस्ताद," उसने धीरे कहा, "ये वो माचिस है जो बड़े समारोहों में बाँटी जाती है। पिछले महीने अस्पताल के कार्यक्रम में भी बाँटी थी। इस पर कंपनी का नाम है — भारद्वाज।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
और कुछ दूर, रेत के उस पार, एक चीज़ पड़ी थी जो आग में नहीं जली थी।
मोटे कपड़े का दस्ताना।
मज़दूरों वाला दस्ताना, जिसके दानों के बीच ज़मीन की रेत और सीमेंट अब भी लगी थी। मैंने उसे उठाया और उसके भीतर की गंध सूँघी।
और हाँ — उसके किनारे पर भी वही नीली मोहर थी। जो टोपियों पर लगती है, बोर्डों पर लगती है, रसीदों पर लगती है।
"उस्ताद," गुड्डू ने कहा, और उसकी आवाज़ अब गर्व से भरी थी, "हमने ड्राइवर को भी देखा। वो जीप में बैठा था और उसने उस मोटे को हाथ से इशारा किया — जल्दी कर। मैंने उसका चेहरा देखा। वो दुबला है, और उसने अपनी कलाई पर लाल धागा बाँधा हुआ है।"
"मैंने देखा!" चिंटू चहक उठा। "लाल धागा! मेरे उस्ताद की कलाई पर भी वैसा धागा था, याद है? जब हमने उस दिन दुकान पर—"
"हाँ हाँ," रफ़ीक़ ने कहा, "हर आदमी की कलाई पर लाल धागा होता है, चिंटू।"
"पर उसकी भी थी—"
"चिंटू।" मैंने कहा। "रुक। एक बात तय करते हैं। हम बहादुर हैं, ये सही। पर बहादुरी और बेवकूफ़ी में थोड़ा ही अंतर होता है। अगर वो आदमी यहाँ तुम चारों को देख लेता, और तुम्हारे हाथ में लोहे का बल्ला देख लेता — तो मुझे अभी बात करने के लिए कोई नहीं मिलता। समझ रहे हो?"
चारों चुप हो गए।
"बोलो।"
"समझ रहे हैं," सानिया ने कहा।
"अच्छा। अब अगली बार — अगली बार ऐसा कुछ दिखे, तो तुम लोग क्या करोगे?"
चारों ने एक-दूसरे को देखा।
"चिल्लाएँगे," गुड्डू ने कहा।
"नहीं," मैंने कहा।
"भागेंगे," रफ़ीक़ ने कहा।
"नहीं।"
"तो?" चिंटू ने कहा।
मैंने उनकी तरफ़ देखा। "तुम लोग किसी को बताओगे। बड़े को। मुझे। शबनम आपा को। उस्ताद को। उस आदमी को जो सबसे नज़दीक हो। तुम्हारा काम खबर पहुँचाना है, लड़ना नहीं। लड़ना मेरा काम है — और वो भी तभी, जब कोई रास्ता न बचे। समझे?"
"समझे," उन्होंने कहा। और सानिया ने कहा, "पर उस्ताद, हमारी खबर से आज आग बुझी। अगर हम न बताते, तो स्कूल जल जाता।"
वो सही थी।
मैंने उसके सिर पर हाथ रखा। "हाँ," मैंने कहा। "आज तुम लोगों ने स्कूल बचाया। और सच कहूँ, तो आज रात तुम चारों उन बड़ों से ज़्यादा काम के निकले जो मैदान में भाषण सुन रहे हैं।"
चारों के चेहरे खिल गए। चिंटू ने अपनी जैकेट उठाई, उसे झाड़ा, और फिर भी पहन ली — जली हुई, गीली, काली। उसने कहा, "ये अब मेरी जासूसी जैकेट है।"
और फिर मैंने टिंकू की तरफ़ देखा।
टिंकू खड़ा था। उसकी टाँग काँप रही थी। वो छिपाने की कोशिश कर रहा था, पर बच्चों से छिपाया जा सकता है, मुझसे नहीं। मैंने देखा कि उसके हाथ में माचिस का डिब्बा था और उसकी उँगलियाँ काली थीं।
"टिंकू," मैंने धीरे कहा।
"हाँ उस्ताद।"
"तू क्यों काँप रहा है?"
"नहीं काँप रहा।"
"तेरी टाँग काँप रही है।"
उसने नीचे देखा। जैसे टाँग को अलग आदमी मानकर उसे डाँटना चाहता हो।
"उस्ताद," उसने कहा, और उसकी आवाज़ बैठ गई, "जब मैं छत पर था, तब उस आदमी ने ऊपर देखा था।"
मैं सीधा खड़ा हो गया।
"क्या कहा?"
"उसने ऊपर देखा। मुझे देखा। उसने अपनी उँगली उठाई—" टिंकू ने वो हरकत की, और उसकी उँगली भी काँप रही थी, "ऐसे। जैसे कहे — तू अगली बारी है।"
मेरे पेट में कुछ ठंडा हो गया।
मुझे पता है वो एहसास क्या होता है। तेरह साल का लड़का, जो स्कूल छोड़ चुका है, जो अपनी माँ से डरता है कि कहीं उसे काम से निकाल न दें — उस लड़के पर कोई उँगली उठाए तो वो टाँगें काँपेंगी। काँपेंगी ही।
मैं घुटनों के बल उसके सामने बैठ गया, वैसे ही जैसे दुकान पर बैठता हूँ जब कोई छोटा बच्चा रो रहा हो।
"टिंकू। मेरी तरफ़ देख।"
उसने देखा।
"उसने उँगली उठाई। ठीक है। उँगली से कुछ नहीं होता। आग लगती है माचिस से, उँगली से नहीं। और माचिस हमारे पास है।" मैंने उसके हाथ से डिब्बा लिया और उसकी जेब में रख दिया। "ये तेरे पास रहेगा। तू इसे अपनी जेब में रखेगा, और जब तेरी टाँग काँपेगी, तो इसे छू लेगा और याद करेगा कि आज रात इस डिब्बे को जलाने वाला भाग गया, और तू यहाँ खड़ा है।"
टिंकू ने एक लंबी साँस ली।
"और टिंकू — अगर वो तुझे दोबारा देखे भी, तो मैं उसके सामने खड़ा मिलूँगा। ये मेरा काम है। तुझे इसकी ज़रूरत नहीं पड़ेगी।"
उसने सिर हिलाया। उसकी टाँग अब भी काँप रही थी, पर कम।
उसी वक़्त, कूड़े के ढेर के पीछे वाले अंधेरे से एक आवाज़ आई।
पैरों के नीचे कुचली लकड़ी जैसी आवाज़। फिर साँस।
मैंने हाथ उठाया — रुको। सब रुक गए। रफ़ीक़ ने बाल्टी उठा ली। गुड्डू ने बल्ला।
और अंधेरे से निकला — बबलू।
उसके हाथ खाली थे।
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